
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद मामले में योगी–केशव के बयान अलग, सरकार के दो रुख कैसे?
माघ मेले में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को रोके जाने से विवाद बढ़ा। योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य के अलग बयान, संतों व विपक्ष की एंट्री से सियासत तेज हो गई।
18 जनवरी मौनी अमावस्या का दिन, प्रयागराज माघ मेले में साधु-संत और श्रद्धालु गंगा में डुबकी लगा रहे थे। लेकिन मामला तब बिगड़ गया जब ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पालकी में सवार होकर अपने शिविर से स्नान करने के लिए निकले। लेकिन प्रशासन ने पैदल जाने का हवाला देते हुए उन्हें रोका और उसके बाद से माहौल गर्म है। इस मामले में पहले साधु संत कूदे और बाद में सियासत की भी एंट्री हो गई।
इस प्रकरण में विपक्ष की तरफ से जो आवाजें उठ रही हैं वो सियासत का अपना तकाजा है। लेकिन जिस तरह से यूपी सरकार के नंबर एक यानी योगी आदित्यनाथ और उनके डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के बयान आए। उससे सवाल उठ खड़ा होता है कि एक ही मुद्दे पर सरकार का दो रुख कैसे हो सकता है। क्या शंकराचार्य प्रकरण के बीच यूपी सरकार में योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य में शीतयुद्ध एक नए कलेवर में सामने आ रहा है।
योगी आदित्यनाथ ने कहा कि कुछ लोग सनातन परंपरा को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं और उसके साथ ही कालनेमि का जिक्र किया। इन सबके बीच डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि वो शंकराचार्य से अपील करते हैं कि वो गंगा स्नान करें और विवाद को खत्म करें। अब उनके इस बयान के बाद अविमुक्तेश्वरानंद की तरफ से दो खास बयान आए।
अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि क्या हम उनके टुकड़ों पर जी रहे हैं। चोला तो साधु का और हो रही है गोहत्या, अब आप ही बताइए कि कालनेमि कौन। कुछ लोग सनातन को कमजोर कर रहे हैं। सनातन में परंपरा है कि राजा और धर्माचार्य अलग होते थे। राजगुरु होते थे, राजा खुद गुरु नहीं होते थे। ये तो मुस्लिमों में परंपरा है, वहां खलीफा परंपरा है। इसका अर्थ यह होता है कि जो राष्ट्र का अध्यक्ष होता है वही धर्मगुरु भी होता है।
हिंदू धर्म में खलीफा परंपरा को लाने का प्रयास हो रहा है। हकीकत तो यह जो राजा है वो ही गुरु है, जो लोग हिंदू धर्म में खलीफा परंपरा लाने की कोशिश कर रहे हैं वो ही हिंदू धर्म को कमजोर कर रहे हैं। राजा को गुरु नहीं और गुरु को राजा नहीं होना चाहिए। दोनों की भूमिकाएं अलग अलग हैं। भाई कालनेमि कौन है, कालनेमि राक्षस था और साधु बनकर सामने दिखाई दे रहा था। राक्षस क्या करता था, ब्राह्मण, इंसान और गायों को मारा करता था।
यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के बयान स्नान करने और विवाद को विराम देने वाले बयान पर अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि यह बीजेपी की पहले वाली भावना है। लेकिन आज वाली बीजेपी लोगों को स्वीकार नहीं है। आदर से स्नान की परंपरा है, निरादर से स्नान की पंरपरा नहीं है। इसके साथ ही सियासी तौर पर तीर भी छोड़ा कि मुख्यमंत्री तो केशव प्रसाद मौर्य को बनना चाहिए। अब इस बयान के बाद यूपी की सियासत में खासतौर से बीजेपी के अंदर मतभेद की खबरों को और बल मिला है।
यूपी में विपक्षी दल खासतौर से समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव बार बार यह कहते हैं कि पार्टी को जीत किसी और के चेहरे पर मिली। लेकिन जब सरकार के मुखिया की बात आई तो कमान किसी और को सौंप दी गई। दरअसल बीजेपी का यही मूल चरित्र है कि पिछड़ों, दलितों और वंचितों को वोटबैंक की तरह इस्तेमाल करो। लेकिन सत्ता के शीर्ष पर जब जिम्मेदारी देने की बात हो तो मौका किसी और को दे दो।
आपको याद होगा कि 2022 में विधानसभा चुनाव से पहले किस तरह केशव प्रसाद मौर्य ने योगी आदित्यनाथ के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था। हर एक दिन बयानों से बीजेपी के अंदर की कलह खुलकर सामने आ रही थी। विपक्ष के नेता कहा करते थे कि यूपी में सत्ता के दो केंद्र हैं एक केंद्र यानी सीएम नहीं चाहते हैं कि पिछड़े समाज से आने वाला शख्स अपनी बात को रख सके। चर्चा यहां तक गरम थी कि केशव प्रसाद मौर्य पार्टी से विद्रोह कर सकते हैं। इन सबके बीच केंद्रीय आलाकमान हरकत में आया और दोनों को समझा कर यह संदेश दिया कि यूपी में सत्ता की साझेदारी में किसी तरह की अड़चन नहीं है।
जानकार कहते हैं कि बीजेपी को यह अच्छी तरह से पता है कि अगर यूपी हाथ से निकला तो सिर्फ एक सूबा नहीं जाएगा बल्कि दिल्ली से भी रुखसती हो जाएगी। इसके साथ ही सियासी हलकों में इस बात की चर्चा अब भी होती है कि योगी आदित्यनाथ आलाकमान की पहली पसंद नहीं थे। परिस्थितिवश उनको सूबे की कमान दी गई। लेकिन रिश्ते कभी सामान्य नहीं रहे। ऐसे में क्या माघ मेले का प्रकरण कोई और राह खोल रहा है। क्या अविमुक्तेश्वरानंद की आड़ में कोई बदलाव नजर आएगा।
सियासी जानकार कहते हैं कि राजनीति में कभी कुछ भी हो सकता है। माघ मेले के इस प्रकरण में जिस तरह से साधु संत भी दो खेमे में बंट चुके हैं वो जगजाहिर है। लेकिन जिस तरह से केशव प्रसाद मौर्य ने योगी आदित्यनाथ के तीखे बोल के बाद शंकराचार्य से अपील की उससे साफ है कि वो योगी के कालनेमि की शब्दावली से इत्तेफाक नहीं रखते।
एक ही विषय पर सरकार का नंबर 1 और नंबर दो अलग अलग तरह के विचार रखें तो भ्रम की स्थिति का निर्माण करता है और उन सबके बीच अविमुक्तेश्वरानंद का केशव मौर्य को सीएम पद के लिए उचित चेहरा बताने के बाद बीजेपी की आंतरिक राजनीति में छौंक लगाने का काम किया है। इस विषय पर बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व चुप्पी साधे है। ऐसे में दिल्ली की तरफ से क्या कुछ कहा जाता है देखने वाली बात होगी। लेकिन यूपी में नंबर 1 और नंबर 2 के बीच तनातनी पर चर्चा को आधार मिल चुका है।

