
सबरीमाला पर SC में आज से सुनवाई, परंपरा या मौलिक अधिकार कौन पड़ेगा भारी?
सुप्रीम कोर्ट की 9-जज बेंच सबरीमाला केस में आज से सुनवाई करने जा रही है, जहां महिलाओं के प्रवेश से आगे बढ़कर धार्मिक अधिकार बनाम संविधान का बड़ा सवाल तय होगा।
7 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया की नौ-न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ देश के स्वतंत्रता के बाद के सबसे महत्वपूर्ण मामलों में से एक पर सुनवाई के लिए बैठेगी। इस साल यह दूसरी ऐसी पीठ है। इससे पहले औद्योगिक विवाद अधिनियम में ‘इंडस्ट्री’ की परिभाषा से जुड़े मामले पर 19 मार्च को फैसला सुरक्षित रखा गया था।
अब सबरीमाला मामला उससे कहीं अधिक व्यापक सामाजिक प्रभाव वाला है। आठ साल पहले 2018 में पांच जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी। अब यह मामला फिर से अदालत के सामने है और इसके प्रभाव केवल केरल के एक मंदिर तक सीमित नहीं हैं।
बेंच की संरचना और संतुलन
इस बेंच की अध्यक्षता भारत के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant कर रहे हैं। उनके साथ जस्टिस बीवी नागरत्ना, एमएम सुंदरश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, एजी मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।
यह बेंच प्रतिनिधित्व के संतुलन को दर्शाती है—जस्टिस नागरत्ना अकेली महिला हैं, जस्टिस मसीह अल्पसंख्यक दृष्टिकोण लाते हैं, जबकि जस्टिस वराले अनुसूचित जाति समुदाय से आते हैं।गौरतलब है कि CJI सूर्य कांत 2020 की उस नौ-जज बेंच का भी हिस्सा थे, जिसने इस मामले को बड़े बेंच के पास भेजने को सही ठहराया था।
2018 का ऐतिहासिक फैसला
28 सितंबर 2018 को तत्कालीन CJI Dipak Misra की अध्यक्षता वाली बेंच ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक करार दिया बहुमत ने कहा कि अय्यप्पा भक्त अलग धार्मिक संप्रदाय नहीं हैं और यह रोक संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन है, जो धार्मिक स्वतंत्रता देता है।हालांकि जस्टिस Indu Malhotra ने असहमति जताते हुए कहा कि अदालत को धार्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
विरोध और पुनर्विचार याचिकाएं
इस फैसले के बाद केरल में व्यापक विरोध हुआ। 2 जनवरी 2019 को बिंदु अम्मिनी और कनक दुर्गा मंदिर में प्रवेश करने वाली पहली महिलाएं बनीं, जिससे विवाद और बढ़ गया।इसके बाद 50 से अधिक पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं, जिनमें मंदिर के पुजारी से लेकर विभिन्न संगठनों तक शामिल थे।
समीक्षा से संवैधानिक प्रश्न तक
14 नवंबर 2019 को CJI Ranjan Gogoi की बेंच ने समीक्षा पर फैसला देने के बजाय बड़े संवैधानिक सवालों को बड़ी बेंच के पास भेज दिया।इनमें मुस्लिम महिलाओं का मस्जिदों में प्रवेश, पारसी महिलाओं के अधिकार और दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रथाओं जैसे मुद्दे शामिल थे।जस्टिस आरएफ नरीमन और D. Y. Chandrachud ने इसका विरोध किया और कहा कि यह समीक्षा के दायरे से बाहर है।
सात बड़े संवैधानिक सवाल
2020 में CJI S. A. Bobde की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस संदर्भ को सही माना और सात प्रमुख सवाल तय किए। इनमें शामिल हैं अनुच्छेद 25 की सीमा क्या है? व्यक्तिगत और धार्मिक समूहों के अधिकारों में संतुलन कैसे हो?“संवैधानिक नैतिकता” और “सामाजिक नैतिकता” में फर्क क्या है?क्या कोई बाहरी व्यक्ति PIL के जरिए धार्मिक प्रथाओं को चुनौती दे सकता है?
विभिन्न पक्षों की दलीलें
सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta ने केंद्र सरकार की ओर से पुनर्विचार का समर्थन किया।ट्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ने कहा कि धर्म को समुदाय के नजरिए से समझा जाना चाहिए, न कि अदालत के मानकों से।वहीं, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और अखिल भारतीय संत समिति ने भी अदालत के हस्तक्षेप का विरोध किया।दूसरी ओर, मूल याचिकाकर्ता 2018 के फैसले को बरकरार रखने की मांग कर रहे हैं।
क्या दांव पर है?
यह मामला सिर्फ सबरीमाला मंदिर तक सीमित नहीं है। इसका असर कई मुद्दों पर पड़ेगा। मुस्लिम महिलाओं का मस्जिदों में प्रवेश, पारसी महिलाओं के धार्मिक अधिकार, दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रथाएं। असल में यह दो विचारधाराओं की लड़ाई है एक जो समानता और अधिकारों को सर्वोपरि मानती है,और दूसरी जो धार्मिक समुदायों की स्वायत्तता को प्राथमिकता देती है।
सुनवाई का कार्यक्रम और अहम सवाल
सुनवाई 7 से 22 अप्रैल के बीच चरणबद्ध तरीके से होगी।जब CJI सूर्य कांत 7 अप्रैल को कार्यवाही शुरू करेंगे, तब सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होगा धर्म के नियम कौन तय करेगा: आस्था रखने वाला समुदाय या संविधान?

