
2.88 करोड़ वोट कटे, 60+ सीटें डांवाडोल, 2022 के आंकड़ों में छुपा बीजेपी का डर
एसआईआर की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से यूपी की 99 सीटों पर सियासी खतरा बढ़ा है। कम मार्जिन वाली सीटों के कारण 2027 में बीजेपी को सपा से ज्यादा नुकसान की आशंका है।
Uttar Pradesh SIR: देश के सबसे बड़े सूबे में से एक उत्तर प्रदेश की एसआईआर ड्रॉफ्ट लिस्ट अब सामने है। कुल 2.88 करोड़ वोटर्स के नाम कटने पर सियासत भी जारी है। सपा और आम आदमी पार्टी का कहना है कि ताज्जुब की बात है कि पंचायत चुनाव और विधानसभा चुनाव में वोटर्स की संख्या में विसंगति है। नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) और अमित शाह (Amit Shah) का चुनाव आयोग खेल कर रहा है। हालांकि बीजेपी का कहना है कि जिनकी सियासी जमीन सरक चुकी है वो लोग इस तरह की बातें कर रहे हैं। मनमुताबिक फैसले हों तो संवैधानिक व्यवस्था दुरुस्त है और यदि ऐसा ना हो आधारहीन आरोप मढ़ने की परंपरा बन चुकी है। इन सबके बीच हम आपको बताएंगे कि यदि सर की इस ड्राफ्ट लिस्ट पर 2027 के विधानसभा चुनाव कराए गए तो किस दल को सबसे अधिक नुकसान होगा।
2022 में कुछ ऐसी थी तस्वीर
बता दें कि साल 2022 के चुनाव में 403 में से 114 सीटें ऐसी थीं जहां जीत-हार का अंतर 10 हजार से कम था। इनमें से 63 सीटों पर बीजेपी और 41 सीटों पर समाजवादी पार्टी को जीत मिली थी। ऐसे में एसआईआर की ड्रॉफ्ट लिस्ट और सीएम योगी आदित्यनाथ का डर हकीकत में तब्दील हो सकता है। कहने का अर्थ यह हुआ कि इन आंकड़ों के हिसाब से बीजेपी के नुकसान की संभावना अधिक है। अगर आंकड़ों को और विस्तार से समझें तो 2022 में 15 सीटें ऐसी थीं जहां जीत-हार का अंतर महज 1हजार का था। 10 सीटों पर यह आंकड़ा 500 से कम का था। इन 15 सीटों में से बीजेपी और उसके सहयोगी दलों को 9 सीटों पर विजय मिली थी। 6 सीटों पर सपा गठबंधन को फायदा मिला। अब इन सीटों पर 32 हजार से लेकर करीब सवा लाख तक वोट कट चुके हैं।
सियासी जानकार कहते हैं कि अगर 2022 के आंकड़ों और एसआईआर की ड्राफ्ट लिस्ट को देखें को सत्तासीन दल यानी बीजेपी को नुकसान होगा। 2017 और 2022 की अगर तुलना करें तो 2022 के चुनाव में जीत और हार के बीच अंतर कम था। बीजेपी 60 से अधिक सीटों पर 10 हजार के कम मार्जिन से जीत गई। एसआईआर के आंकड़ों में बीजेपी को सबसे अधिक नुकसान शहरी क्षेत्रों में होता नजर आ रहा है। हालांकि समाजवादी पार्टी को नुकसान नहीं होगा। यह कहना गलत होगा। खासतौर से जिन जनपदों या विधानसभाओं में मुस्लिम आबादी अधिक है और वो रोजगार या अन्य कारणों से बाहर हैं उनके नाम कटने से सपा की साइकिल पूरी रफ्तार से नहीं दौड़ पाएगा। वैसे तो चुनाव आयोग ने आपत्ति दर्ज कराने और नाम जुड़वाने के लिए 6 फरवरी तक का समय दिया है। लेकिन जमीनी स्तर पर अमल में ला पाना आसान नहीं है।
इतनी सीटों पर 1-10 हजार की मार्जिन
प्रदेश में 99 ऐसी सीटें थीं जहां जीत और हार का अंतर 1 से 10 हजार के बीच का था। इन 99 सीटों में से बीजेपी को 55, सपा को 35, आरएलडी को 3 निषाद पार्टी और सुभासपा को 2-2, कांग्रेस और बीएसपी को 1-1 सीट पर जीत मिली थी। कम से कम अब इन सीटों पर खतरा मंडरा रहा है।पश्चिमी यूपी-बुंदेलखंड की तस्वीर
10 हजार से कम अंतर वाली पश्चिमी यूपी और बुंदेलखंड की 22 सीटों पर बीजेपी के 13 और सपा गठबंधन ने 9 सीटों पर जीत दर्ज की थी। पश्चिमी यूपी में मुस्लिम और जाट आबादी की संख्या अधिक है। मौजूदा समय में सपा और आरएलडी एक साथ भी नहीं हैं, लिहाजा सपा के सामने मुश्किल अधिक है।अवध की तस्वीर
अगर बात अवध यानी लखनऊ के आसपास की करें तो यहां की 50 सीटों पर जीत हार का अंतर 10 हजार से कम था। यहां सीधी लड़ाई सपा और भाजपा के बीच थी। 2022 में 30 सीट पर बीजेपी और 20 सीट पर बीजेपी को जीत मिली थी। इस इलाके में लोध, कुर्मी और यादव वोटर्स की संख्या अधिक है ऐसे में हार का खतरा दोनों दलों पर है। लेकिन बीजेपी को अधिक नुकसान हो सकता है।पूर्वांचल का हाल
इसी तरह बीजेपी को पूर्वांचल यानी कि वाराणसी, आजमगढ़ और गोरखपुर रीजन में हो सकता है। यहां 27 सीटों पर जीत हार का आंकड़ा 10 हजार से कम था। 27 में से भाजपा ने 12, सपा ने 9 सीट जबकि ओम प्रकाश राजभर की पार्टी 2-2, बीएसपी और कांग्रेस को एक-एक सीट पर जीत मिली थी।यूपी की सियासत पर नजर रखने वाले कहते हैं कि कोई भी दल जिसकी जीत कम मार्जिन से हुई है वो उसके पाले में बनी भी रह सकती है या छिटक कर दूसरे के पाले में। ऐसे में एसआईआर का विरोध अपनी जगह है। यह तो तय है कि 2027 का चुनाव संशोधित वोटर लिस्ट से ही होना है ऐसे में चुनौती सभी दलों के सामने हैं।

