एंटीबायोटिक के दुरुपयोग पर रोक, पश्चिम बंगाल सरकार का बड़ा कदम
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एंटीबायोटिक के दुरुपयोग पर रोक, पश्चिम बंगाल सरकार का बड़ा कदम

राज्य ने पिछले साल डॉक्टरों, स्वास्थ्य अधिकारियों, पशु विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं की भागीदारी से नीति का मसौदा तैयार किया। इसमें अस्पताल प्रोटोकॉल, सार्वजनिक जागरूकता उपाय, निगरानी रणनीतियां शामिल हैं।


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पश्चिम बंगाल सरकार एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) यानी एंटीबायोटिक प्रतिरोध से निपटने के लिए एक व्यापक राज्य-स्तरीय स्वास्थ्य नीति को अंतिम मंजूरी देने के करीब है। अधिकारियों के अनुसार, इस नीति का उद्देश्य एंटीबायोटिक्स के गलत और अनावश्यक इस्तेमाल को रोकना है। यह कदम केंद्रीय सरकार के प्रयासों के साथ तालमेल में उठाया जा रहा है, जिसमें 156 फिक्स्ड-डोज कॉम्बिनेशन दवाओं (एफडीसी), जिनमें एंटीबायोटिक्स शामिल हैं, पर प्रतिबंध लगाया गया है ताकि दवाओं का दुरुपयोग रोका जा सके और जनता का स्वास्थ्य सुरक्षित रह सके।

स्वास्थ्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि नीति में वन हेल्थ (One Health) दृष्टिकोण अपनाया गया है। इसका मतलब है कि एंटीबायोटिक प्रतिरोध केवल अस्पतालों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरण को भी प्रभावित करता है। ॉ

अधिकारियों ने बताया कि नीति के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:-

⦁ सख्त अस्पताल प्रोटोकॉल: विशेष समितियां यह सुनिश्चित करेंगी कि एंटीबायोटिक्स केवल आवश्यक होने पर और सही खुराक में दिए जाएं।

⦁ सुपरविजन और निगरानी: बंगाल राष्ट्रीय AMR निगरानी नेटवर्क (NARS-Net) का उपयोग करके प्रतिरोधी रोगाणुओं की ट्रैकिंग करेगा।

⦁ खुदरा बिक्री नियम: फार्मासिस्ट को एंटीबायोटिक्स की बिक्री का रिकॉर्ड रखना अनिवार्य होगा और ओवर-द-काउंटर दुरुपयोग रोका जाएगा।

⦁ प्रशिक्षण और जागरूकता: स्वास्थ्यकर्मियों को सही दवा उपयोग पर प्रशिक्षण दिया जाएगा और जनता को सेल्फ-मेडिकेशन के खतरे के बारे में बताया जाएगा।

⦁ राष्ट्रीय लक्ष्यों के साथ तालमेल: यह नीति केंद्र की राष्ट्रीय AMR एक्शन प्लान (2025–2029) के अनुरूप है।

अधिकारी ने बताया कि एंटीबायोटिक्स का गलत इस्तेमाल न केवल अस्पतालों में, बल्कि पशुपालन, पोल्ट्री उत्पादन और कचरे के माध्यम से मिट्टी और नदियों में भी होता है। एक समग्र दृष्टिकोण जरूरी है ताकि ऐसे रोगाणु फैलना बंद हों, जो अब दवाओं का असर नहीं मानते।

नीति की रूपरेखा

राज्य ने पिछले साल डॉक्टरों, स्वास्थ्य अधिकारियों, पशु विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं की भागीदारी से नीति का प्रारंभिक मसौदा तैयार किया। इसमें अस्पताल प्रोटोकॉल, सार्वजनिक जागरूकता उपाय, निगरानी रणनीतियाँ और विनियामक ढांचा शामिल हैं। इसके बाद दिसंबर 2025 में एक उच्च-स्तरीय बैठक में मसौदे की समीक्षा की गई और इसे अंतिम मंजूरी के लिए तैयार किया गया।

विशेष अस्पताल समितियां यह सुनिश्चित करेंगी कि एंटीबायोटिक्स केवल जरूरत पड़ने पर और सही खुराक में दिए जाएं। स्वास्थ्य अधिकारी कहते हैं कि अत्यधिक और गलत इस्तेमाल रोगाणुओं को प्रतिरोधी बना देता है, जिससे पहले आसानी से ठीक होने वाले संक्रमण अब जटिल और महंगे हो गए हैं। बंगाल राष्ट्रीय AMR निगरानी नेटवर्क (NARS-Net) का भी हिस्सा है, जो देश भर के अस्पतालों और लैब से डेटा जुटाता है। यह डेटा डॉक्टरों को सही इलाज का निर्णय लेने में मदद करता है और स्वास्थ्य अधिकारियों को नई खतरनाक प्रतिरोधी बीमारियों की पहचान करने में सक्षम बनाता है।

कोलकाता के माइक्रोबायोलॉजिस्ट डॉ. एस भट्टाचार्य ने कहा कि निगरानी किसी भी प्रभावी AMR रणनीति की रीढ़ है। यदि हमें यह पता नहीं कि कौन से रोगाणु किस दवा के प्रति प्रतिरोधी हैं तो डॉक्टर सही निर्णय नहीं ले पाएंगे और स्वास्थ्य हस्तक्षेप पीछे रह जाएंगे।

दवा नियम और बिक्री पर नियंत्रण

ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत कुछ एंटीबायोटिक्स (Schedule H1) केवल डॉक्टर की पर्ची पर ही बिक सकते हैं। फार्मासिस्ट को बिक्री का विस्तृत रिकॉर्ड रखना अनिवार्य होगा। अधिकारियों का कहना है कि ओवर-द-काउंटर दुरुपयोग रोकना AMR नियंत्रण में सबसे अहम कदम है।

जागरूकता और प्रशिक्षण

डॉक्टरों, नर्सों और फार्मासिस्ट को एंटीबायोटिक दवा के सही उपयोग पर प्रशिक्षण दिया जाएगा। साथ ही जनता को सेल्फ-मेडिकेशन और दवा समय से पहले छोड़ने के खतरे के बारे में बताया जाएगा। लोग अक्सर दवा लेना बंद कर देते हैं या बिना जरूरत के मांग करते हैं। यह व्यवहार प्रतिरोध को तेज करता है और जीवन रक्षक दवाओं की प्रभावशीलता को कमजोर करता है।

AMR: एक मौन महामारी

कोलकाता के पब्लिक हेल्थ विशेषज्ञ डॉ. पिनाकी मुखर्जी कहते हैं कि AMR एक मौन महामारी है। अगर राज्य जैसे पश्चिम बंगाल ने सही कदम नहीं उठाए तो आम दवाएं काम करना बंद कर सकती हैं, अस्पतालों में भीड़ बढ़ सकती है और टाली जा सकने वाली मौतें बढ़ सकती हैं। राज्य की SAP-AMR नीति जनवरी के अंत तक आधिकारिक रूप से घोषित होने की उम्मीद है। यह नीति मानव, पशु और पर्यावरण स्वास्थ्य को जोड़कर AMR की जटिलता को समझने और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप कदम उठाने का प्रयास है। अन्य राज्य, जैसे केरल, पहले ही AMR से निपटने के लिए व्यापक योजना जारी कर चुके हैं।

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