भारत-अमेरिका डील के बाद सस्ते आयात की आहट, सेब किसानों के अस्तित्व पर संकट
x

भारत-अमेरिका डील के बाद सस्ते आयात की आहट, सेब किसानों के अस्तित्व पर संकट

भारत-अमेरिका डील के बाद सस्ते अमेरिकी सेबों से जम्मू-कश्मीर, हिमाचल व उत्तराखंड के किसानों में चिंता। आयात शुल्क घटने से 10 लाख परिवारों पर असर की आशंका।


नरेंद्र मोदी सरकार ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत देश के सेब किसानों के हितों की पर्याप्त सुरक्षा का आश्वासन दिया है। इसके बावजूद जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के सेब उत्पादक किसानों में चिंता गहराती जा रही है। भारत में हर साल 22 से 25 लाख टन सेब का उत्पादन होता है, जिसमें जम्मू-कश्मीर लगभग 18 लाख टन, हिमाचल प्रदेश करीब 5 लाख टन और उत्तराखंड लगभग 50,000 टन का योगदान देता है। अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड जैसे पूर्वोत्तर राज्यों का योगदान अभी सीमित है।

जम्मू-कश्मीर के सेब उत्पादकों के लिए केंद्र सरकार के समक्ष अपनी चिंताएं उठाना आसान नहीं है। राज्य में नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार है, जबकि हिमाचल में कांग्रेस और उत्तराखंड में भाजपा की सरकार है। साथ ही, कड़े पुलिस एक्शन के डर से स्थानीय किसान खुले विरोध-प्रदर्शन से भी हिचक रहे हैं।

आपूर्ति शृंखला की बड़ी चुनौती

अंतरिम भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत अमेरिकी सेब भारत में 80 रुपये प्रति किलो के न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) और 25% आयात शुल्क के साथ आएंगे, जिससे उपभोक्ता को यह लगभग 100 रुपये प्रति किलो मिल सकता है। हिल स्टेट्स हॉर्टिकल्चर फोरम (HSHF) के संयोजक हरीश चौहान का कहना है कि यह घरेलू किसानों के लिए “मौत की घंटी” साबित हो सकता है। उनका अनुमान है कि आने वाले महीनों में विदेशी सेबों की भरमार से स्थानीय उत्पाद सस्ते दाम पर बिकेंगे और किसानों को नुकसान होगा। भारत पहले से ही अमेरिका से 6 लाख टन सेब आयात कर रहा है, जो हिमाचल के कुल उत्पादन के बराबर है।

चौहान का कहना है कि देश में सेब की कमी नहीं है, बल्कि समस्या आपूर्ति शृंखला की है। उनके अनुसार, पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज और रेफ्रिजरेटेड वैन की कमी के कारण 30-40% फसल खराब हो जाती है। यदि सरकार आपूर्ति तंत्र मजबूत करे तो घरेलू उत्पादन से ही मांग पूरी की जा सकती है।

किसानों को बड़ा झटका

सस्ते अमेरिकी आयात से 10 लाख से अधिक सेब उत्पादक परिवार प्रभावित हो सकते हैं, जिनमें 7 लाख जम्मू-कश्मीर और 2.5 लाख हिमाचल से हैं। किसानों का कहना है कि बड़े शहरों में आयातित सेब की आकर्षक किस्मों को प्राथमिकता दी जाती है, जिससे स्थानीय उत्पादकों को नुकसान होगा।

पहले ऊंचे आयात शुल्क से घरेलू किसान सुरक्षित थे, लेकिन अब शुल्क 25% कर दिया गया है। चौहान के मुताबिक, अमेरिकी किसानों को भारी सब्सिडी मिलती है—जहां अमेरिका में एक किसान को 60 लाख रुपये तक की प्रोत्साहन राशि मिलती है, वहीं भारत में मात्र 27,000 रुपये और वह भी जटिल प्रक्रियाओं में उलझे हुए। हिमाचल में सेब उद्योग राज्य की जीडीपी में 13% योगदान देता है और जम्मू-कश्मीर में भी यह अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।

असमान प्रतिस्पर्धा का डर

कश्मीरी सेब उत्पादकों का कहना है कि अमेरिकी किसानों को उन्नत तकनीक, निर्यात सब्सिडी, बेहतर भंडारण और कीटनाशक-उर्वरक पर सहायता मिलती है। ऐसे में प्रतिस्पर्धा असमान है। कश्मीर वैली फ्रूट ग्रोवर्स एंड डीलर्स यूनियन के अध्यक्ष बशीर अहमद बशीर ने कहा कि सेब उद्योग 15,000 करोड़ रुपये का है, जिस पर लाखों परिवार निर्भर हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अमेरिकी सेबों का आयात विनाशकारी हो सकता है।

प्रधानमंत्री को पत्र

7 फरवरी को फ्रूट ग्रोवर्स यूनियन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर चिंता जताई। पत्र में मांग की गई कि अमेरिकी और यूरोपीय सेबों पर 100% से अधिक आयात शुल्क लगाया जाए, अन्यथा जम्मू-कश्मीर का बागवानी उद्योग बीमार उद्योग में बदल जाएगा।

राज्य सरकार की प्रतिक्रिया

जम्मू-कश्मीर सरकार के सलाहकार नासिर असलम वानी ने कहा कि सरकार स्थिति पर नजर रखे हुए है और केंद्र से इस मुद्दे पर बात करेगी। उन्होंने माना कि यह डबल झटका है कीमत और गुणवत्ता दोनों में प्रतिस्पर्धा कठिन होगी।

राजनीतिक समीकरण और रणनीति

ओमर अब्दुल्ला हिमाचल और उत्तराखंड सरकारों को साथ लेकर केंद्र से संयुक्त रूप से अपील करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन राजनीतिक समीकरण जटिल हैं।हिमाचल में भी चिंता गहराई है। राज्य का सेब कारोबार 3,500-4,000 करोड़ रुपये का है। पिछले साल की 30-35 लाख सेब पेटियां अभी भी कोल्ड स्टोरेज में पड़ी हैं।

12 फरवरी को देशव्यापी हड़ताल

संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) और अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) ने 12 फरवरी को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया है। कश्मीर के किसान संगठनों ने समर्थन तो जताया है, लेकिन पुलिस कार्रवाई के डर से खुलकर प्रदर्शन से बच रहे हैं। हरीश चौहान ने कहा कि यह प्रधानमंत्री के “वोकल फॉर लोकल” नारे की परीक्षा है। उनका कहना है कि सरकार को स्थानीय उत्पादकों की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए, वरना पहाड़ी राज्यों की ग्रामीण अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में आ सकती है।

Read More
Next Story