लखनऊ की गलियों का 'ईरान कनेक्शन’, ईरान से 'कफ़न’ की सौगात क्यों लेकर आते हैं शिया?
अवध के नवाबों से समय से ईरानी संस्कृति और इबादत के तौर तरीकों का पालन लखनऊ के शिया मुसलमान करते रहे हैं।वहाँ धार्मिक यात्रा पर जाने वाले लोग अपने साथ 'कफ़न’ लेकर आते हैं।

Why are shia Muslims in Lucknow protesting over Khamenei’s death ? ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजराइल की जंग जारी है।मिडिल ईस्ट की पॉलिटिक्स और इस तनाव से अब दुनिया के कई देशों में तेल संकट के आसार हैं।शुक्रवार को जहाँ दिल्ली में ईरान के समर्थन और इज़राइल और अमेरिका के विरोध में प्रदर्शन हुआ वहीं लखनऊ में भी शिया समुदाय का विरोध जारी है।अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत पर शिया समुदाय में आक्रोश है।दरअसल अपना धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव ईरान से मानने वाले लखनऊ के शिया समुदाय के बारे में कई रोचक तथ्य हैं जिसकी वजह से लखनऊ को 'मिनी ईरान' तक कहा जाता है।
अवध के नवाबों का ईरान के निशापुर से संबंध-
ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली ख़ामेनेई की एयर स्ट्राइक में मौत हुई तो उसके बाद से लखनऊ की गलियों में अब तक सन्नाटा पसरा है।पुराने लखनऊ के शिया बहुल इलाकों में घरों पर लगे काले झंडों को देखा का सकता है।नवाबी काल की इमारतों पर भी अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई की तस्वीर वाले पोस्टर और इज़राइल और अमेरिका के विरोध वाले नारे लिखे हुए पोस्टर देखे जा सकते हैं।यूँ तो कश्मीर, हैदराबाद और यूपी के कई हिस्सों में ख़ामेनेई की शहादत की बात कहते हुए शिया इज़राइल और अमेरिका के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन लखनऊ में तीन दिन के शोक के ऐलान, मातम और नवाबी काल की इमारतों को तीन दिन तक बंद करने की बात ने लोगों का ध्यान खींचा है।
वरिष्ठ पत्रकार सैयद हुसैन अफ़सर बताते हैं कि ''अवध के नवाबों का संबंध ईरान के ऐतिहासिक निशापुर (Neyshabur) शहर से था।उन्हीं नवाबों ने ईरानी की संस्कृति, ईरान की शायरी, इबादत के तरीके और इमारतों के निर्माण की स्टाइल को लखनऊ का हिस्सा बना दिया।इसकी शुरुआत 1722 से हुई जब जब नवाब निशापुर के सआदत अली खान ने यहाँ इसकी बुनियाद डाली और यहां वो सारी वो चीजें की जो ईरान में होती थी करना शुरू किया और इस तरह से लखनऊ ईरानी संस्कृति का गढ़ बन गया।'' हुसैन अफ़सर बताते हैं कि यही वजह है कि लखनऊ को ‘मिनी ईरान’ कहा जाता है।
लखनऊ में आज भी शिया समुदाय का खानपान, रहन सहन और इबादत का तरीका ईरान से प्रेरित है।अवध के नवाबों ने ईरान और इराक की तर्ज़ पर ही यहाँ कई इबादतगाहों और इमारतों का निर्माण कराया।आज भी मोहर्रम में ईरानी परम्परा का साफ़ प्रभाव यहाँ पुराने शहर के ज्यादातर हिस्सों में दिखाई पड़ता है।लेकिन इसमें भी एक खास बात रही।अवध के नवाबों ने ईरान की संस्कृति को यहाँ के बहुसंख्यक हिंदू आबादी की संस्कृति, त्योहारों से जोड़ कर उस संस्कृति की शुरुआत की जिसे 'गंगा जमुनी संस्कृति ' भी कहा जाता है।
ईरान से 'कफ़न’ की सौग़ात लेकर आते हैं शिया-
कई लोगों को यह जानकारी चौंकाने वाली लग सकती है लेकिन लखनऊ की शिया कम्युनिटी का ईरान से संबंध इतना गहरा है कि लोग वहाँ से अपना 'कफ़न’ लेकर आते हैं।धार्मिक यात्रा पर जब लोग जाते हैं तो अपने साथ कफ़न लेकर आना बड़ी बात समझते हैं।इस मान्यता का जिक्र करते हुए वरिष्ठ पत्रकार सैयद हुसैन अफ़सर कहते हैं ''कफ़न को लोग वहां जो ज़री होती है, जिसको ताज़िया भी कहते हैं उससे स्पर्श करा कर वहां से लाते हैं।इसके पीछे मान्यता ये है कि हम हम जब मरेंगे तो इराक और ईरान का ये कफ़न हम पहनेंगे तो हमारी बखशीश हो जाएगी, हम बखश दिए जाएंगे।जो लोग वहाँ जाते हैं उनसे कभी-कभी लोग सौगात में कफ़न भी मंगवाते हैं।''
राजनीतिक नहीं, भावनात्मक मुद्दा: हुसैन अफ़सर-
हालांकि भारत में रहते हुए इस तरह ईरान के लिए मातम दूसरे देश के सुप्रीम लीडर की मौत पर प्रदर्शन सवाल भी उठ रहे हैं।कुछ लोग इस बात की आलोचना भी कर रहे हैं।वरिष्ठ पत्रकार हुसैन अफसर बताते हैं कि यहाँ के शिया समुदाय के लिए यह धार्मिक और भावनात्मक विषय है राजनीतिक कतई नहीं।हुसैन अफ़सर कहते हैं ''शियों के धार्मिक ताल्लुकात ईरान से हैं।ऐसे में अगर ये विरोध हो रहा है और किसी तरह का वायलेंस इसमें नहीं हो रहा तो कोई बुरी चीज नहीं है।हिंदुस्तान के किसी भी व्यक्ति या प्रतिष्ठान या किसी भी सिस्टम को टारगेट नहीं किया जा रहा है बस अपना शोक और गुस्से का लोग इज़हार कर रहे हैं।'' ईरान के कोम (Qom) शहर में लोग शिया धर्मशास्त्र (Theology) का अध्ययन करने जाते हैं।इराक के नजफ़ के बाद कोम भी 70 के दशक से एक बड़ा सेंटर बन गया है।लखनऊ के कई परिवारों के युवा यहाँ पढ़ रहे हैं, कुछ लोग ईरान के दूसरे शहरों ख़ास तौर कर तेहरान में नौकरी भी कर रहे हैं।वो अपनों के लिए फ़िक्रमंद हैं।
ईरान- इज़राइल जंग जारी है और अब भारत में भी तेल संकट पर चर्चा हो रही है।ऐसे में अयातुल्ला अली ख़ामेनेई के बाद अब वहाँ के नेतृत्व और हालात को लेकर लखनऊ का शिया समुदाय क्या सोचता है? यह पूछने पर सैयद हुसैन अफ़सर कहते हैं कि ईरान ने पहले भी बहुत तरह के प्रतिबंध झेले हैं,''देखिए ईरानी बहुत मजबूत लोग हैं क्योंकि उनके ऊपर बीसियों साल से प्रतिबंध लगे रहे।तेल तो खुद का है पर दूसरी चीजें ख़ास तौर पर तमाम बैंकिंग और फाइनशियल प्रतिबंध उनपर लागू है। लेकिन वो उसमें भी वो मज़बूती से लड़ते रहे अब ये है कि इस बार जो लड़ाई है ये बहुत व्यापक रूप ले रही है।इसके बाद में क्या हालात होंगे ये अभी कुछ कहा नहीं जा सकता।''

