
UP में 25 हज़ार करोड़ का काग़ज़ी निवेश धराशायी ! चार दिन में ही रद्द हुआ Puch AI के साथ MoU
आधिकारिक बयान में बताया गया कि 'मानक प्रोटोकॉल के तहत समीक्षा में कंपनी पर्याप्त नेटवर्थ और प्रोजेक्ट के पैमाने के लिए जरूरी विश्वसनीय वित्तीय लिंकेज नहीं दिखा पाई।कंपनी ने SOP के अनुसार जरूरी दस्तावेज़ समय पर उपलब्ध नहीं कराए।’
उत्तर प्रदेश सरकार ने AI स्टार्टअप Puch AI के साथ किया गया 25 हज़ार करोड़ रुपए का एमओयू( MoU) कैंसिल कर दिया है। मुख्यमंत्री की नाराज़गी और इस करार पर गंभीर सवाल उठने के बाद इस एमओयू को आधिकारिक रूप से रद्द करने की घोषणा की है।पिछले पाँच दिन से सियासी गलियारों में इसको लेकर चर्चा हो रही थी कि आख़िर ज़रूरी छानबीन के बिना और कंपनी के साख का पता किए बगैर यह एमओयू कैसे साइन किया गया।इसके लिए ज़िम्मेदार कैन है? हालाँकि इसको रद्द करने के फ़ैसले को साझा करते हुए 'इन्वेस्ट यूपी’( Invest UP) ने कहा कि ज़रूरी जानकारी मांगने पर कंपनी नहीं दे पायी तब यह समझौता रद्द हुआ लेकिन ये भी सच है कि इससे औद्योगिक विकास विभाग की कार्यशैली पर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं।
4 दिन में ही 25 हज़ार करोड़ का समझौता रद्द-
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने बेंगलुरु स्थिति स्टार्ट अप कंपनी पुच एआई ( Puch AI) के साथ हस्ताक्षरित करार ( MoU) को आख़िरकार रद्द कर दिया।पुच AI के साथ 23 मार्च को 25 हज़ार करोड़ रुपये का MoU किया गया था।यूपी में निवेश और कारोबार के लिए अधिकृत इन्वेस्ट यूपी( Invest UP) की ओर से जारी आधिकारिक बयान में बताया गया कि 'मानक प्रोटोकॉल के तहत समीक्षा में कंपनी पर्याप्त नेटवर्थ और प्रोजेक्ट के पैमाने के लिए जरूरी विश्वसनीय वित्तीय लिंकेज नहीं दिखा पाई।कंपनी ने SOP के अनुसार जरूरी दस्तावेज़ समय पर उपलब्ध नहीं कराए।’ इसके साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि पारदर्शिता और उच्चतम स्तर की ईमानदारी के हित में समझौते को रद्द किया गया है।
MoU 25 हज़ार करोड़ का, रेवन्यू 50 लाख से कम-
दरअसल puch AI के साथ MoU की बात सामने तब आई जब 23 मार्च को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक्स अकाउंट से पोस्ट कर बताया गया कि Puch AI के साथ 25 हज़ार करोड़ का समझौता किया गया है। कंपनी यूपी में AI पार्क, बड़े पैमाने पर डेटा सेंटर और एक AI यूनिवर्सिटी बनाने में मदद करेगी।इसे 'उत्तर प्रदेश को भारत का पहला AI प्रदेश’ बनाने की दिशा में कदम बताया गया।घोषणा के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर भारी आलोचना शुरू हो गई।लोगों ने इस बात पर सवाल उठाए कि Puch AI महज एक साल पुराना स्टार्टअप है जिसकी सालाना रेवेन्यू मात्र 50 लाख से भी कम है।यही नहीं कंपनी के पास बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट चलाने का कोई ट्रैक रिकॉर्ड नहीं था।मुख्यमंत्री की ओर से इसकी जाँच के लिए निर्देश दिए गए।सीएम योगी आदित्यनाथ ने 25 मार्च को एक्स पर स्पष्ट किया कि अगर कंपनी की क्षमता नहीं है तो MoU रद्द कर दिया जाएगा।उन्होंने कहा कि यह बाइंडिंग नहीं है और समीक्षा चल रही है।
निवेश के आंकड़ों पर विपक्ष पहले भी लगाता रहा है आरोप-
हालाँकि इस एमओयू से यूपी सरकार की फजीहत हुई।इससे करार रद्द होने के बाद भी यूपी में निवेश और विभागों की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठना भी लाजिमी है।सिर्फ़ 5 दिन के भीतर एमओयू के कैंसिल होने से न सिर्फ़ इस तरह के करार को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं बल्कि इसके पीछे सोशल मीडिया पर लगते आरोप और मुख्यमंत्री की नाराज़गी है।सवाल यह उठ रहा है कि इतने बड़े प्रोजेक्ट को बिना किसी जाँच के MoU के लिए हरि झंडी कैसे मिल गई? या कौन वो नौकरशाह और लोग थे जिन्होंने इस MoU को हस्ताक्षरित कराने में अपनी भूमिका निभाई।इसके साथ ही यह भी सवाल उठ रहे हैं कि अब इसके लिए ज़िम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई की जाएगी ? वरिष्ठ पत्रकार मनमोहन कहते हैं कि '' इससे पहले भी विपक्ष यूपी में निवेश को लेकर आरोप लगाता रहा है।अब विपक्ष को इस देर फिर मुद्दा मिल गया है।ग्लोबल समिट में जो हज़ारों-लाखों रुपए के करार हुए उनपर भी विपक्ष सवाल उठा चुका है।इन्वेस्ट यूपी के सीईओ को भी रिश्वत के आरोप में ही हटाया गया था अब उनकी बहाली भी हो गई है जबकि जिस निकांत जैन ने उनके कहने पर रिश्वत लेने को बात कही थी उसको जेल भेजा गया है।इस बार की घटना से विपक्ष के आरोपों को बल मिल रहा है।’’
इस बार समझौते के बाद मामला तूल पकड़ गया और मुख्यमंत्री की नाराज़गी के बाद इन्वेस्ट यूपी ने इसकी छानबीन की।पुच एआई के साथ एम ओ यू के मुद्दे को समाजवादी पार्टी ने भी उठाया और यूपी सरकार को इस तरह के MoU करने के लिए निशाने पर लिया। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने तो
योगी सरकार में हुए सभी MoU की जाँच कराने की माँग की।दरअसल पुच एआई के एमओयू के बाद एक बार फिर इन्वेस्ट यूपी जैसी एजेंसी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं।हालाँकि विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि 'सिर्फ कंपनी की क्षमता और फाइनेंशियल क्रेडिबिलिटी पर सवाल थे। इसलिए इस करार को रद्द किया गया है।इसमें न उस स्टार्टअप कंपनी का कोई पुराना डिफॉल्ट सामने आया है न ही विभाग की ओर से किसी तरह की कोई अनियमितता हुई।’
पहले MoU फिर जाँच के लिए दोषी कौन ?
फ़िलहाल यूपी सरकार ने इसे पारदर्शिता के लिए लिया गया फ़ैसला बताया है।लेकिन विपक्ष का आरोप है कि मामला सार्वजनिक होने और किरकिरी होने के बाद यह फ़ैसला मजबूरी में लेना पड़ा।अगर ऐसा नहीं होता तो यूपी सरकार इतना बड़ा करार बिना किसी बैकग्राउंड जाँच के ही कर लेती।वरिष्ठ पत्रकार मनमोहन कहते हैं ''इन्वेस्ट यूपी का कहना कि जाँच में कमी पायी गई इसलिए करार रद्द हुआ।लेकिन सवाल तो यह है कि MoU होने से पहले जाँच की जाती है न कि बाद में।25 हज़ार करोड़ का एमओयू बिना किसी जाँच के ही कर लिया गया यह बात बेहद गंभीर है।इसका तो एक मतलब यह भी है कि मुख्यमंत्री को अधिकारी धोखे में रख रहे हैं।सवाल यह भी है कि जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होगी?’’

