SIR विवाद के साए में बंगाल चुनाव, मताधिकार और वोटर लिस्ट पर बहस तेज
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SIR विवाद के साए में बंगाल चुनाव, मताधिकार और वोटर लिस्ट पर बहस तेज

बंगाल चुनाव से पहले SIR पर विवाद, मताधिकार की चिंता, दो चरणों में मतदान, कल्याण योजनाएं और एंटी-इनकंबेंसी से चुनावी समीकरण जटिल बनlते नजर आ रहे हैं।


पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) इस बार चुनावी राजनीति का सबसे निर्णायक मुद्दा बन सकता है। मताधिकार से वंचित होने की आशंका ने राजनीतिक चर्चाओं को काफी प्रभावित किया है। इसके साथ ही चुनाव प्रचार का असामान्य रूप से शांत माहौल और चुनाव आयोग द्वारा मतदान को केवल दो चरणों में कराने के फैसले ने भी व्यापक बहस छेड़ दी है।

“AI With Sanket” कार्यक्रम में सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक टिप्पणीकार सायरा शाह हलीम तथा पत्रकार तमाल साहा से बातचीत की गई। इस चर्चा में SIR अभ्यास के प्रभाव, सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) और मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (BJP) की राजनीतिक रणनीतियों तथा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय घटनाओं के संभावित प्रभावों पर विस्तार से विचार किया गया।

मतदान तिथियों की घोषणा ने चौंकाया

पश्चिम बंगाल में आम तौर पर विधानसभा चुनाव कई चरणों में होते रहे हैं, जो कभी-कभी सात या आठ चरणों तक भी चले हैं। लेकिन इस बार चुनाव आयोग ने घोषणा की कि मतदान केवल दो चरणों में 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को कराया जाएगा। यह निर्णय कई पर्यवेक्षकों और राजनीतिक दलों के लिए आश्चर्यजनक रहा। अब यह समझने की कोशिश की जा रही है कि क्या यह छोटा चुनाव कार्यक्रम राज्य की सुरक्षा स्थिति में बदलाव का संकेत है या फिर प्रमुख दलों की राजनीतिक रणनीति में बदलाव का परिणाम।

कम चरणों में चुनाव: एक नई स्थिति

पत्रकार तमाल साहा के अनुसार, पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक रूप से चुनाव कई चरणों में इसलिए कराए जाते रहे हैं क्योंकि हिंसा की आशंका और व्यापक लॉजिस्टिक चुनौतियां रहती हैं। उदाहरण के तौर पर 2021 के विधानसभा चुनाव आठ चरणों में कराए गए थे। लेकिन इस बार चुनाव आयोग ने चरणों की संख्या घटाकर सिर्फ दो कर दी है। साहा का कहना है कि यह बदलाव कई लोगों के लिए चौंकाने वाला है, क्योंकि पहले कई दल स्वयं सुरक्षा का हवाला देते हुए अधिक चरणों की मांग करते रहे हैं।

उन्होंने यह भी याद दिलाया कि BJP ने पहले कई चुनावों में अधिक चरणों की वकालत की थी। यहां तक कि 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान पार्टी ने दस चरणों तक मतदान कराने का सुझाव दिया था। लेकिन इस बार वही पार्टी अपेक्षाकृत छोटा चुनाव कार्यक्रम चाहती दिख रही है।साहा का मानना है कि इसके पीछे राजनीतिक गणनाएं हो सकती हैं, क्योंकि लंबे चुनाव कार्यक्रम के दौरान कई बार ऐसे घटनाक्रम सामने आते हैं जो राजनीतिक समीकरण बदल देते हैं।

2021 के चुनाव से सबक

साहा ने 2021 के चुनावों का उदाहरण देते हुए कहा कि उस समय कोविड-19 महामारी के बावजूद चुनाव आठ चरणों में कराए गए थे। उस चुनाव के दौरान कई अप्रत्याशित घटनाएं हुईं जिन्होंने चुनावी माहौल को प्रभावित किया। उदाहरण के तौर पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को चुनाव प्रचार के दौरान पैर में चोट लग गई थी और उन्होंने व्हीलचेयर पर बैठकर रैलियाँ जारी रखीं। यह दृश्य एक शक्तिशाली राजनीतिक प्रतीक बन गया जिसने चुनावी कथा को प्रभावित किया।

इसके अलावा उत्तर बंगाल के कूचबिहार जिले के सीतलकुची में मतदान के दौरान हुई गोलीबारी भी एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गई थी, जिसने आगे के चरणों में राजनीतिक माहौल बदल दिया।

इस बार प्रचार अभियान क्यों है शांत?

दोनों पैनलिस्टों ने माना कि इस बार पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल पिछले चुनावों की तुलना में असामान्य रूप से शांत दिखाई दे रहा है। तमाल साहा ने कहा कि उनके अनुभव में राज्य के चुनाव आमतौर पर बहुत ऊर्जावान और जन-सक्रियता से भरपूर होते हैं, लेकिन इस बार माहौल अपेक्षाकृत शांत है। उनका कहना है कि चुनाव मंद मतदाताओं की वजह से नहीं बल्कि राजनीतिक दलों के प्रचार के तरीके के कारण हो जाते हैं।

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य में एक रैली के दौरान सीधे तौर पर ममता बनर्जी का नाम नहीं लिया, जो इतनी बड़ी राजनीतिक लड़ाई में एक असामान्य बात मानी जा रही है।याद दिलाया गया कि 2021 के चुनावों के दौरान मोदी द्वारा बार-बार दीदी ओ दीदी कहकर मुख्यमंत्री पर तंज कसना बड़ा विवाद बन गया था।

मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR)

चुनावी बहस का सबसे बड़ा मुद्दा इस बार मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण बन गया है।सायरा शाह हलीम का कहना है कि यह प्रक्रिया बहुत कम समय में की गई, जिससे कई मतदाताओं में चिंता पैदा हुई है। उनके अनुसार इतनी बड़ी स्तर की मतदाता सूची जाँच में आमतौर पर कई वर्षों का समय लगता है, लेकिन इस बार इसे कुछ महीनों में ही पूरा करने की कोशिश की गई।

उन्होंने दावा किया कि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हट गए हो सकते हैं। उनका कहना है कि प्रभावित लोगों में से कई मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे जिलों से हैं, जहाँ अल्पसंख्यक आबादी अधिक है।

मताधिकार छिनने की आशंका

हलीम ने कहा कि कई ऐसे नागरिक, जिन्होंने पहले कई चुनावों में मतदान किया था, इस बार अंतिम मतदाता सूची में अपना नाम नहीं पा रहे हैं।उनके अनुसार यह चिंताजनक स्थिति है क्योंकि इससे वैध मतदाता अपने लोकतांत्रिक अधिकार का उपयोग नहीं कर पाएंगे।उन्होंने यह भी अनुमान जताया कि मतदाता पात्रता को लेकर बनी यह अनिश्चितता ही शायद राज्य में शांत चुनावी माहौल का एक कारण हो सकती है।हलीम ने चेतावनी दी कि यदि वैध मतदाताओं को चुनाव प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया, तो चुनाव की स्थिति बेहद जटिल हो सकती है।

राजनीतिक परिणाम

तमाल साहा का मानना है कि SIR प्रक्रिया के कुछ अनपेक्षित राजनीतिक परिणाम भी सामने आ सकते हैं, जिनमें BJP भी प्रभावित हो सकती है।शुरुआत में इस प्रक्रिया को अवैध प्रवासियों की पहचान और उन्हें मतदाता सूची से हटाने के उपाय के रूप में प्रस्तुत किया गया था। लेकिन साहा का कहना है कि इससे कुछ ऐसे समुदाय भी प्रभावित हो सकते हैं जिन्हें आम तौर पर भाजपा समर्थक माना जाता है।

उन्होंने उदाहरण के रूप में मतुआ समुदाय का उल्लेख किया, जो अनुसूचित जाति का एक प्रभावशाली समूह है और राज्य की कई विधानसभा सीटों पर उसका प्रभाव है।

नागरिकता से जुड़ी समस्याएं

साहा ने बताया कि मतुआ समुदाय के कई सदस्य दशकों पहले बांग्लादेश से भारत आए थे और उनके पास मूल देश के आधिकारिक दस्तावेज नहीं हैं।ऐसी स्थिति में वर्तमान सत्यापन प्रक्रिया में आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करना उनके लिए कठिन हो सकता है।उन्होंने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के कार्यान्वयन में भी जटिलताओं की ओर इशारा किया। यह कानून पड़ोसी देशों से आए प्रवासियों की नागरिकता संबंधी चिंताओं को दूर करने के लिए लाया गया था।लेकिन साहा के अनुसार डिजिटल आवेदन प्रक्रिया और दस्तावेज़ी आवश्यकताओं के कारण कई लोग आवेदन पूरा नहीं कर पा रहे हैं।

कल्याणकारी योजनाओं की राजनीति

चर्चा के दौरान ममता सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का भी उल्लेख हुआ।हलीम ने कहा कि लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं और अन्य वित्तीय सहायता कार्यक्रमों ने महिला मतदाताओं के बीच तृणमूल कांग्रेस को मजबूत समर्थन दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।उन्होंने बताया कि सरकार ने हाल ही में इन योजनाओं के लिए आवंटन बढ़ाया और कुछ नई योजनाएँ भी घोषित कीं। यह घोषणा आचार संहिता लागू होने से ठीक पहले की गई थी।उनका मानना है कि ऐसी कल्याणकारी योजनाएँ आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के मतदान व्यवहार को प्रभावित करती हैं।

सत्ता विरोधी लहर का सवाल

हालांकि तमाल साहा का कहना है कि TMC के लगातार तीन कार्यकाल के बाद सत्ता विरोधी भावना (Anti-incumbency) भी एक वास्तविकता है।उन्होंने कहा कि कुछ नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप जैसे पूर्व मंत्री पार्थ चटर्जी से जुड़े मामले अभी भी लोगों की याद में हैं।भले ही पार्टी ने इन विवादों के बाद भी कई चुनाव जीते हैं, लेकिन साहा का मानना है कि यह मुद्दा मतदाताओं की सोच को प्रभावित कर सकता है।उन्होंने यह भी कहा कि राज्य में BJP का मत प्रतिशत अभी भी काफी मजबूत है, जिससे चुनावी मुकाबला कड़ा बना हुआ है।

अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का प्रभाव

सायरा शाह हलीम ने एक और पहलू उठाया। वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाएँ।उन्होंने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, ईंधन की कीमतों में संभावित वृद्धि और आपूर्ति बाधाओं का उल्लेख किया।उनका कहना है कि यदि LPG गैस की कमी या रोजमर्रा के खर्चों में वृद्धि जैसी आर्थिक परेशानियां बढ़ती हैं, तो ये मुद्दे मतदाताओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण बन सकते हैं।ऐसी स्थिति में चुनावी वादे या कल्याणकारी योजनाएँ भी पीछे रह सकती हैं।

अनिश्चित परिणाम

दोनों विशेषज्ञों ने माना कि इस बार का चुनावी परिदृश्य असामान्य रूप से जटिल है।मतदाता सूची का पुनरीक्षण, कल्याणकारी योजनाएं, सत्ता विरोधी भावना और वैश्विक आर्थिक दबाव ये सभी कारक मिलकर चुनाव को अप्रत्याशित दिशा दे सकते हैं। जहाँ तृणमूल कांग्रेस को उम्मीद है कि उसकी कल्याणकारी नीतियाँ उसके समर्थन आधार को मजबूत करेंगी, वहीं भाजपा शासन से असंतोष और प्रशासनिक मुद्दों को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश कर सकती है।

अंत में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही होगा कि क्या मतदाता खुद को चुनाव में भाग लेने के लिए सक्षम महसूस करते हैं, या फिर मताधिकार से वंचित होने की आशंका ही राजनीतिक चर्चा पर हावी हो जाती है।

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