सोशल समीकरण साधने उतरी TMC, उम्मीदवारों में बड़ा फेरबदल
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सोशल समीकरण साधने उतरी TMC, उम्मीदवारों में बड़ा फेरबदल

TMC ने 291 उम्मीदवार उतारकर नंदीग्राम में बड़ा दांव चला है। 74 विधायकों की छुट्टी कर सामाजिक संतुलन और एंटी-इन्कम्बेंसी से निपटने की रणनीति अपनाई है।


पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने मंगलवार (17 मार्च) को 294 में से 291 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी। इस सूची से साफ संकेत मिलता है कि पार्टी एंटी-इन्कम्बेंसी (सत्ता विरोधी लहर) से निपटने, अपने सामाजिक समीकरण को मजबूत करने और कुछ चौंकाने वाले दांव खेलने की रणनीति पर काम कर रही है।

सबसे ज्यादा चर्चा नंदीग्राम सीट को लेकर है, जहां टीएमसी ने विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी के पूर्व करीबी सहयोगी पवित्र कर को मैदान में उतारा है। गौरतलब है कि 2021 में इसी सीट पर अधिकारी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को बेहद करीबी मुकाबले में हराया था।दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने एक बार फिर सुवेंदु अधिकारी को नंदीग्राम से उम्मीदवार बनाया है। इसके अलावा उन्हें दक्षिण कोलकाता के भवानीपुर में भी ममता बनर्जी के खिलाफ उतारकर मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है।

नंदीग्राम में टीएमसी का रणनीतिक दांव

पवित्र कर की उम्मीदवारी टीएमसी की “पोच एंड काउंटर” रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। 2021 चुनाव से पहले वह सुवेंदु अधिकारी के साथ भाजपा में शामिल हो गए थे और उनके चुनाव एजेंट के रूप में काम करते हुए बूथ स्तर पर प्रबंधन और हिंदू मतदाताओं को संगठित करने में अहम भूमिका निभाई थी।टीएमसी में दोबारा शामिल होने के कुछ ही घंटों बाद उन्हें टिकट देना इस बात का संकेत है कि पार्टी अधिकारी की चुनावी रणनीति और नेटवर्क की अंदरूनी जानकारी का फायदा उठाना चाहती है।

नंदीग्राम का जातीय और धार्मिक समीकरण भी इस फैसले को अहम बनाता है। यहां लगभग 65–70 प्रतिशत हिंदू और 30–35 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं। पिछले चुनाव में भाजपा की जीत का कारण हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण माना गया था, जिसमें पवित्र कर की भूमिका अहम रही थी। अब टीएमसी उन्हें उतारकर इस समीकरण को तोड़ने और अपने पारंपरिक अल्पसंख्यक वोट बैंक को बनाए रखने की कोशिश कर रही है।

भवानीपुर में सीधा मुकाबला

जहां नंदीग्राम चर्चा में है, वहीं राजनीतिक फोकस भवानीपुर पर भी है, जहां ममता बनर्जी फिर से चुनावी मैदान में हैं। भाजपा ने यहां सुवेंदु अधिकारी को उतारकर राज्य की दो बड़ी राजनीतिक हस्तियों के बीच सीधी टक्कर करा दी है।

उम्मीदवारों में बड़ा बदलाव

टीएमसी की उम्मीदवार सूची में बड़े स्तर पर फेरबदल भी देखने को मिला है। पार्टी ने 74 मौजूदा विधायकों को टिकट नहीं दिया, जो कुल का लगभग एक-तिहाई है। इनमें कई बड़े और मंत्री पद संभाल चुके नेता भी शामिल हैं।इसके अलावा 15 विधायकों को दूसरी सीटों पर शिफ्ट किया गया है। यह बदलाव सीट-दर-सीट जीत की संभावना के आकलन के आधार पर किया गया है, जिसमें चुनाव रणनीतिकार आई-पैक की अहम भूमिका रही है।

सामाजिक समीकरण को साधने की कोशिश

टीएमसी ने अपने सामाजिक गठबंधन को मजबूत करने पर भी ध्यान दिया है। इस बार 52 महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया गया है, जो पिछले चुनाव से थोड़ा अधिक है।अल्पसंख्यक उम्मीदवारों की संख्या भी 42 से बढ़ाकर 47 कर दी गई है, जो इस वर्ग पर पार्टी की निर्भरता को दर्शाती है। इसके अलावा अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग से 95 उम्मीदवार उतारे गए हैं (78 एससी और 17 एसटी), जो आरक्षित सीटों से भी ज्यादा है।राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह भाजपा के बढ़ते प्रभाव के बीच वंचित वर्गों में समर्थन मजबूत करने की कोशिश है।

पीढ़ीगत संतुलन और सहयोगी दल

उम्मीदवार सूची में पीढ़ीगत संतुलन भी देखने को मिला है। लगभग 44 प्रतिशत उम्मीदवार 31 से 50 वर्ष आयु वर्ग के हैं, जिनमें युवा और अनुभवी नेताओं का मिश्रण है।ममता बनर्जी ने सूची जारी करते हुए कहा कि उनकी पार्टी ही ऐसी है, जिसके पास दूसरी पीढ़ी के नेता तैयार हैं।

टीएमसी ने पहाड़ी क्षेत्रों की तीन सीटें—दार्जिलिंग, कालिम्पोंग और कुरसेओंग—अपने सहयोगी भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा को दी हैं, जिसका नेतृत्व अनित थापा करते हैं।

कुल मिलाकर, टीएमसी की यह उम्मीदवार सूची एक सोची-समझी रणनीति को दर्शाती है, जिसमें सत्ता विरोधी माहौल को कम करना, सामाजिक समीकरण मजबूत करना और विपक्ष के मजबूत नेताओं को घेरना शामिल है।

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