
मुकुल रॉय: सियासत का शांत रणनीतिकार, अब यादों में
टीएमसी के पूर्व नेता और रेल मंत्री रहे मुकुल रॉय का 71 वर्ष में निधन हो गया। बंगाल की राजनीति के ‘चाणक्य’ माने जाने वाले रॉय ने कई अहम गठबंधन साधे।
उन्होंने कभी टेस्ट क्रिकेट को अपना ‘आश्रय स्थल’ कहा था। अपने राजनीतिक करियर के शिखर पर भी मुकुल रॉय को अक्सर ईडन गार्डन्स में टेस्ट मैच देखते हुए पाया जाता था। खेल के लंबे प्रारूप की लय में वे पूरी तरह डूब जाते थे, जहां चमक-दमक या त्वरित सफलता से अधिक धैर्य, रणनीति और प्रतिद्वंद्वी को मात देने की क्षमता मायने रखती है। यही बारीक समझ और संयम उनकी राजनीति की पहचान भी बने। जटिल गठबंधनों को साधना, बदलते राजनीतिक हालात को भांपना और सही समय पर कदम उठाना—इन गुणों ने उन्हें “बंगाल की राजनीति का चाणक्य” की उपाधि दिलाई। हालांकि राजनीति की उनकी हर पारी उतनी सहज नहीं रही।
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में कभी दूसरे नंबर के नेता और संक्षिप्त अवधि के लिए रेल मंत्री रहे मुकुल रॉय का सोमवार (23 फरवरी) तड़के कोलकाता के सॉल्ट लेक स्थित एक निजी अस्पताल में 71 वर्ष की आयु में निधन हो गया।
शुरुआती जीवन
17 अप्रैल 1954 को बैरकपुर के औद्योगिक क्षेत्र कांचरापाड़ा (बिजपुर) में जन्मे मुकुल रॉय, जुगल और रेखा रॉय के इकलौते पुत्र थे। चार बहनों के साथ एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में उनका पालन-पोषण हुआ। कांचरापाड़ा के हरनीट हाई स्कूल से स्कूली शिक्षा के बाद उन्होंने नैहाटी के ऋषि बंकिम चंद्र कॉलेज से रसायन विज्ञान में ऑनर्स की डिग्री हासिल की। इसके बाद मदुरै कामराज विश्वविद्यालय से लोक प्रशासन में स्नातकोत्तर किया। इसी दौरान राजनीति और क्रिकेट के प्रति उनका रुझान गहराता गया।
राजनीति में उभार और टीएमसी के वर्ष
उनकी राजनीतिक यात्रा वामपंथी छात्र संगठनों से शुरू हुई, लेकिन बाद में वे कांग्रेस में शामिल हुए। बैरकपुर के स्थानीय नेता मृणाल सिंघा के संरक्षण में उन्होंने राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई। लंबे समय तक वे संगठन में सक्रिय रहे, परंतु खास पहचान नहीं बन पाई। 1990 के दशक में ममता बनर्जी के उभार के साथ उनकी राजनीतिक दिशा बदली। वे कांग्रेस छोड़कर ममता के साथ जुड़ गए और उनके विश्वस्त सहयोगी बने। 1997 में तृणमूल कांग्रेस के गठन के समय उन्हें पार्टी का पहला राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया। पार्टी के शुरुआती विस्तार में उनकी अहम भूमिका रही। अन्य दलों के असंतुष्ट नेताओं को टीएमसी में लाने और संगठन को जमीनी स्तर तक मजबूत करने में वे कुशल रणनीतिकार साबित हुए।
2009 में कांग्रेस-तृणमूल गठबंधन जैसे महत्वपूर्ण राजनीतिक समझौतों में भी उनकी पर्दे के पीछे निर्णायक भूमिका रही। 2012 में रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी के इस्तीफे के बाद ममता बनर्जी ने उन पर भरोसा जताते हुए उन्हें रेल मंत्री बनाया। उन्होंने यात्री किराए में प्रस्तावित बढ़ोतरी को वापस लेकर पार्टी की “गरीब समर्थक” छवि को बरकरार रखा।
उतार-चढ़ाव, भाजपा दौर और कानूनी लड़ाइयां
राजनीति में उनका सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा। 2017 में पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में टीएमसी ने उन्हें निलंबित कर दिया। आलोचकों ने इसे नारदा स्टिंग और सारधा चिटफंड घोटाले से जोड़ा। 2017 में उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफा दिया और भाजपा में शामिल हो गए, जहां वे राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने।
पश्चिम बंगाल में भाजपा के विस्तार में उनकी अहम भूमिका मानी जाती है। 2018 के पंचायत और 2019 के लोकसभा चुनावों में पार्टी की बढ़त के पीछे उनकी रणनीति को श्रेय दिया गया। हालांकि 2021 के विधानसभा चुनावों में उनकी सक्रियता को लेकर सवाल उठे।
2021 में कृष्णानगर उत्तर सीट से भाजपा विधायक चुने जाने के कुछ ही सप्ताह बाद वे फिर टीएमसी में लौट आए। इसके बाद दल-बदल कानून के तहत उनकी सदस्यता पर सवाल उठे। नवंबर 2025 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने उन्हें विधानसभा से अयोग्य ठहराया, हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर रोक लगा दी।
उनके अंतिम वर्षों में स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति में गिरावट स्पष्ट दिखी। सार्वजनिक कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति कम हो गई और भाषणों में असंगति देखी गई।
निजी जीवन और विरासत
2019 में पत्नी कृष्णा रॉय के निधन ने उन्हें गहरा आघात पहुंचाया। इसके बाद वे अधिकतर समय कांचरापाड़ा स्थित अपने घर में ही रहे।मुकुल रॉय को एक उत्कृष्ट वक्ता या प्रशासक नहीं, बल्कि कुशल रणनीतिकार के रूप में याद किया जाएगा। उन्होंने दशकों तक बंगाल की राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई। टीएमसी और भाजपा—दोनों दलों के उभार में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा।
वे अपने पुत्र शुभ्रांशु रॉय को पीछे छोड़ गए हैं। उनके निधन की खबर फैलते ही विभिन्न दलों के नेताओं ने श्रद्धांजलि दी। ममता बनर्जी ने शोक संदेश में लिखा कि मुकुल रॉय ने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना से ही खुद को समर्पित किया था और उनकी संगठनात्मक क्षमता को हमेशा याद किया जाएगा।
मुकुल रॉय का जाना पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐसे अध्याय का अंत है, जिसने महत्वाकांक्षा, निष्ठा और सत्ता के जटिल समीकरणों को करीब से जिया।

