यूजीसी फैसले का सियासी असर, यूपी में बीजेपी के लिए जीत या जोखिम?
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यूजीसी फैसले का सियासी असर, यूपी में बीजेपी के लिए जीत या जोखिम?

यूजीसी के नए समता नियमों ने सियासी विवाद खड़ा कर दिया है। सवर्ण विरोध और पिछड़े वर्गों की राजनीति के बीच बीजेपी यूपी चुनाव से पहले मुश्किल फैसले के दौर में है।


यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) के नए समता (इक्विटी) दिशा-निर्देशों को लेकर देश में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। वरिष्ठ पत्रकार अदिति फडनीस और जावेद अंसारी ने एक पैनल चर्चा में इन नियमों के राजनीतिक असर, जातिगत समीकरणों, दलों के भीतर तनाव और खासकर उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बीजेपी की चुनावी संभावनाओं पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में गहराई से अपने नजरिए को पेश किया।

सुप्रीम कोर्ट का दबाव और नीतिगत असर

पैनल चर्चा की शुरुआत यूजीसी के नए समता दिशा-निर्देशों की पृष्ठभूमि से हुई। अदिति फडनीस ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया था कि वह शैक्षणिक परिसरों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए। यह निर्देश रोहित वेमुला की आत्महत्या जैसी दुखद घटनाओं के संदर्भ में आया था।


इसी के अनुपालन में यूजीसी ने ऐसे नियम बनाए, जिनके तहत छात्र भेदभाव से जुड़ी शिकायतें दर्ज करा सकें। हालांकि, इन दिशा-निर्देशों के लागू होते ही सवर्ण समुदाय के एक हिस्से में विरोध शुरू हो गया। उनका आरोप है कि ये नियम उनके खिलाफ संस्थागत भेदभाव को बढ़ावा देंगे।

फडनीस ने यह भी बताया कि ये दिशा-निर्देश जगदीश कुमार के कार्यकाल में बने, जो जेएनयू के पूर्व कुलपति रह चुके हैं और जिनकी पहचान आरएसएस से जुड़ी मानी जाती है। इस कारण इस मुद्दे पर राजनीतिक निगरानी और बढ़ गई है।

बीजेपी के पारंपरिक आधार से विरोध

जावेद अंसारी ने कहा कि विडंबना यह है कि इस नीति का विरोध बीजेपी के उसी पारंपरिक सवर्ण वोटबैंक से हो रहा है, जो अब खुद को अपनी ही सरकार द्वारा लाए गए नियमों से ठगा हुआ महसूस कर रहा है।

बीजेपी की राजनीतिक रस्साकशी

अंसारी के मुताबिक, बीजेपी इस वक्त एक कठिन राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा, “हिंदी पट्टी—खासतौर पर यूपी और बिहार में पिछड़े वर्गों का वर्चस्व है। ऐसे में एससी, एसटी और ओबीसी मतदाताओं को नाराज़ करना पार्टी के लिए खतरनाक हो सकता है।”

दूसरी ओर, सवर्ण समर्थक खुद को उपेक्षित मानते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को निशाने पर ले रहे हैं। हालांकि अंसारी ने साफ किया कि ऐसे फैसले किसी एक मंत्री की मर्जी से नहीं होते।“यह कोई तुगलकी फरमान नहीं है। ऐसे नियम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और उच्चस्तरीय संस्थागत प्रक्रिया के तहत बनाए जाते हैं,” उन्होंने कहा। उनका मानना है कि गुस्सा व्यक्तियों पर निकाला जा रहा है, जबकि असल में यह एक न्यायिक और संस्थागत प्रक्रिया का नतीजा है।

भाषा की गलत व्याख्या से बढ़ा विवाद

यूजीसी दिशा-निर्देशों के सेक्शन 31C में इस्तेमाल किए गए शब्द “particularly” (विशेष रूप से) ने विवाद को और हवा दी। यह प्रावधान एससी, एसटी, ओबीसी और ईडब्ल्यूएस छात्रों को भेदभाव से बचाने के लिए है। अदिति फडनीस ने स्पष्ट किया कि कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि यह सुरक्षा केवल इन्हीं वर्गों तक सीमित है।

हालांकि, जावेद अंसारी के अनुसार, सवर्ण समुदाय के कई लोग particularly को एक्सक्लुसिवली यानी केवल के रूप में समझ रहे हैं, जिससे अविश्वास गहराता जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालयों में आज भी कुलपति, वरिष्ठ प्रोफेसर और शीर्ष प्रशासनिक पदों पर सवर्णों की मजबूत मौजूदगी है, इसके बावजूद यह धारणा बन रही है कि पूरा तंत्र अब उनके खिलाफ झुक गया है।

गहरी जातिगत असुरक्षा

अदिति फडनीस का मानना है कि यह विरोध समता के सिद्धांत के खिलाफ नहीं, बल्कि सवर्ण समाज की गहरी जातिगत असुरक्षा को दर्शाता है। यह असुरक्षा तब भी बनी हुई है, जब बीजेपी सरकार ने ईडब्ल्यूएस आरक्षण लागू किया और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत लगातार जाति को हिंदू समाज का अभिशाप बताते रहे हैं।

फडनीस ने याद दिलाया कि पिछले लोकसभा चुनावों में बीजेपी सांसदों के संविधान बदलने और आरक्षण खत्म करने जैसे बयानों का पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा। बीजेपी की सीटें 303 से घटकर 240 रह गईं, जबकि कांग्रेस 45 से बढ़कर 91 सीटों पर पहुंच गई।

खतरनाक सामाजिक प्रयोग?

जावेद अंसारी ने चेतावनी दी कि समता जैसे संवेदनशील मुद्दे का राजनीतिकरण समाज के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। उन्होंने इसकी तुलना मंडल आयोग के दौर से की और कहा कि अगर इस गुस्से को सही ढंग से नहीं संभाला गया, तो यह समाज को तोड़ सकता है और स्थायी नुकसान पहुंचा सकता है।

उन्होंने कहा कि सामाजिक एकता की बात करने वाली बीजेपी की वैचारिक विसंगतियां भी इस मामले में उजागर हो गई हैं। सरकारी गजट में प्रकाशित समता दिशा-निर्देशों ने पार्टी और समाज के भीतर की जातिगत दरारों को सामने ला दिया है।

उत्तर प्रदेश में चुनावी असर

उत्तर प्रदेश में एक साल से भी कम समय में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में दोनों पत्रकारों ने इस मुद्दे के गंभीर राजनीतिक परिणामों की आशंका जताई।अदिति फडनीस ने कहा कि बीजेपी चाहे जो रास्ता चुने, उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है। अगर दिशा-निर्देशों को कमजोर किया गया या जनरल कैटेगरी को स्पष्ट रूप से जोड़ा गया, तो पिछड़े वर्ग इसे विश्वासघात मान सकते हैं। और अगर नियम जस के तस रहे, तो सवर्ण नाराज़गी बनी रह सकती है।

जावेद अंसारी ने गणितीय सच्चाई की ओर इशारा करते हुए कहा, “संख्या के लिहाज से ओबीसी, सवर्णों से कहीं ज्यादा हैं।” हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि वोटिंग पैटर्न पूरी तरह एकरूप नहीं होते और बीजेपी को बेहद सावधानी से कदम रखना होगा। उन्होंने संभावना जताई कि सरकार राजनीतिक संतुलन के लिए दिशा-निर्देशों में “जनरल कैटेगरी” शब्द जोड़ सकती है, ताकि संदेश भी जाए और मूल भावना भी ज्यादा न बदले।

अकादमिक संस्थानों में जाति की जड़ें

अदिति फडनीस ने चर्चा में एक और उदाहरण जोड़ते हुए जेएनयू की कुलपति शांतिश्री धुलिपुडी पंडित के बयान का जिक्र किया, जिसमें उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी नियुक्ति का श्रेय अपने लिंग और जाति को दिया था। फडनीस के मुताबिक, यह चिंताजनक है कि ऐसे मौकों पर अकादमिक योग्यता को प्राथमिकता नहीं दी जाती। यह दिखाता है कि संस्थानों में जाति की जड़ें कितनी गहरी हैं और इसी वजह से यूजीसी जैसे सुधारों का विरोध स्वाभाविक रूप से सामने आता है।

बड़ा राजनीतिक दांव

पैनल के दोनों सदस्यों की राय में बीजेपी इस समय एक बेहद पतली राजनीतिक रस्सी पर चल रही है। यह कदम सामाजिक सुधार की ईमानदार कोशिश है या सोचा-समझा चुनावी दांव यह बहस का विषय है, लेकिन जोखिम बहुत बड़े हैं, सामाजिक भी और राजनीतिक भी। जैसे-जैसे यूपी चुनाव नजदीक आएंगे, बीजेपी को फैसला करना होगा सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर कायम रहे और अपने पारंपरिक समर्थकों की नाराज़गी झेले, या समता से समझौता कर पिछड़े वर्गों का भरोसा खो दे। जैसा कि जावेद अंसारी ने कहा, “जो भी रास्ता चुना जाएगा, चोट लगेगी।”

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