बंगाल SIR पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, दावों के निपटारे के लिए न्यायिक अधिकारियों की तैनाती
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि परिस्थितियां असाधारण हैं, इसलिए न्यायिक अधिकारियों या पूर्व न्यायिक अधिकारियों को यह जिम्मेदारी सौंपने का अनुरोध भी असाधारण प्रकृति का है।

बंगाल SIR पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, दावों के निपटारे के लिए न्यायिक अधिकारियों की तैनाती

राज्य की मतदाता सूची में नाम शामिल या बाहर किए जाने के लिए दस्तावेजों की प्रामाणिकता के निष्पक्ष परीक्षण को सुनिश्चित करना जरूरी है, यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अभूतपूर्व फैसला लिया।


पश्चिम बंगाल में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के तहत सुप्रीम कोर्ट ने एक असाधारण कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी श्रेणी में सूचीबद्ध मतदाताओं के दावों के निपटारे के लिए न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त करने का निर्णय लिया। अदालत ने माना कि असाधारण परिस्थितियों में यह असाधारण निर्णय आवश्यक है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने निर्वाचित राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच विश्वास की कमी और दुर्भाग्यपूर्ण आरोप-प्रत्यारोप का उल्लेख किया। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोल भी शामिल थे।

पीठ ने कहा कि राज्य चुनावों से कुछ महीने पहले SIR प्रक्रिया को पूरा करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। अदालत ने कहा, “हमारे पास शायद ही कोई और विकल्प बचा है, सिवाय इसके कि हम कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध करें कि वे अतिरिक्त जिला न्यायाधीश या जिला न्यायाधीश रैंक के कुछ वर्तमान न्यायिक अधिकारियों तथा निष्कलंक छवि वाले पूर्व न्यायिक अधिकारियों को उपलब्ध कराएं, जो प्रत्येक जिले में ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ श्रेणी के दावों की पुनर्समीक्षा या निपटारा कर सकें।”

अदालत ने कहा, “परिस्थितियां असाधारण हैं, इसलिए न्यायिक अधिकारियों या पूर्व न्यायिक अधिकारियों को यह जिम्मेदारी सौंपने का अनुरोध भी असाधारण प्रकृति का है।”

SIR प्रक्रिया 4 नवंबर 2025 को बंगाल में शुरू की गई थी। 16 दिसंबर को प्रकाशित प्रारूप मतदाता सूची में 58 लाख नाम हटाए गए, जबकि 1.16 करोड़ मतदाताओं को विवादास्पद “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” श्रेणी में चिह्नित किया गया। ईसीआई अब तक 6.6 लाख सुनवाई कर चुका है और अंतिम सूची 28 फरवरी को प्रकाशित होनी है।

पीठ ने राज्य सरकार और ईसीआई के बीच करीब 1.36 करोड़ मतदाताओं के दावों/आपत्तियों के निपटारे के लिए पात्र अधिकारियों की उपलब्धता को लेकर चल रहे गतिरोध का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा, “दो संवैधानिक संस्थाओं, एक लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित राज्य सरकार और ईसीआई, के बीच स्पष्ट रूप से विश्वास की कमी दिखाई देती है।”

शीर्ष अदालत ने व्यवस्था तय करने का अधिकार कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के विवेक पर छोड़ दिया है। शनिवार को मुख्य न्यायाधीश राज्य के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक (DGP), ईसीआई के अधिकारियों, राज्य के महाधिवक्ता और संबंधित अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के साथ संयुक्त बैठक करेंगे।

पीठ ने कहा, “वे अपने-अपने प्रस्ताव पेश करेंगे कि गतिरोध कैसे दूर किया जाए ताकि लंबित प्रक्रिया पूरी हो सके। हमारी एकमात्र चिंता यह है कि SIR का कार्य बिना बाधा शुरू हो और पूरा हो।”

अदालत ने निर्देश दिया कि प्रत्येक नियुक्त न्यायिक अधिकारी की सहायता ईसीआई द्वारा नियुक्त माइक्रो-ऑब्जर्वर और राज्य सरकार के एक अधिकारी द्वारा की जाएगी। पुलिस अधीक्षक और जिला कलेक्टर को “मानी हुई प्रतिनियुक्ति” (deemed deputation) पर रखा जाएगा, ताकि अदालत के आदेश का पालन सुनिश्चित हो सके और न्यायिक अधिकारियों को सभी आवश्यक प्रशासनिक सहायता मिल सके।

राज्य सरकार ने प्रक्रिया 28 फरवरी से पहले पूरी करने का अनुरोध किया, लेकिन अदालत ने कहा कि भारी कार्यभार को देखते हुए वह न्यायिक अधिकारियों को “दंडित” नहीं करना चाहती। अदालत ने ईसीआई को 28 फरवरी तक जितनी मतदाता सूची तैयार हो सके, उसे प्रकाशित करने की अनुमति दी और शेष सूची बाद में जारी करने की छूट दी, क्योंकि दावों का निपटारा एक “सतत प्रक्रिया” है।

9 फरवरी को अदालत ने पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश दिया था कि वह ईसीआई को ग्रुप-बी अधिकारियों को निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) के रूप में प्रतिनियुक्त करे, ताकि वे ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ और पिछली SIR के आधार पर ‘अनमैप्ड’ मतदाताओं के दावों की जांच कर सकें।

इस उद्देश्य से राज्य ने 8,505 अधिकारियों की सूची देने का आश्वासन दिया था। हालांकि शुक्रवार को ईसीआई की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषादरी नायडू ने अदालत को बताया कि 17 फरवरी को राज्य सरकार ने जवाब दिया कि इस मुद्दे को राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के साथ उठाया जा रहा है।

राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और मेनका गुरुस्वामी ने अदालत को बताया कि अधिकारियों की सूची पहले ही चुनाव आयोग को सौंप दी गई है।

नायडू ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा दी गई सूची ERO/AERO के लिए आवश्यक पद और प्रोफाइल के अनुरूप नहीं है, जबकि गुरुस्वामी ने बताया कि राज्य में उपमंडल स्तर के केवल 69 अधिकारी ही उपलब्ध हैं।

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