
प्रशांत किशोर को सुप्रीम कोर्ट ने दिया झटका, 'जनता ने खारिज किया तो अदालत आ गए?'
प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी ने बिहार चुनाव रद्द करने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।
प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी ने बिहार चुनाव के नतीजों को रद्द करने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। जनसुराज का दावा था कि चुनाव से पहले सरकार द्वारा कई मुफ्त योजनाओं का ऐलान किया गया, जिससे मतदाताओं पर गलत प्रभाव पड़ा और चुनाव निष्पक्ष नहीं रहा। इसलिए पार्टी ने बिहार चुनाव के नतीजों को अवैध घोषित करने और नए सिरे से चुनाव कराने की मांग की थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्या बागची की बेंच ने कहा कि अगर जनता ने चुनाव में आपको खारिज कर दिया है तो आप अदालत में आकर राहत नहीं मांग सकते। चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि यह सही तरीका नहीं है और यह अदालत का मंच चुनाव रद्द करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
एक भी सीट नहीं जीत सकी जनसुराज पार्टी
जनसुराज ने बिहार की 243 विधानसभा सीटों में से 242 पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं कर पाए। सुप्रीम कोर्ट ने भी यह सवाल उठाया कि “आपको कितने वोट मिले?” और कहा कि अगर जनता ने एक बार आपको खारिज कर दिया है तो आप अदालत में आकर चुनाव रद्द कराने की बात कैसे कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी योजना से आपत्ति थी तो चुनाव से पहले या चुनाव के दौरान ही उसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए थी, न कि चुनाव खत्म होने के बाद।
सुप्रीम कोर्ट ने जनसुराज को यह सलाह दी कि यह मामला राज्य से जुड़ा है, इसलिए इसे हाईकोर्ट में ही उठाना चाहिए। शीर्ष अदालत के इस रुख के बाद जनसुराज ने याचिका वापस लेने की बात कही, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने मंजूर कर लिया। कोर्ट ने कहा कि कुछ मामलों में मुफ्त योजनाओं को लेकर सवाल उठाए जा सकते हैं और उन पर विचार भी किया जा सकता है, लेकिन इसे सीधे चुनाव रद्द कराने तक नहीं ले जाना चाहिए।
जनसुराज की याचिका में मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना पर भी सवाल उठाए गए थे। इस योजना के तहत नीतीश कुमार सरकार ने चुनाव से ठीक पहले घोषणा की थी कि हर परिवार की एक महिला के खाते में 10 हजार रुपये दिए जाएंगे ताकि वह अपना स्वरोजगार शुरू कर सके। इसके अलावा बाद में यह राशि बढ़ाकर 2 लाख रुपये तक देने की भी बात कही गई। याचिका में बताया गया कि इस योजना को ‘जीविका’ योजना से जोड़ा गया था, जिसमें पहले से एक करोड़ महिलाएं पंजीकृत थीं। इसके बाद कहा गया कि जो महिलाएं इसमें पंजीकृत नहीं थीं, वे भी नामांकन करा सकती हैं, जिससे लाभार्थियों की संख्या 1.56 करोड़ तक पहुंच गई।
जनसुराज के वकील सीयू सिंह ने कहा कि चुनाव से ठीक पहले ऐसी योजना का ऐलान हुआ, जिसमें लोगों के खातों में पैसे ट्रांसफर किए गए। उस समय चुनाव आचार संहिता लागू थी, इसलिए यह कदम मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश माना जा सकता है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मामलों में पहले हाई कोर्ट में सुनवाई होनी चाहिए और फिर आवश्यक कार्रवाई की जा सकती है।

