
पत्नी के कथित व्यभिचार पर व्हाट्सऐप चैट मान्य, 10 हजार गुजारे भत्ते का आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट से रद्द
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पारिवारिक न्यायालय अधिनियम की धारा 14 के तहत व्यभिचार और भरण-पोषण के मामलों में व्हाट्सऐप चैट को साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक पति को अपनी पत्नी के कथित व्यभिचार को साबित करने के लिए व्हाट्सऐप चैट को साक्ष्य के रूप में पेश करने की अनुमति दी। ट्रायल कोर्ट ने पहले पति को पत्नी को ₹10,000 प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था।
न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह, पति की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। पति का तर्क था कि ट्रायल कोर्ट ने व्हाट्सऐप चैट को इस आधार पर स्वीकार नहीं किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किया गया।
हाईकोर्ट के 17 फरवरी के आदेश में कहा गया, “मामले को पुनः विचार हेतु ट्रायल कोर्ट को भेजा जाता है, ताकि पक्षकारों के वकीलों को सुनने के बाद और ऐसे साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति देकर, जो पारिवारिक न्यायालय अधिनियम की धारा 14 के आलोक में विवाद के प्रभावी निस्तारण में सहायक हों, पुनः निर्णय लिया जा सके।”
न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का आदेश कानून की दृष्टि में टिकाऊ नहीं है।
मामला क्या था?
पति ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 (पत्नी के भरण-पोषण) के तहत पारित पारिवारिक न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए पुनरीक्षण याचिका दायर की थी। इस आदेश में उसे पत्नी को ₹10,000 प्रतिमाह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।
पति के वकील ने कहा कि उसने ट्रायल कोर्ट में लिखित दलीलों में आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी किसी अन्य पुरुष के साथ व्यभिचारपूर्ण संबंध में रह रही है।
यह भी तर्क दिया गया कि ट्रायल कोर्ट ने इस आरोप पर विचार नहीं किया क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के समर्थन में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B के तहत प्रमाणपत्र दाखिल नहीं किया गया था। धारा 65B इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की स्वीकार्यता की आवश्यकताओं से संबंधित है।
पति ने कई व्हाट्सऐप चैट संलग्न की थीं, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने उन पर विचार नहीं किया और कथित रूप से मनमाने ढंग से आदेश पारित कर दिया। यह भी कहा गया कि पत्नी के व्यभिचार के संबंध में कोई विशिष्ट मुद्दा तय नहीं किया गया, जबकि लिखित जवाब में स्पष्ट आरोप लगाए गए थे और उनके समर्थन में व्हाट्सऐप चैट भी संलग्न थीं।
अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता ने पुनरीक्षणकर्ता (पति) की प्रार्थना का विरोध किया।
अदालत की टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने कहा कि व्हाट्सऐप चैट केवल इस आधार पर स्वीकार नहीं की गईं कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B के तहत प्रमाणपत्र दाखिल नहीं किया गया था।
हालांकि, पारिवारिक न्यायालय अधिनियम की धारा 14 के अनुसार, पारिवारिक न्यायालय किसी भी रिपोर्ट, बयान, दस्तावेज, सूचना या सामग्री को साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर सकता है, यदि वह उसके मत में विवाद के प्रभावी निस्तारण में सहायक हो, भले ही वह भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 के तहत प्रासंगिक या स्वीकार्य न हो।
इसके अलावा, वैवाहिक विवादों के निपटारे में पारिवारिक न्यायालय अपनी स्वयं की प्रक्रिया निर्धारित कर सकता है।
हाईकोर्ट ने पाया कि पति द्वारा ट्रायल कोर्ट में दाखिल लिखित दलीलों के पैरा 11 में पत्नी के अवैध संबंधों के स्पष्ट आरोप लगाए गए थे और उनके समर्थन में व्हाट्सऐप चैट भी संलग्न थीं।
फिर भी ट्रायल कोर्ट ने न तो इन साक्ष्यों पर विचार किया और न ही व्यभिचार के मुद्दे पर कोई विशिष्ट प्रश्न तय किया। हाईकोर्ट ने कहा कि पति द्वारा दायर स्पष्ट आरोपों और साक्ष्यों को देखते हुए इस मुद्दे पर विचार करना और साक्ष्यों के आधार पर निर्णय देना आवश्यक था।
साथ ही, ट्रायल कोर्ट ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम की धारा 12 के तहत आवेदन पर निर्णय देते समय पति द्वारा दाखिल साक्ष्यों पर विचार नहीं किया और व्यभिचार के मुद्दे पर कोई विशिष्ट प्रश्न निर्धारित नहीं किया, जो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 354(6) के तहत अनिवार्य था।
अदालत के निर्देश
हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का आदेश कानून की नजर में टिकाऊ नहीं है और उसे निरस्त किया जाता है।
मामले को पुनः सुनवाई और नए सिरे से विचार के लिए ट्रायल कोर्ट को भेजा गया है, ताकि दोनों पक्षों के वकीलों को सुनने के बाद और ऐसे साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति देकर, जो पारिवारिक न्यायालय अधिनियम की धारा 14 के आलोक में विवाद के प्रभावी निस्तारण में सहायक हों, उचित निर्णय लिया जा सके।

