यूपी की राजनीति में ब्राह्णण पर सियासी रण, चुनावी साल में जातीय गोलबंदी के मायने
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यूपी बीजेपी के अध्यक्ष पंकज चौधरी ने हाल में अपनी पार्टी के ब्राह्मण विधायकों के भोज पर तल्ख टिप्पणी की थी

यूपी की राजनीति में ब्राह्णण पर सियासी रण, चुनावी साल में जातीय गोलबंदी के मायने

2022 में उत्तर प्रदेश का जो विधानसभा चुनाव हुआ था, उसमें बीजेपी के 46 ब्राह्मण प्रत्याशी जीतकर सदन में पहुंचे हैं। जबकि समाजवादी पार्टी के सिर्फ 5 और कांग्रेस का सिर्फ एक ब्राह्मण प्रत्याशी ही जीत पाया।


उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों के लिए अब लगभग साल-सवा साल का वक्त ही बाकी रह गया है। यानी कह सकते हैं कि यूपी का चुनावी साल शुरू हो चुका है। क्रिकेट की भाषा में कहें तो योगी सरकार के लिए स्लॉग ओवर शुरू हो चुके हैं। और चुनावी पिच का मिजाज भांपकर प्रदेश में अब जातीय गोलबंदियों की फील्डिंग भी सजने लगी है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि ओबीसी या दलित वाले नैरेटिव से इतर हाल के दिनों में सवर्ण जातियों यानी क्षत्रिय और ब्राह्मणों के बीच ज्यादा हलचल दिखाई दे रही है।सबसे ताज़ा-ताज़ा गोलबंदी ब्राह्मण विधायकों में देखी जा रही है और उसकी चर्चा भी बहुत हुई क्योंकि खुद सत्ताधारी बीजेपी के करीब 50 विधायकों ने किसी विधायक के घर पर भोज किया।

ज़ाहिर है, इस पर बीजेपी लीडरशिप को ये गुस्ताखी खटक गई। यूपी बीजेपी के नये-नवेले अध्यक्ष पंकज चौधरी ने ऐसा करने वाले विधायकों को फटकार दिया। यही नहीं, चौधरी ने सार्वजनिक रूप से नकारात्मक राजनीति से बचने की नसीहत भी दे डाली।हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ था, जब राज्य बीजेपी के विधायक जाति के आधार पर गोलबंदी करते दिखे हों।

सबसे पहले राजपूत समाज के पार्टी विधायकों की बैठक हुई थी। इसके बाद कुर्मी समाज के विधायक मिले और अब हाल में ब्राह्मण विधायकों की बैठक हुई जो भोज पर इकट्ठा हुए।इससे यूपी की राजनीति में ब्राह्मणों की उपस्थिति और उनकी भूमिका को लेकर एक नया विमर्श पैदा हो गया। बीजेपी के ब्राह्मण विधायकों की यह गोलबंदी इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि यूपी में सत्ता के शीर्ष पर ठाकुरवादी राजनीति के आरोप लगते रहे हैं। इसलिए ऐसी धारणा बनी कि बीजेपी के भीतर जातीय असंतोष के आईलैंड पैदा हो गए हैं।

यही भांपकर कांग्रेस ने यूपी के चुनावी साल में धन्यवाद रैलियों के जरिये ब्राह्मणों को साधने का प्लान बनाया है। कांग्रेस यूपी के कुछ चुनींदा इलाकों में जनवरी-फरवरी महीने में लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद वोटरों का धन्यवाद करने आ रही है। लेकिन माना जा रहा है कि कांग्रेस ब्राह्मण गोलबंदी को हवा दे सकती है। वैसे भी एक जमाने में यूपी में ब्राह्मण कांग्रेस का कोर वोटर माना जाता था। लेकिन 1990 के दौर के अयोध्या आंदोलन के उभार से बीजेपी ने इस तबके को साध लिया।

इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि यूपी में भारतीय जनता पार्टी के 1980 से लेकर अब तक जो 15 प्रदेश अध्यक्ष बने हैं, उनमें 6 ब्राह्मण रहे हैं। 2022 में उत्तर प्रदेश का जो विधानसभा चुनाव हुआ था, उसमें बीजेपी के 46 ब्राह्मण प्रत्याशी जीतकर सदन में पहुंचे हैं। जबकि समाजवादी पार्टी के सिर्फ 5 और कांग्रेस का सिर्फ एक ब्राह्मण प्रत्याशी ही जीत पाया। इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि बीजेपी के साथ ब्राह्मण किस कदर जुड़ा हुआ है। लेकिन इसके बावजूद सत्ताधारी दल के ब्राह्मण विधायकों को शक्ति प्रदर्शन करना पड़ रहा है तो इससे यूपी में सत्ताधारी दल के भीतर चल रही जातीय खदबदाहट को समझा जा सकता है।

वैसे यूपी की राजनीति में ब्राह्मण एक प्रभावशाली वर्ग माना जाता है। यूपी में राजपूतों की आबादी जहां लगभग 8% मानी जाती है, वहीं ब्राह्मणों की आबादी लगभग 10% कही जाती है। जहां तक सरकार में ब्राह्मणों की नुमाइंदगी का सवाल है तो योगी सरकार के 55 मंत्रियों में से 7 ब्राह्मण समाज से हैं। इनमें शामिल हैं- ब्रजेश पाठक (डिप्टी सीएम), योगेंद्र उपाध्याय (कैबिनेट मंत्री), सुनील शर्मा (कैबिनेट मंत्री), दयाशंकर मिश्र (राज्यमंत्री – स्वतंत्र प्रभार), प्रतिमा शुक्ला (राज्यमंत्री), रजनी तिवारी (राज्यमंत्री) और सतीश शर्मा (राज्यमंत्री)।

लेकिन हाल की गोलबंदी से ऐसा लग रहा है कि बीजेपी का ब्राह्मण मांगे मोर। इसका मतलब ये है कि 2027 में यूपी के विधानसभा चुनाव में सवर्ण जातियों की गोलबंदी देखने को मिलेगी जोकि बीजेपी को परेशान कर सकती है क्योंकि उसका ज्यादा ध्यान दूसरी जातियों की गोलबंदी करके एक नई सोशल इंजीनियरिंग का जिताऊ फॉर्मूला गढ़ने पर है।

2027 का विधानसभा चुनाव वैसे भी बीजेपी के सामने बड़ी चुनौती है. 2024 लोक सभा चुनाव में मिले झटके के बाद पार्टी के लिए यूपी में हैट्रिक लगाना एक बड़ी चुनौती होगी। इसके लिए कुशल राजनीतिक प्रबंधन और जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को साधना अनिवार्य है। बीजेपी की टॉप लीडरशिप यह नहीं चाहती कि किसी भी समर्थक वर्ग को यह न लगे कि उसकी उपेक्षा हो रही है। लेकिन जातियों के आधार पर विधायकों की इस गोलबंदी में छिपे राजनीतिक संदेशों को पहचानना बहुत जरूरी है।

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