
केंद्र-राज्य संबंधों में बदलाव चाहते हैं स्टालिन, राज्यों को ज्यादा स्वायत्तता की मांग
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने बुधवार (18 फरवरी) को राज्य विधानसभा में एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट पेश की, जिसमें व्यापक संवैधानिक संशोधनों और नई दिल्ली तथा राज्यों के बीच शक्ति संतुलन की मौलिक पुनर्संरचना की मांग की गई है।
केंद्र-राज्य संबंधों पर गठित उच्चस्तरीय समिति की रिपोर्ट का पहला भाग प्रस्तुत करते हुए स्टालिन ने कहा कि “सच्चे संघवाद” की बहाली और राज्यों को अधिक स्वायत्तता देने के लिए ऐसे सुधार आवश्यक हैं। उन्होंने केंद्र सरकार पर “तानाशाही मानसिकता” अपनाने का आरोप लगाया और कहा कि राज्यों की अनदेखी की जा रही है तथा उन्हें धन और स्वीकृतियों के लिए केंद्र की कृपा पर निर्भर रहने को मजबूर किया जा रहा है।
स्टालिन ने जोर देकर कहा कि संघवाद कोई रियायत नहीं, बल्कि राष्ट्र की सुरक्षा का कवच है। उन्होंने केंद्र-राज्य संबंधों में संतुलन बहाल करने के लिए रिपोर्ट पर खुले मन से बहस की अपील की।
समिति का गठन स्टालिन सरकार ने पिछले अप्रैल में केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा और राज्यों की स्वायत्तता सुनिश्चित करने के उपाय सुझाने के लिए किया था।
387 पन्नों की रिपोर्ट में 10 प्रमुख मुद्दे
387 पृष्ठों की इस रिपोर्ट में राज्यपाल की भूमिका, भाषा नीति, चुनाव, परिसीमन, स्वास्थ्य, जीएसटी सुधार और शिक्षा सहित 10 प्रमुख मुद्दों पर चर्चा की गई है।
शक्ति संघर्ष पर सवाल
विधानसभा में स्टालिन ने कहा, “राज्य आखिर कब तक भीख मांगने की स्थिति में रहेंगे?” सत्तारूढ़ दल के सदस्यों ने मेज थपथपाकर उनका समर्थन किया। उन्होंने कहा कि राज्यों के अधिकारों में हो रही कटौती का स्थायी समाधान केवल अधिक स्वायत्तता है, जो संविधान में संशोधन के माध्यम से ही संभव है।
स्टालिन ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार असंगत रूप से अधिक शक्ति अपने पास रखे हुए है और राज्य सूची के विषयों को धीरे-धीरे समवर्ती सूची में स्थानांतरित कर रही है। उन्होंने प्रगतिशील राज्यों को पर्याप्त वित्तीय हिस्सेदारी न देने, हिंदी थोपने, आपदा राहत में देरी और परिसीमन की धमकी जैसे कदमों को केंद्रीय अतिक्रमण के उदाहरण बताया।
उन्होंने कहा, “जीएसटी से लेकर वित्तीय दबाव तक, तमिलनाडु जिन संकटों का सामना कर रहा है, उनका एकमात्र इलाज राज्य स्वायत्तता है।”
स्टालिन ने दोहराया कि मजबूत राज्य ही मजबूत संघ बनाते हैं और संघवाद कोई रियायत नहीं, बल्कि राष्ट्र की रक्षा का कवच है।
वित्तीय दबाव और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
राजनीतिक विश्लेषकों और टिप्पणीकारों ने इस कदम का स्वागत किया। लेखक Aazhi Senthilnathan ने कहा कि भारत के लोकतांत्रिक विकास के लिए वास्तविक संघवाद अनिवार्य है और केंद्र अक्सर राज्यों के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करता है तथा वित्तीय संसाधनों का उपयोग दबाव बनाने के लिए करता है।
उन्होंने द्रविड़ आंदोलन के प्रतीक और पूर्व तमिलनाडु मुख्यमंत्री C N Annadurai का हवाला देते हुए कहा, “हर राज्य को अपने लोगों के अनुरूप कानून और योजनाएं बनाने का अधिकार होना चाहिए। भूमि की रक्षा करना केंद्र का कर्तव्य है; लोगों की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है।”
वीसीके सांसद डी रविकुमार ने कहा कि पिछले 75 वर्षों में कांग्रेस और भाजपा—दोनों सरकारों ने राज्यों की शक्तियों को धीरे-धीरे कमजोर किया है। उन्होंने इंदिरा गांधी के कार्यकाल में शिक्षा को समवर्ती सूची में डाले जाने और हाल में शिक्षा के लिए धन को हिंदी स्वीकार करने से जोड़ने के प्रयासों का उल्लेख किया।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में कानूनी कार्रवाई और राष्ट्रीय दलों, विशेषकर कांग्रेस, पर शिक्षा जैसे विषयों को फिर से राज्य सूची में वापस लाने की प्रतिबद्धता जताने के लिए दबाव बनाने की अपील की।
राज्य–स्थानीय निकाय संबंध
वरिष्ठ भाजपा नेता तमिलिसाई सुंदरराजन ने स्टालिन की आलोचना करते हुए उन पर पाखंड का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि एक ओर स्टालिन स्वायत्तता की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर 27 जिलों में ग्रामीण स्थानीय निकाय चुनावों को एक वर्ष से अधिक समय तक टालते रहे। उनका दावा था कि द्रमुक (DMK) केवल चुनावी झटकों का सामना करने पर ही इस मुद्दे को उठाती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि केंद्र सरकार सभी राज्यों के साथ समान व्यवहार करती है।
387 पृष्ठों की रिपोर्ट में राज्यपाल की भूमिका, भाषा नीति, चुनाव, परिसीमन, स्वास्थ्य, जीएसटी सुधार और शिक्षा सहित 10 प्रमुख मुद्दों पर चर्चा की गई है।
इस बीच, तमिलनाडु कांग्रेस अध्यक्ष Selvaperunthagai ने स्टालिन के बयान का स्वागत करते हुए इसे “वर्तमान समय के लिए आवश्यक” बताया। पर्यवेक्षकों ने इसे इस संकेत के रूप में देखा कि हालिया तनावों के बावजूद DMK–कांग्रेस गठबंधन बरकरार है।
दशकों पुरानी मांग
राज्य स्वायत्तता की मांग 1960 के दशक से तमिलनाडु की राजनीति का केंद्रीय मुद्दा रही है।
1963 में C N Annadurai ने संसद में इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया था।
1969 में तत्कालीन मुख्यमंत्री M Karunanidhi (स्टालिन के पिता) ने केंद्र–राज्य संबंधों की समीक्षा के लिए राजमन्नार समिति का गठन किया। इस समिति में सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति P V Rajamannar, ए. लक्ष्मणस्वामी मुदलियार और पी. चंद्र रेड्डी शामिल थे।
समिति ने 1971 में अपनी ऐतिहासिक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें शक्तियों के व्यापक विकेंद्रीकरण की सिफारिश की गई थी। इसके बाद केंद्र सरकार द्वारा गठित सरकारिया आयोग (1983), वेंकटचलैया आयोग (2000) और पंची आयोग (2004) ने भी सिफारिशें दीं, लेकिन ठोस बदलाव सीमित ही रहे।
स्टालिन की यह पहल उस दशकों पुराने संघर्ष को पुनर्जीवित करती है, जिसे DMK वर्तमान भाजपा-नेतृत्व वाली सरकार के तहत अभूतपूर्व केंद्रीकरण के रूप में देखती है।
आज स्टालिन ने समिति के सदस्यों का आभार व्यक्त किया और घोषणा की कि संवैधानिक सुधार के लिए व्यापक समर्थन जुटाने हेतु रिपोर्ट की प्रतियां पूरे भारत के राजनीतिक दलों को भेजी जाएंगी।

