
SIR विवाद ने बदल दी पश्चिम बंगाल की चुनावी फिज़ा, चुनाव सुचारू होंगे या नहीं?
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जहां एक विरोध मंच से अपने तेवर दिखा रही हैं, वहीं चुनाव आयोग जनता को भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहा है कि 2026 का चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होगा।
मंगलवार (10 मार्च) को कोलकाता के मध्य क्षेत्र में आयोजित एक धरना-प्रदर्शन में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने घंटों तक एक कैनवास पर SIR शीर्षक से पेंटिंग बनाई। उन्होंने उसी कैनवास पर VANISH शब्द भी लिखा और इसमें हरे, काले और सफेद रंगों का इस्तेमाल किया, जो हाल के दिनों में राज्य की राजनीति पर छाए मतदाता सत्यापन विवाद का प्रतीक था।
कला के माध्यम से किया गया उनका यह प्रतीकात्मक विरोध कई लोगों की नजर से नहीं बचा।
इसी दिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जनता को भरोसा दिलाने की कोशिश की कि आगामी विधानसभा चुनाव पूरी तरह स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे।
हाल ही में संपन्न स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और चुनाव आयोग के बीच खुला टकराव इस साल चुनाव से पहले के बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है। इस विवाद ने ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ जैसे बुनियादी मुद्दों को भी पीछे छोड़ दिया है।
ममता ने SIR को बनाया राजनीतिक मुद्दा
पिछले साल नवंबर में शुरू हुई यह चुनावी प्रक्रिया पिछले महीने अंतिम मतदाता सूची जारी होने के साथ समाप्त हुई। इस दौरान हजारों लोग कई दिनों तक अपनी मतदाता पात्रता की पुष्टि कराने के लिए कतारों में खड़े रहे। अनिश्चितता के तनाव के कारण कुछ लोगों की मौत होने की खबरें भी सामने आईं।
इस साल लगातार चौथी बार सत्ता में लौटने की कोशिश कर रहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने SIR प्रक्रिया को एक राजनीतिक मुद्दे के रूप में इस्तेमाल किया है। उन्होंने इसे बंगाली पहचान और मतदाता अधिकारों के लिए संभावित खतरा बताया है।
उनका आरोप है कि विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (BJP) चुनाव आयोग के माध्यम से 2026 में उन्हें सत्ता से हटाने की कोशिश कर रही है।
भाजपा का पक्ष
भाजपा का कहना है कि SIR प्रक्रिया फर्जी नामों को हटाने के लिए जरूरी है, जिनमें कथित तौर पर बांग्लादेश से आए घुसपैठिए, रोहिंग्या और अन्य लोग शामिल हैं।
भाजपा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने कहा,“पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के शासन में सिर्फ घुसपैठियों का स्वागत किया जाता है।”
भाजपा खेमे में तृणमूल कांग्रेस पर इसी तरह के आरोप लगाने वाली आवाजों की भी कमी नहीं रही।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा विवाद
यह विवाद सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच गया, जहां इस मुद्दे पर राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच टकराव देखने को मिला। ममता बनर्जी खुद इस प्रक्रिया को चुनौती देने के लिए अदालत में पेश हुईं।
जब टीएमसी प्रमुख ने वास्तविक मतदाताओं के अधिकारों की बात करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, तो उन्हें “जनता की याचिकाकर्ता” कहा जाने लगा। इससे बंगाल में उनकी राजनीतिक छवि और मजबूत हुई।
विश्लेषकों का मानना है कि उनका यह हस्तक्षेप चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है।
मतदाता सत्यापन में चुनौतियां
SIR प्रक्रिया के दो पहलुओं ने सबसे ज्यादा विवाद पैदा किया है:
1. तार्किक विसंगतियां (Logical discrepancies)
2. पुरानी मतदाता सूचियों के साथ मिलान (Mapping)
बंगाल में मतदाताओं को केवल अपने माता-पिता या दादा-दादी के साथ ही अपने नाम का मिलान करने की अनुमति थी, जिससे सत्यापन प्रक्रिया जटिल हो गई।
नाम की वर्तनी में मामूली अंतर या उम्र के अंतर जैसी छोटी गलतियों के कारण कई लोगों के नाम तार्किक विसंगति सूची में शामिल हो गए, जिससे देरी और भ्रम की स्थिति पैदा हुई।
राज्य में कुल 7.08 करोड़ मतदाता हैं, जिनमें से लगभग 60 लाख मतदाताओं की जांच की जा रही है। इसके लिए बंगाल के अलावा ओडिशा और झारखंड के करीब 700 न्यायिक अधिकारी तैनात किए गए हैं।
अब यह सवाल बना हुआ है कि 7 मई तक नई सरकार के गठन की समय सीमा से पहले चुनाव सुचारु रूप से कराए जा सकेंगे या नहीं।

