
पश्चिम बंगाल में SIR पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, दावों और आपत्तियों की मियाद एक हफ्ते बढ़ी
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि बंगाल सरकार के 8,505 अधिकारी 10 फ़रवरी को शाम 5 बजे तक ज़िला निर्वाचन कार्यालयों में ड्यूटी के लिए रिपोर्ट करें
एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) मामले में आपत्तियां दर्ज कराने की समय-सीमा 14 फ़रवरी से एक सप्ताह के लिए बढ़ाने का आदेश दिया है। सोमवार (9 फ़रवरी 2026) को मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने ये आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि राज्य सरकार के 8,505 अधिकारी 10 फ़रवरी को शाम 5 बजे तक ज़िला निर्वाचन कार्यालयों में ड्यूटी के लिए रिपोर्ट करें। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर ये अधिकारी उपयुक्त पाए जाते हैं, तो चुनाव आयोग को उनकी सेवाओं का उपयोग ईआरओ/एईआरओ (इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर/असिस्टेंट इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर) के रूप में करना होगा।
इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार से चुनाव आयोग के अधिकारियों के खिलाफ कथित हिंसा के आरोपों पर भी जवाब दाखिल करने को कहा है। इससे पहले 4 फ़रवरी को हुई सुनवाई में, शीर्ष अदालत ने नोटिस जारी करते हुए चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा दायर याचिका पर 9 फ़रवरी तक जवाब मांगा था।
पिछले दिनों पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट में बहस करने वाली पहली मौजूदा मुख्यमंत्री बनीं। उन्होंने मतदाता सूचियों के चल रहे एसआईआर में हस्तक्षेप की मांग करते हुए अदालत से लोकतंत्र को बचाने की अपील की थी और आरोप लगाया था कि पश्चिम बंगाल को निशाना बनाया जा रहा है तथा वहां के लोगों पर ज़ोर-जबरदस्ती की जा रही है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की। कहा कि SIR प्रक्रिया में कोई बाधा नहीं आने देंगे। प्रक्रिया में जहां भी सुधार की जरूरत पड़ेगी, उसको लेकर आदेश जारी किया जाएगा। लेकिन SIR में अगर किसी न अड़चन पैदा करने की कोशिश की तो वो हम नहीं होने देंगे, ये सभी राज्यों को समझ लेना चाहिए।
इस बीच, सीएम ममता बनर्जी के इस केस में पेश होकर खुद बहस करने के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार किया। चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने याचिकाकर्ता वकील से कहा कि इसमे नई क्या बात है। यह हमारे संविधान में आस्था और भरोसे को दिखाता है। मामले का राजनीतिकरण ना करें।

