एक बिल पर भिड़े सत्ता और विपक्ष, क्यों गरमाई तेलंगाना की राजनीति?
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एक बिल पर भिड़े सत्ता और विपक्ष, क्यों गरमाई तेलंगाना की राजनीति?

तेलंगाना हेट स्पीच बिल पर बहस का दौर जारी है। अस्पष्ट परिभाषाओं, कड़े दंड और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरे के रूप में देखा जा रहा है।


तेलंगाना हेट स्पीच और हेट क्राइम्स (रोकथाम) विधेयक, 2026 को 29 मार्च को विधानसभा में प्रस्तुत किया गया। आईटी और उद्योग मंत्री डी. श्रीधर बाबू ने इसे मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी की ओर से पेश किया। परिवहन मंत्री पोन्नम प्रभाकर ने इस पर चर्चा का नेतृत्व किया।अगले ही दिन विधानसभा ने इस विधेयक को एक चयन समिति (Select Committee) के पास भेज दिया। यह निर्णय विभिन्न दलों के सदस्यों द्वारा उठाई गई आपत्तियों के बाद लिया गया। भाजपा, एआईएमआईएम, सीपीआई और यहां तक कि सत्तारूढ़ कांग्रेस के कुछ वर्गों ने भी गंभीर चिंताएं जताईं।

बीआरएस, जिसके विधायकों को सदन से निलंबित किया गया था, ने बाहर से प्रतिक्रिया दी। कार्यकारी अध्यक्ष के. टी. रामाराव ने इस विधेयक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने वाला दमनकारी उपकरण बताया।किसी सरकारी विधेयक का पेश होने के एक दिन के भीतर ही आगे जांच के लिए भेजा जाना अपने आप में बहुत कुछ कहता है। हालांकि, इसके संवैधानिक मुद्दे केवल पहले दिन की असहजता से कहीं गहरे हैं।

अस्पष्ट शब्द और कठोर दंड

विधेयक में “हेट स्पीच” को किसी भी मौखिक, लिखित या इलेक्ट्रॉनिक अभिव्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसका उद्देश्य असामंजस्य (disharmony), शत्रुता या दुर्भावना (ill-will) पैदा करना हो।यह अभिव्यक्ति धर्म, जाति, लिंग, यौन अभिविन्यास, विकलांगता या जन्मस्थान के आधार पर पहचाने जाने वाले व्यक्तियों या समूहों के खिलाफ हो सकती है।हालांकि साम्प्रदायिक घृणा को रोकना एक सराहनीय उद्देश्य है, लेकिन समस्या इसकी ड्राफ्टिंग में है।

विधेयक का मुख्य शब्द “असामंजस्य” कहीं परिभाषित नहीं किया गया है। “दुर्भावना” को भी किसी भारतीय कानून या अदालत ने मापने योग्य नहीं बनाया है। इसके बावजूद, इन्हीं अस्पष्ट आधारों पर पूरा आपराधिक ढांचा बनाया गया है।सभी अपराध संज्ञेय (cognisable) हैं, यानी पुलिस बिना वारंट गिरफ्तारी कर सकती है। सभी अपराध गैर-जमानती हैं, यानी आरोपी को जमानत का अधिकार नहीं है।

पहली बार अपराध: 1 से 7 साल की सजा + ₹50,000 जुर्माना

दोहराया गया अपराध: 2 से 10 साल की सजा + ₹1 लाख जुर्माना

तेलंगाना विधेयक की प्रमुख समस्याएं

1. अस्पष्ट परिभाषाएं

“असामंजस्य” और “दुर्भावना” जैसे शब्दों की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है, जिससे कानून का मनमाना उपयोग हो सकता है।यह अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) के उल्लंघन का जोखिम पैदा करता है।

2. कठोर दंड व्यवस्था

बिना वारंट गिरफ्तारी, जमानत का अधिकार नहीं, कठोर सजा और भारी जुर्माना

3. बिना निगरानी के कंटेंट हटाना

सरकार द्वारा नियुक्त एक अधिकारी किसी भी ऑनलाइन सामग्री को हटाने या ब्लॉक करने का आदेश दे सकता है। कोई कोर्ट आदेश आवश्यक नहीं,अपील का कोई प्रावधान नहीं,स्वतंत्र नुकसान मानक नहीं। यह 2015 में निरस्त किए गए आईटी एक्ट की धारा 66A की याद दिलाता है।

4. संगठनों की जिम्मेदारी और प्रमाण का बोझ

यदि किसी सदस्य ने आपत्तिजनक बयान दिया, तो पूरा संगठन जिम्मेदार माना जाएगा—जब तक वह अपनी बेगुनाही साबित न करे।यह सामान्य कानूनी सिद्धांत (कि दोष साबित करना अभियोजन का काम है) को उलट देता है।

5. अधिकारियों को छूट

कानून लागू करने वाले सरकारी अधिकारियों को जवाबदेही से छूट दी गई है, जिससे दुरुपयोग का खतरा बढ़ता है।

6. मौजूदा कानूनों से टकराव

भारत में पहले से ही कई कानून मौजूद हैं। भारतीय न्याय संहिता, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम,आईटी एक्ट

कर्नाटक मॉडल से समानता

यह विधेयक मूल रूप से कर्नाटक के 2025 के समान विधेयक की पुनरावृत्ति है।कर्नाटक में इसे दिसंबर 2025 में पारित किया गया था, लेकिन राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने इसे राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखा। उन्होंने तीन मुख्य समस्याएं बताईं:

केंद्रीय कानूनों से टकराव

अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन,अत्यधिक और मनमानी कार्यकारी शक्तियां।यह विधेयक अब तक राष्ट्रपति के पास लंबित है।

सबसे चिंताजनक प्रावधान: कंटेंट हटाने की शक्ति

एक सरकारी अधिकारी बिना अदालत के आदेश के किसी भी ऑनलाइन सामग्री को हटाने का निर्देश दे सकता है।कोई न्यायिक निगरानी नहीं,कोई अपील नहीं। यह तय करने का अधिकार एक व्यक्ति को दे दिया गया है कि नागरिक क्या कह सकते हैं और क्या देख सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में श्रेया सिंघल बनाम भारत सरकार मामले में इसी तरह के प्रावधान (धारा 66A) को असंवैधानिक घोषित किया था, क्योंकि उसमें “असुविधा” जैसे अस्पष्ट शब्द थे।

“संबंध के आधार पर दोष”

यदि कोई आरोपी किसी संगठन से जुड़ा है, तो पूरा संगठन जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।सीपीआई विधायक ने विधानसभा में सवाल उठाया—क्या एक सदस्य के बयान के लिए पूरी पार्टी को जिम्मेदार ठहराना उचित है? इसके साथ ही केवल “इरादे” का आरोप ही मामला दर्ज करने के लिए काफी है।अधिकारियों को कानूनी कार्रवाई से छूट दी गई है

क्या मौजूदा कानून पर्याप्त हैं?

भारत में पहले से ही हेट स्पीच से संबंधित कानून मौजूद हैं। भारतीय न्याय संहिता की धाराएं (196, 299, 353),जन प्रतिनिधित्व अधिनियम,एससी/एसटी एक्ट, आईटी एक्ट है। सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में कहा था कि समस्या कानून की कमी नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन की है।लॉ कमीशन (2017) ने सुझाव दिया था कि अपराध तभी माना जाए जब हिंसा भड़काने का स्पष्ट प्रमाण हो। तेलंगाना विधेयक इससे कहीं व्यापक है।

आगे का रास्ता

चयन समिति को निम्नलिखित कदम उठाने होंगे। “असामंजस्य” और “दुर्भावना” की स्पष्ट परिभाषा देना। केवल इरादे नहीं, बल्कि वास्तविक उकसावे का प्रमाण आवश्यक करना,कंटेंट हटाने की शक्ति को न्यायिक निगरानी में लाना। संगठनों पर प्रमाण का उल्टा बोझ हटाना। यह स्पष्ट करना कि मौजूदा कानूनों में कौन-सी कमी यह विधेयक पूरा करता है।

हेट स्पीच कानून की विश्वसनीयता उसके सुरक्षा उपायों पर निर्भर करती है।यदि ये सुरक्षा उपाय नहीं होंगे, तो कानून बने बिना भी अपना असर दिखाएगा—लोग यह सोचकर ही बोलने से डरेंगे कि कहीं उनका बयान अपराध न मान लिया जाए।यह “चिलिंग इफेक्ट” कोई गलती नहीं, बल्कि सेंसरशिप का सबसे पुराना और प्रभावी तरीका है।

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