शंकराचार्य प्रकरण में बयानबाजी का गणित, क्या है अंदरूनी सियासी समीकरण?
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शंकराचार्य प्रकरण में बयानबाजी का गणित, क्या है अंदरूनी सियासी समीकरण?

माघ मेले में शंकराचार्य की पालकी रोके जाने के मुद्दे पर सीएम योगी आदित्यनाथ और दो डिप्टी सीएम के बयान अलग अलग हैं। योगी, मौर्य और पाठक के अलग बयानों से यूपी सरकार में मतभेद की चर्चा तेज।


यूपी की सियासत में वैसे तो कई मुद्दे हैं। लेकिन इस समय शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद प्रकरण सुर्खियों में हैं। वजह यह नहीं कि विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार की घेरेबंदी कर रहा है बल्कि जिस तरह से प्रयागराज माघ मेले में अविमुक्तेश्वरानंद की पालकी रोकी गई, बटुकों की चोटी खींची गई वो माघ मेले के संपन्न होने के बाद भी चर्चा है। यूपी सरकार के तीन बड़े चेहरे जैसे सीएम योगी आदित्यनाथ, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और दूसरे डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक के सुर अलग अलग हैं। अब आप सोच सकते हैं कि एक ही विषय पर सरकार के नंबर एक, नंबर दो और नंबर तीन के राग अलग क्यों है। सबसे पहले किसने क्या कहा है या कहा था उसे समझिए।

इस विषय पर यूपी के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक की तरफ से बयान आया है। ब्रजेश पाठक ने कहा कि बटुकों की चोटी नहीं खींचनी चाहिए थी। बल प्रयोग करना था तो लाठी उठा लेते। चोटी खींचना महाअपराध है। देखिएगा महापाप लगेगा।

आपको याद होगा कि माघ मेले में पालकी को रोके जाने, बटुको के चोटी खींचने और पिटाई के मुद्दे पर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अनशन पर बैठे, स्नान करने से इनकार किया और बाद में बिना स्नान किये काशी यानी वाराणसी चले गए। हालांकि विवाद के दौरान डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने अपील की थी कि शंकराचार्य स्नान करें और विवाद को खत्म करें। इस विषय पर मौर्य से सवाल किया गया था कि प्रशासन और सरकार का रुख क्या है। इस मामले में मौर्य ने कहा कि अगर उनसे कहा जाएगा तो निश्चित तौर पर वो पहल करेंगे। लेकिन जमीनी स्तर पर जब कुछ नजर नहीं आया तो अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि केशव मौर्य आखिर किस बात का इंतजार कर रहे हैं दरअसल वो रीढ़विहीन है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह था कि यूपी के सीएम आखिर क्या कुछ कहते हैं।

शंकराचार्य प्रकरण पर सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि क्या कोई खुद को शंकराचार्य कह सकता है। इसके लिए विद्वता परिषद है और वो फैसला करता है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि क्या यूपी का हर एक शख्स मुख्यमंत्री और मंत्री कह सकता है। यह एक व्यवस्था है और वो ऐसा मानते हैं कि हर एक को सिस्टम का सम्मान करना चाहिए। अब योगी आदित्यनाथ के इस बयान के बाद शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि एक योगी, राजा कैसे हो सकता है। दरअसल यूपी के सीएम खलीफा बनना चाहते हैं जबकि सनातन में खलीफा की संकल्पना नहीं है।

सवाल यह है कि शंकराचार्य के मुद्दे पर अलग अलग रुख क्यों है। इस विषय पर यूपी की सियासत पर नजर रखने वाले कहते हैं कि इसकी पुरानी पृष्ठभूमि है। शंकराचार्य प्रकरण को आप तात्कालिक मुद्दा मान सकते हैं। योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य के बीच तनातनी का अपना इतिहास है। अगर आप 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव के नतीजों को देखें तो प्रचंड बहुमत के साथ बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब हुई। पिछले दो दशकों का सूखा खत्म हुआ था। 2017 में यूपी बीजेपी के अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य हुआ करते थे। यह कहा भी गया कि सांगठनिक स्तर पर मौर्य ने मेहनत की थी और नतीजे में उनका अहम योगदान था। हालांकि सीएम की रेस में वो योगी आदित्यनाथ से पिछड़ गए और रिश्तों में नरमी-गरमी का दौर शुरू हुआ।

जानकार यह भी कहते हैं कि 2022 विधानसभा चुनाव से पहले केशव प्रसाद मौर्य खुलकर अपने गुस्से का इजहार कर चुके थे। हालांकि केंद्रीय आलाकमान के हस्तक्षेप के बाद हालात सामान्य हुए। 2022 में बीजेपी की सीट संख्या भले ही घटी हो लेकिन बीजेपी कमल खिलाने में कामयाब रही। 2022 में चर्चा चली कि इस दफा कुछ बदलाव हो सकता है। लेकिन केंद्रीय आलाकमान का भरोसा योगी आदित्यनाथ में बरकरार रहा। लेकिन मौर्य और योगी आदित्यनाथ में तल्खी बनी रही। अब सवाल यह होता है कि ब्रजेश पाठक ने इस तरह का बयान क्यों दिया।

यूपी की सियासत को करीब से समझने वाली सुनीता एरोन कहती हैं कि ब्रजेश पाठक को दबीजुबान इस बात पर नाराजगी थी कि स्वास्थ्य मंत्रालय की अगुवाई वो कर रहे हैं लेकिन कहीं न कहीं काम करने में अड़चन आ रही है। अब आप समझ सकते हैं कि डिप्टी सीएम को ऐसा लगता है तो उनके कामकाज में बाधा आ रही है तो इशारा कहां से होता रहा होगा। इस समय जिस तरह से सूबे में ब्राह्मण समाज का मुद्दा उठा है। उसमें कहीं न कहीं योगी आदित्यनाथ के विचार को पसंद करने वालों के लिए मौका मान सकता है। सियासत में आप इसे असामान्य घटना नहीं मान सकते। लेकिन बीजेपी जैसी पार्टी जो खुद को चाल चरित्र और चेहरे के मामले में औरों से अलग बताती हो अगर उनकी सरकार में एक ही विषय पर तीन शीर्ष नेताओं के विचार अलग अलग हों तो स्वाभाविक तौर पर अंदाजा लगा सकते हैं कि सबकुछ सही नहीं चल रहा।

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