
ममता सरकार और चुनाव आयोग में बढ़ा टकराव, EC ने बंगाल की मुख्य सचिव को दिल्ली तलब किया
चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल सरकार के कई अधिकारियों को फटकार लगाई है और कथित असहयोग को लेकर राज्य की मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती से जवाब-तलब किया है।
पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को सुव्यवस्थित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के बार-बार हस्तक्षेप के बावजूद, ममता बनर्जी सरकार और चुनाव आयोग के बीच टकराव कम होता नजर नहीं आ रहा है। शुक्रवार (13 फरवरी) को बंगाल की मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती को नई दिल्ली स्थित चुनाव आयोग के कार्यालय में तलब किए जाने के बाद तनाव ने नया मोड़ ले लिया।
‘निर्देशों का पालन न करने’ पर जवाब मांगा
करीब एक घंटे चली बैठक में शीर्ष राज्य अधिकारी से आयोग के कई निर्देशों का कथित पालन न करने को लेकर स्पष्टीकरण मांगा गया। चर्चा का केंद्र मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं से जुड़े पहले के आदेशों के अनुपालन पर रहा।
पिछले साल अगस्त में कथित फर्जी मतदाताओं के नाम दर्ज होने के मामले में चुनाव आयोग ने दक्षिण 24 परगना जिले के बारुईपुर और पूर्व मेदिनीपुर जिले के मोयना में दो इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) और दो असिस्टेंट इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (AERO) को निलंबित करने का आदेश दिया था। साथ ही संबंधित थानों में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराने के निर्देश भी दिए गए थे।
आयोग की पूर्ण पीठ ने इससे पहले राज्य के तत्कालीन मुख्य सचिव मनोज पंत को भी तलब किया था। आयोग ने राज्य सरकार को पत्र लिखकर चारों अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने और एफआईआर दर्ज करने को कहा था।
SIR अधिकारियों को लेकर आमने-सामने
बंगाल की मतदाता सूची में नामों के अवैध समावेशन और अन्य अनियमितताओं के आरोपों के बीच आयोग ने जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) को चार अधिकारियों और एक कर्मचारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया था।
इसके जवाब में राज्य सरकार ने आयोग को सूचित किया कि चारों अधिकारियों को विभागीय जांच लंबित रहने तक निलंबित किया जा रहा है और एफआईआर दर्ज करने से पहले अतिरिक्त समय मांगा।
हालांकि, कई महीनों बाद भी कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई, जिसके चलते शुक्रवार को स्पष्टीकरण के लिए आमने-सामने बैठक बुलाई गई।
जिला अधिकारियों को कड़ी फटकार
शुक्रवार को ही चुनाव आयोग ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO), जिला मजिस्ट्रेट (DM), विशेष रोल पर्यवेक्षकों और रोल पर्यवेक्षकों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए बैठक कर कई सख्त प्रशासनिक निर्देश जारी किए।
बैठक में शामिल अधिकारियों के अनुसार, कई जिलों के प्रमुखों को विशेष रूप से फटकार लगाई गई। कूचबिहार, जलपाईगुड़ी, मालदा, दक्षिण और उत्तर 24 परगना तथा पूर्व मेदिनीपुर के जिला मजिस्ट्रेटों को कथित प्रक्रियागत कमियों को लेकर चेताया गया।
पूर्व बर्धमान के डीएम को राजनीतिक टिप्पणी करने से बचने की सलाह दी गई, जबकि कूचबिहार के डीएम से दस्तावेज अपलोड में देरी पर जवाब मांगा गया।
आयोग ने जताई गंभीर चिंता
चुनाव आयोग ने ऐसे कई मामलों को चिह्नित किया, जिनमें मतदाता नाम शामिल करने के समर्थन में अपलोड किए गए दस्तावेजों में अखबार की कतरनें, खाली पन्ने या अपठनीय तस्वीरें पाई गईं। इन उदाहरणों को पावरपॉइंट प्रस्तुति के जरिए जिला अधिकारियों और केंद्रीय पर्यवेक्षकों के सामने रखा गया।
अधिकारियों से पूछा गया कि ऐसे दस्तावेज किसने अपलोड किए, उनका सत्यापन कैसे हुआ और किस आधार पर उन्हें प्रणाली में स्वीकार किया गया।
बाद में जारी लिखित निर्देशों में आयोग ने स्पष्ट किया कि ERO और AERO केवल उन्हीं दस्तावेजों पर विचार करें, जो आयोग या अदालत के निर्देशों के तहत निर्धारित किए गए हों।
आयोग ने कहा कि फर्जी या अनधिकृत दस्तावेज स्वीकार नहीं किए जाएंगे और जिला मजिस्ट्रेटों (DM) को अनुपालन सुनिश्चित करने की व्यक्तिगत जिम्मेदारी लेनी होगी। सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों (DEO) को सोमवार (16 फरवरी) शाम 5 बजे तक प्रत्येक अपलोड किए गए दस्तावेज की व्यक्तिगत रूप से जांच कर यह प्रमाणित करने की समय-सीमा तय की गई है कि वे स्वीकृत सूची के अनुरूप हैं। अधिकारियों के अनुसार, यदि समय-सीमा के बाद भी एक भी अप्रमाणित दस्तावेज प्रणाली में पाया गया तो संबंधित डीएम को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
चुनाव आयोग की आईटी टीम को भी अपलोड की निगरानी करने और किसी भी विसंगति को चिह्नित करने के निर्देश दिए गए हैं। बैठक में अधिकारियों को बताया गया कि सभी दस्तावेज और फैसले डिजिटल रूप से वर्षों तक सुरक्षित रहेंगे और बाद में उनकी जांच की जा सकेगी। यदि एक, दो या पांच साल बाद यह पाया जाता है कि लापरवाही के कारण किसी “विदेशी” नागरिक का नाम मतदाता सूची में बना रहा, तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
यह प्रशासनिक सख्ती चुनाव आयोग और राज्य सरकार के बीच पहले से ही तनावपूर्ण संबंधों को और बढ़ा रही है।
राज्य द्वारा नामित अधिकारियों को बाहर रखने पर विवाद
तनाव का एक अन्य कारण राज्य सरकार द्वारा एसआईआर सुनवाई के लिए माइक्रो-ऑब्जर्वर के रूप में नामित 8,505 “ग्रुप-बी” अधिकारियों में से बड़ी संख्या को बाहर रखा जाना है। चुनाव आयोग का कहना है कि इनमें से कई नामित अधिकारी निम्न श्रेणी के लिपिकीय कर्मचारी हैं, जो मतदाता दावों और आपत्तियों की अर्ध-न्यायिक जांच के लिए आवश्यक पर्यवेक्षी मानकों पर खरे नहीं उतरते।
वहीं, राज्य सरकार का तर्क है कि ये अधिकारी मान्यता प्राप्त ग्रुप-बी सेवा श्रेणी में आते हैं और तैनाती में देरी अलग-अलग व्याख्याओं के कारण हो रही है। सुप्रीम कोर्ट पहले ही राज्य सरकार को एसआईआर से संबंधित कार्यों के लिए पर्यवेक्षक उपलब्ध कराने का निर्देश दे चुका है। साथ ही, यह भी स्पष्ट किया गया था कि मतदाता के नाम को जोड़ने या हटाने का अंतिम निर्णय केवल नामित ईआरओ के पास रहेगा।
हालांकि, वर्गीकरण मानकों को लेकर असहमति के कारण कई जिलों में राज्य सरकार द्वारा नामित माइक्रो-ऑब्जर्वरों की नियुक्ति में देरी हुई है।
आवासीय परिसरों को मतदान केंद्र बनाने पर नया विवाद
एक अलग विवाद 2026 के चुनावों से पहले 78 बहुमंजिला आवासीय परिसरों को संभावित मतदान केंद्र के रूप में चिन्हित किए जाने को लेकर सामने आया है।
राज्य सरकार ने इस प्रस्ताव का औपचारिक विरोध करते हुए कहा है कि मतदान केंद्र पारदर्शिता और समान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए स्कूलों और सरकारी भवनों जैसे सार्वजनिक स्थलों पर ही बनाए जाने चाहिए।
वहीं, चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में मतदाताओं की सुविधा बढ़ाने के उद्देश्य से यह एक प्रशासनिक कदम है।

