हैदराबाद झीलों की जल गुणवत्ता में भारी गिरावट, क्या शहरी विकास जिम्मेदार?
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शहर की कई दूसरी झीलों के अलावा हैदराबाद की मशहूर हुसैन सागर झील के पानी की क्वालिटी पर भी सवाल उठ रहे हैं।

हैदराबाद झीलों की जल गुणवत्ता में भारी गिरावट, क्या शहरी विकास जिम्मेदार?

इन जलाशयों में ऑक्सीजन का स्तर बेहद कम है, जबकि जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग और भारी धातुओं की मात्रा काफी अधिक पाई गई है, जो कि हानिकारक है।


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इंदौर में दूषित पेयजल से कई लोगों की जान जाने के बाद देश के कई शहरों में जल गुणवत्ता की जांच तेज कर दी गई है, क्योंकि शहरी जीवन के लिए सुरक्षित पेयजल एक बुनियादी जरूरत है। इसी कड़ी में हैदराबाद में भी व्यापक जांच की गई, लेकिन इसके नतीजों ने पर्यावरणविदों को गहरी चिंता में डाल दिया है। तेलंगाना प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (टीएसपीसीबी) ने खुलासा किया है कि हैदराबाद महानगर क्षेत्र (एचएमए) में चिन्हित 185 झीलों में से 23 झीलें सूख चुकी हैं, जबकि बाकी झीलों के पानी की गुणवत्ता निर्धारित मानकों से नीचे पाई गई है।

झीलों के पानी में ऑक्सीजन की कमी

बोर्ड द्वारा जुटाए गए ताजा आंकड़ों के अनुसार, इन जलाशयों में घुलित ऑक्सीजन का स्तर बेहद कम है, जबकि जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) और भारी धातुओं की मात्रा काफी अधिक पाई गई है, जो पारिस्थितिकी तंत्र के लिए हानिकारक है। पानी की गुणवत्ता आंकने के लिए घुलित ऑक्सीजन का प्रतिशत और भारी धातुओं की सांद्रता अहम मानक माने जाते हैं। हालांकि हैदराबाद कभी अपनी झीलों के लिए जाना जाता था, लेकिन समय के साथ लगातार सरकारें इन्हें संरक्षित करने में विफल रहीं। नतीजतन झीलें इस कदर प्रदूषित हो गई हैं कि उनमें जलीय जीवन का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है।

मीर आलम टैंक, अलवाल की कोठा चेरुवु, खजागुड़ा की पेड्डा चेरुवु, कामुनी चेरुवु और बंजारा चेरुवु जैसी प्रमुख झीलों में ऑक्सीजन का स्तर खतरनाक रूप से गिर चुका है। वहीं शहर की खूबसूरती बढ़ाने वाली हुसैन सागर और दुर्गम चेरुवु झीलों में घुलित ऑक्सीजन का स्तर मात्र 1.1 से 2.7 मिलीग्राम प्रति लीटर के बीच पाया गया है।

बोर्ड की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि इन झीलों के पानी में कैडमियम, लोहा, पारा, जिंक, तांबा, सीसा, निकल और क्रोमियम जैसी भारी धातुओं की मात्रा अधिक है। लंबे समय में इससे भूजल की गुणवत्ता प्रभावित होगी और इसका सीधा असर शहर के जनस्वास्थ्य पर पड़ेगा, क्योंकि नियमित जल आपूर्ति के लिए भूजल पर निर्भरता बनी हुई है।

अवैध कब्जे और बेतरतीब निर्माण जिम्मेदार

पर्यावरणविदों और शहरी जल संसाधन प्रबंधन विशेषज्ञों का कहना है कि झीलों के क्षेत्रों पर अंधाधुंध अतिक्रमण और अनियंत्रित निर्माण गतिविधियां इस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं। इसके अलावा बिना उपचारित औद्योगिक कचरे और शहर के सीवेज को झीलों में छोड़े जाने से ये जलाशय जहरीले गड्ढों में तब्दील हो गए हैं। ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम (जीएचएमसी) में पर्याप्त संख्या में जल वैज्ञानिकों और लिम्नोलॉजिस्ट की कमी भी इस गंभीर मुद्दे को नजरअंदाज किए जाने का एक बड़ा कारण बताई जा रही है।

विशेषज्ञों की राय

हैदराबाद के पर्यावरणविद और नीति विशेषज्ञ डोंथी नरसिंह रेड्डी ने कहा कि मौजूदा शहरी नियोजन में सीवेज व्यवस्था को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इमारतों और लेआउट की मंजूरी देते समय सीवेज प्रणाली की योजना और उसका क्रियान्वयन जरूरी है। तुरंत सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाए जाने चाहिए थे। लेकिन जगह की कमी के कारण इन्हें झीलों में बनाने की कोशिश की गई। चूंकि उचित सीवेज निपटान व्यवस्था नहीं है, इसलिए गंदा पानी झीलों में मोड़ा जा रहा है, जिससे झीलों का पानी प्रदूषित हो रहा है।

रेड्डी ने कहा कि तेजी से हो रहे आवास निर्माण को देखते हुए पर्याप्त संख्या में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाए जाने चाहिए और सरकार को इनके लिए जमीन आवंटित करनी चाहिए। उन्होंने यह भी जोर दिया कि उपचार के बाद ही पानी को झीलों और नदियों में छोड़ा जाना चाहिए तथा निर्माण अनुमति देते समय क्षेत्र-विशेष के लिए ठोस योजना बनाई जानी चाहिए। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के मानकों के अनुसार, किसी झील के पानी में घुलित ऑक्सीजन का स्तर कम से कम 5 मिलीग्राम प्रति लीटर होना चाहिए, लेकिन हैदराबाद की अधिकांश झीलें इस कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं और उपयोग के लिए अनुपयुक्त हैं।

कार्यकर्ता-सांसद ने जताई नाराजगी

पर्यावरण कार्यकर्ता और तेलंगाना की सत्तारूढ़ कांग्रेस की सदस्य लुबना सरवत ने हैदराबाद की झीलों के लगातार सिकुड़ते आकार पर हैरानी जताई। उन्होंने सवाल उठाया कि झीलों का क्षेत्रफल घटाने का आधार क्या है और कहा कि यही शहर में बाढ़ की एक बड़ी वजह बन रहा है। उन्होंने कहा कि नागार्जुन सर्कल का जलगम वेंगला राव पार्क कभी एक बड़ी झील था। केबीआर पार्क में भी झील है। इनके क्षेत्र घटने के कारण बारिश के समय पानी झीलों में नहीं जा पाता और पंजागुट्टा व राजभवन इलाके जलमग्न हो जाते हैं। पब्लिक गार्डन की एक बड़ी झील हुसैन सागर से जुड़ी थी। गाचिबौली हाईवे की ब्रह्मम कुंटा झील पर अब एक होंडा शोरूम बना दिया गया है। यह कैसे संभव है? मामला अदालत में है और ऐसी कई झीलों को आधिकारिक रिकॉर्ड से हटा दिया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि हैदराबाद में केवल 185 झीलें होने का दावा गलत है और कई झीलें रिकॉर्ड से गायब कर दी गई हैं।

लुबना सरवत ने हैदराबाद डिजास्टर रिस्पॉन्स एंड एसेट प्रोटेक्शन एजेंसी (HYDRAA) पर अपनी सीमाएं लांघने और झीलों को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि बुन रुकन-उद-दौला झील का क्षेत्र 18 एकड़ था, जिसे घटाकर 10 एकड़ कर दिया गया है और बाकी हिस्से में बच्चों का पार्क बनाया जा रहा है। झील का बांध हटाकर सड़क बना दी गई है और आसपास के पार्कों पर अतिक्रमण हो चुका है। उन्होंने सवाल किया कि झीलें अतिक्रमण और पार्क बनाने के लिए नहीं होतीं। दुर्गम चेरुवु पर अतिक्रमण के लिए एक विधायक के खिलाफ मामला दर्ज हुआ, लेकिन HYDRAA द्वारा बनाई गई पार्क के लिए किसके खिलाफ मामला दर्ज होगा?

सरवत ने HYDRAA प्रमुख रंगनाथ को हटाने की मांग भी की। साथ ही आरोप लगाया कि मीर आलम चेरुवु को पाटकर वहां पुल बनाया जा रहा है, जिससे झील पूरी तरह नष्ट हो जाएगी। उन्होंने कहा कि झीलें केवल जल संरक्षण के लिए नहीं, बल्कि जैव विविधता और पक्षियों के संरक्षण के लिए भी बेहद जरूरी हैं और इनके साथ इस तरह का व्यवहार भविष्य के लिए खतरनाक साबित होगा।

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