
बीच सत्र फीस कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, दिल्ली सरकार से पूछे तीखे सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसे लागू करने का तरीका और समय-सीमा साफ नहीं है। इससे छात्रों और स्कूलों दोनों को परेशानी हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार से सवाल किया है कि वह निजी स्कूलों की फीस से जुड़ा नया कानून बीच सत्र में क्यों लागू कर रही है। कोर्ट ने कहा कि जब शैक्षणिक सत्र पहले ही शुरू हो चुका है, तो इस समय फीस तय करने और मंजूरी की प्रक्रिया लागू करना व्यावहारिक नहीं लगता।
सुनवाई के दौरान जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि कानून का मकसद सही है, लेकिन इसे लागू करने का तरीका और समय-सीमा साफ नहीं है। इससे छात्रों और स्कूलों दोनों को परेशानी हो सकती है।
यह मामला निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सामने आया। स्कूलों का कहना है कि नया कानून भविष्य के लिए लागू होना चाहिए, न कि चल रहे शैक्षणिक सत्र पर। उनका तर्क है कि फीस का प्रस्ताव पहले दिया जाता है और मंजूरी बाद में मिलती है, न कि सत्र के बीच।
दिल्ली सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि यह प्रक्रिया सिर्फ 2025–26 के शैक्षणिक सत्र के लिए है। लेकिन कोर्ट ने आशंका जताई कि इससे पहले से ली गई फीस पर भी असर पड़ सकता है।
कोर्ट ने फिलहाल कानून को रोकने से इनकार किया है, लेकिन साफ कहा है कि इसे लागू करते समय तय नियमों और व्यावहारिकता का ध्यान रखना जरूरी है। मामले की अगली सुनवाई में सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि फीस नियंत्रण की प्रक्रिया सिर्फ 2025–26 सत्र तक ही सीमित रहेगी या नहीं।
दिल्ली सरकार को कोर्ट से मिली फटकार के बाद आम आदमी पार्टी ने रेखा गुप्ता सरकार पर गंभीर सवाल उठाए हैं। आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि अब सुप्रीम कोर्ट में भाजपा सरकार और प्राइवेट स्कूलों के बीच का गठजोड़ पूरी तरह उजागर हो गया है।

