हाई कोर्ट में सरकार का बड़ा वादा: क्या टल जाएंगे यूपी पंचायत चुनाव?
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हाई कोर्ट में सरकार का बड़ा वादा: क्या टल जाएंगे यूपी पंचायत चुनाव?

बिना 'ट्रिपल टेस्ट' और नए आयोग के नहीं होंगे चुनाव; हाई कोर्ट में यूपी सरकार ने दी जानकारी, समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट पर ही तय होगा OBC आरक्षण, 504 पंचायतें हुईं कम।


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UP Panchayat Elections : उत्तर प्रदेश में आगामी त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर कानूनी और राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान योगी सरकार ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। सरकार ने अदालत को भरोसा दिलाया है कि पंचायत चुनाव से पहले एक 'समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग' का गठन किया जाएगा। इस आयोग की रिपोर्ट और नए सिरे से किए जाने वाले 'रैपिड सर्वे' के आधार पर ही ओबीसी (OBC) आरक्षण लागू होगा। यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय चुनावों में आरक्षण के लिए 'ट्रिपल टेस्ट' की शर्त अनिवार्य की है। सरकार के इस जवाब के बाद हाई कोर्ट ने संबंधित याचिका को निस्तारित कर दिया है। राज्य में पंचायत चुनाव इसी साल अप्रैल-मई में प्रस्तावित हैं, लेकिन आरक्षण के नए फार्मूले के कारण इसकी तारीखों को लेकर न केवल अब भी सस्पेंस बरकरार है बल्कि चुनावों का टलना भी तय माना जा रहा है।


क्या है सुप्रीम कोर्ट का 'ट्रिपल टेस्ट' और क्यों पड़ी नए आयोग की जरूरत?
सुप्रीम कोर्ट ने विकास किशनराव गवली मामले में स्पष्ट निर्देश दिया था कि स्थानीय निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण के लिए तीन शर्तें पूरी होनी चाहिए। पहली - एक समर्पित आयोग का गठन, दूसरी - आयोग की सिफारिशों के आधार पर आरक्षण का अनुपात तय करना, और तीसरी - कुल आरक्षण की सीमा 50% से अधिक न होना। याचिकाकर्ता मोतीलाल यादव ने दलील दी थी कि पिछड़े वर्ग आयोग का कार्यकाल अक्टूबर 2025 में ही समाप्त हो चुका है। ऐसे में बिना समर्पित आयोग के चुनाव कराना सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना होगी। सरकार ने कोर्ट को बताया कि 6 सदस्यीय आयोग के गठन का मामला कैबिनेट के समक्ष विचाराधीन है और चुनाव से पहले इसे हर हाल में पूरा कर लिया जाएगा।

इस बार 504 ग्राम पंचायतें कम, 36 जिलों में बड़ा बदलाव
पंचायती राज निदेशालय की ओर से जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस बार उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों की संख्या कम हो गई है। वर्ष 2021 में जहाँ 58,199 ग्राम पंचायतों में चुनाव हुआ था, वहीं इस बार 57,695 पंचायतों में ही वोट डाले जाएंगे। पंचायतों की संख्या घटने का सबसे बड़ा कारण शहरी सीमा का विस्तार है। कई ग्रामीण इलाके अब नगर पालिकाओं और नगर निगमों का हिस्सा बन चुके हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, देवरिया में सबसे ज्यादा 64, आजमगढ़ में 47 और प्रतापगढ़ में 45 पंचायतें कम हुई हैं। इन बदलावों के कारण वार्डों का परिसीमन भी बदला है, जिससे चुनावी समीकरणों में बड़ा फेरबदल होना तय है।

57 हजार से ज्यादा प्रधान और 75 जिला पंचायत अध्यक्षों का होगा चुनाव
पंचायत चुनाव की तैयारियों के बीच निर्वाचन विभाग ने पदों की संख्या निश्चित कर दी है। इस बार 57,695 ग्राम प्रधानों के अलावा, 826 ब्लॉक प्रमुख और 75 जिला पंचायत अध्यक्ष चुने जाएंगे। इसके साथ ही लाखों की संख्या में ग्राम पंचायत और क्षेत्र पंचायत (BDC) सदस्यों का चुनाव भी होगा। शहरी क्षेत्रों में शामिल हुए मजरों को अब अगल-बगल की ग्राम पंचायतों में समाहित किया जा रहा है। ऐसे में प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती वोटर लिस्ट और आरक्षण चार्ट को नए सिरे से अपडेट करने की है। सरकार की कोशिश है कि 14 फरवरी तक वोटर लिस्ट का अंतिम प्रकाशन कर दिया जाए।

गांवों में बिछने लगी चुनावी बिसात: वादों और दावों का दौर शुरू
हाई कोर्ट के फैसले और सरकारी तैयारियों के बीच गांवों में चुनावी सरगर्मी बढ़ गई है। चौराहों पर 'प्रधानी' को लेकर चर्चाएं आम हैं। वर्तमान प्रधान अपनी उपलब्धियां गिना रहे हैं, तो वहीं नए प्रत्याशी ग्रामीणों को लुभाने के लिए हर संभव हथकंडे अपना रहे हैं। हालांकि, ओबीसी आरक्षण की नई सूची का इंतजार प्रत्याशियों की धड़कनें बढ़ा रहा है। कई सीटों पर आरक्षण की स्थिति बदलने की संभावना है, जिससे सालों से तैयारी कर रहे उम्मीदवारों के समीकरण बिगड़ सकते हैं। योगी सरकार का बजट भी इस बार ग्रामीण विकास की ओर झुका हुआ दिखा, जिसे चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है।


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