
अधीर चौधरी की वापसी: बंगाल के चुनावी खेल में बड़ा दांव
अधीर अभी भी बंगाल में कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में से एक हैं। लेकिन 2024 की हार और युसूफ पठान के जीतने के बाद अधीर काफी अकेले पड़ गए हैं।
लगभग एक साल के बाद मुर्शिदाबाद के 'रॉबिन हुड' कहे जाने वाले अधीर रंजन चौधरी फिर से सुर्खियों में हैं। दो दशकों से अधिक समय तक सांसद रहने के बाद सेलिब्रिटी प्रतिद्वंद्वी ने युसूफ पठान के हाथों 2024 के लोकसभा चुनाव में अपनी सीट बेरहमपुर खो दी थी। लेकिन फिर भी राजनीति में अधीर कभी पूरी तरह से गायब नहीं हो सकते। कांग्रेस नेता अधीर ने बेरहमपुर से लगातार पांच लोकसभा चुनाव जीते। अब पश्चिम बंगाल में 'ग्रैंड ओल्ड पार्टी' के लगभग अंतिम Mohican के रूप में खड़े हैं और राज्य विधानसभा चुनावों से कुछ महीने पहले वे फिर सक्रिय हो गए हैं।
अधीर ने पीएम मोदी से की मुलाकात
30 दिसंबर 2025 को अधीर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दिल्ली में मुलाकात की। वे विशेष रूप से उन राज्यों में बंगाली प्रवासी मजदूरों के मुद्दे को उठाने गए, जहां भाजपा शासन में है। मुलाकात के पांच दिन बाद अधीर ने ओडिशा के सांबलपुर में बंगाल के प्रवासी मजदूरों से मुलाकात की। जुवेल राणा, एक 30 वर्षीय बंगाली प्रवासी मजदूर को शक के आधार पर लिंचिंग का शिकार होना पड़ा था। राणा मुर्शिदाबाद के थे, यानी अधीर के गृह क्षेत्र से। विश्लेषकों का कहना है कि अधीर की यह मुलाकात प्रधानमंत्री से, उनके प्रतिद्वंद्वी ममता बनर्जी के खिलाफ रणनीतिक कदम मानी जा रही है। उन्होंने निजी व्यक्तियों द्वारा बंगाल के मजदूरों से पहचान पत्र मांगे जाने की घटनाओं पर चिंता व्यक्त की और कानून प्रवर्तन एजेंसियों से इसे रोकने का आग्रह किया।
कांग्रेस में अधीर की स्थिति
अधीर अभी भी बंगाल में कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में से एक हैं। लेकिन 2024 की हार और युसूफ पठान के जीतने के बाद अधीर काफी अकेले पड़ गए हैं। इसी हार के बाद उन्होंने लोकसभा में कांग्रेस के शीर्ष नेता का पद राहुल गांधी को खो दिया। इसके कुछ महीने बाद वे बंगाल प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष का पद भी सुभंकर सरकार को दे बैठे। अधीर गानी खान चौधरी परिवार के करीब नहीं हैं, जो मालदा जिले से आते हैं। हालांकि हाल ही में मौसम नूर का कांग्रेस में लौटना अधीर के लिए लाभदायक माना जा रहा है, क्योंकि यह ममता बनर्जी के लिए एक नुकसान है।
भाजपा से रणनीतिक गठबंधन?
अधीर की पीएम मोदी से मुलाकात और बंगाल प्रवासी मजदूरों की रक्षा का मुद्दा उठाना एक सावधानीपूर्ण और रणनीतिक चाल के रूप में देखा जा रहा है। यह न केवल टीएमसी, बल्कि बाएं दल और अपनी पार्टी पर भी असर डाल सकता है। अधीर कहीं यह नहीं दिखा रहे कि वे मोदी के साथ नजदीकी बढ़ा रहे हैं। वे अभी भी दिल्ली में सरकारी बंगले में रहते हैं और बंगाल व दिल्ली में समय बांटते हैं, जबकि वे सांसद नहीं हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि अधीर की यह चाल कांग्रेस को सबक सिखाने की तरह भी देखी जा सकती है। उन्होंने मोदी सरकार के 'घुसपैठियों' पर अभियान की खामियों को उजागर किया, जिससे वे कई पक्षों पर प्रभाव डाल सकते हैं।
विधानसभा चुनाव और राजनीतिक चुनौती
अधीर की चुनौती और जटिल हो गई है। हुमायु कबीर, निलंबित टीएमसी विधायक और नई जनता उन्नयन पार्टी (JUP) के संस्थापक, ने मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की प्रतिकृति का आधारशिला रखी है। जिला मुस्लिम बहुल है और अधीर की सेक्युलर राजनीति के लिए यह नई चुनौती है। 2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव में ध्रुवीकरण और राजनीतिक चालें महत्वपूर्ण रहेंगी। अधीर के लिए सवाल यह है कि क्या वे अपनी खोई हुई राजनीतिक हैसियत और मुर्शिदाबाद की पारंपरिक पकड़ को वापस पा सकेंगे?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बंगाल में नई राजनीतिक समीकरणों के साथ अधीर की राह आसान नहीं होगी। मौसम नूर की वापसी, हुमायुन कबीर का उदय और ममता बनर्जी की मजबूत पकड़ उनके लिए बड़ा चुनौतीपूर्ण परिदृश्य पेश कर रहे हैं। समय ही बताएगा कि अधीर रंजन चौधरी, जो बंगाल के ऐतिहासिक और प्रभावशाली क्षेत्र से आते हैं, क्या अपनी खोई हुई क्राउन वापस पा सकते हैं।

