Kerala Assembly Elections: सरकार विरोधी माहौल और अच्छे सर्वे के बावजूद कांग्रेस परेशान
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Kerala Assembly Elections: सरकार विरोधी माहौल और अच्छे सर्वे के बावजूद कांग्रेस परेशान

केरल में सरकार के खिलाफ नाराजगी और हाल के चुनाव पूर्व सर्वे कांग्रेस के लिए उम्मीदें जगा रहे हैं। हालांकि कांग्रेस के लिए अभी भी रहा काफी मुश्किल है।


केरल में चुनाव से पहले का माहौल धीरे-धीरे गरम हो रहा है। पिछले हफ्ते एक युवक और एक युवती लेखक के अपार्टमेंट परिसर में आए। उन्होंने रेजिडेंट्स एसोसिएशन के सचिव से मुलाकात की और वहां मौजूद लोगों से चुनाव से पहले का सर्वे किया। उन्होंने यह नहीं पूछा कि राज्य की वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) सरकार ने कैसा काम किया या कौन चुनाव जीतेगा। वे यह जानना चाहते थे कि त्रिक्काकारा सीट से यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) का उम्मीदवार किसे बनाया जाए। त्रिक्काकारा केरल की सबसे शहरी सीटों में से एक है और अभी वहां से कांग्रेस की उमा थॉमस विधायक हैं। उमा थॉमस 2022 में अपने दिवंगत पति पी. टी. थॉमस की जगह विधायक बनीं। पी. टी. थॉमस कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे और 2021 में चुनाव जीतने के कुछ महीनों बाद उनका निधन हो गया था। इन सर्वे करने वालों से बातचीत में यह बात सामने आई कि कांग्रेस इस समय अपने जीतने की संभावना, सही उम्मीदवार चुनने और संगठन को मजबूत करने पर ज्यादा ध्यान दे रही है, ताकि शहरों में LDF सरकार के खिलाफ नाराजगी को वोट में बदला जा सके।

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के नेतृत्व वाला गठबंधन, जो लगातार तीसरी बार सत्ता में आना चाहता है, उसकी नीतियों या विचारधारा पर हमला करने से ज्यादा कांग्रेस अपनी ही स्थिति को लेकर चिंतित है। ऊपर से देखने पर कांग्रेस मजबूत नजर आती है। खासकर दिसंबर में हुए स्थानीय निकाय (LSG) चुनाव उसके पक्ष में गए थे। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद मुस्लिम वोट भी काफी हद तक उसके साथ आए हैं। पिछले हफ्ते आए चुनाव पूर्व सर्वे में भी सत्तारूढ़ LDF की ज्यादा तारीफ नहीं हुई है। फिर भी कांग्रेस को चिंता है कि सरकार के खिलाफ जो नाराजगी है, वह अपने आप उसके पक्ष में वोट में नहीं बदल सकती। इसकी वजह यह है कि वाम दलों के खिलाफ वोट बंट सकते हैं। उदाहरण के लिए, मनोरामा न्यूज–सीवोटर के एक चर्चित सर्वे में पाया गया कि 53.7% लोग मौजूदा पिनराई विजयन सरकार को हटाना चाहते हैं, जबकि 40.3% लोग चाहते हैं कि सरकार जारी रहे। कांग्रेस के लिए यह आंकड़े महत्वपूर्ण हैं। इससे पता चलता है कि सरकार के खिलाफ माहौल होने के बावजूद LDF के पास अभी भी मजबूत और पक्का वोट बैंक है, जो उसे पूरी तरह कमजोर होने से बचा सकता है। साथ ही, जो लोग नाराज हैं वे एकजुट नहीं हैं। इस स्थिति का फायदा UDF के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को भी मिल सकता है।

उसी सर्वे में यह भी सामने आया कि लोगों में नाराजगी तो है, लेकिन कोई बड़ा और साफ झुकाव नहीं दिख रहा। सरकार के खिलाफ माहौल है, लेकिन इतना मजबूत नहीं कि सरकार बदलना तय हो जाए। अगर मुकाबला तीन पार्टियों के बीच होता है, तो सरकार विरोधी वोट UDF और BJP के नेतृत्व वाले NDA के बीच बंट सकते हैं। इससे कांग्रेस को पूरा फायदा नहीं मिल पाएगा। अन्य चुनाव पूर्व आकलन भी इसी उलझन की ओर इशारा करते हैं। कई जगह लोग सरकार के काम से थके हुए नजर आते हैं, लेकिन वहां के मौजूदा LDF विधायकों को अब भी समर्थन मिल रहा है। इससे पता चलता है कि पूरे राज्य का माहौल और स्थानीय स्तर पर वोट देने का व्यवहार अलग-अलग हो सकता है। इससे कांग्रेस की वह रणनीति कमजोर पड़ती है, जिसमें वह सरकार विरोधी माहौल के सहारे ज्यादा सीटें जीतने की उम्मीद कर रही है।

लीक हुई कांग्रेस की रिपोर्ट

कांग्रेस के चुनाव रणनीतिकार सुनील कनुगोलु और उनकी टीम द्वारा किए गए एक सर्वे की जानकारी पार्टी के अंदर से लीक होकर मीडिया तक पहुंच गई। इस अंदरूनी रिपोर्ट में बताया गया कि केरल के कम से कम चार जिलों में संगठन कमजोर है। साथ ही, कई सीटों पर बड़े बदलाव की बजाय कांटे की टक्कर होने की संभावना जताई गई है।

एक ऐसी पार्टी के लिए, जो पहले पूरे राज्य के माहौल के सहारे अपनी स्थानीय कमजोरियों को संभालती रही है, यह स्थिति अच्छी नहीं मानी जा सकती। कांग्रेस की अंदरूनी समस्याएं, जैसे गुटबाजी, बूथ स्तर पर कमजोर संगठन और कुछ जिलों में कमजोर नेतृत्व ये सिर्फ सरकार विरोधी माहौल के सहारे छिपाई नहीं जा सकतीं। निजी बातचीत में कांग्रेस नेता मानते हैं कि चुनौती अब सिर्फ वाम दलों को हराने की नहीं है। कुछ सीटों पर यह भी जरूरी है कि विरोध के वोट सीधे BJP के पास न चले जाएं।

सर्वे बताते हैं कि लोगों की नाराजगी मुख्य रूप से पुलिसिंग, अल्पसंख्यकों के खिलाफ माहौल और सबरीमला विवाद जैसे मुद्दों पर है। लेकिन यह नाराजगी पूरी तरह विचारधारा पर आधारित नहीं है। यह ज्यादा व्यावहारिक (लेन-देन जैसी) सोच पर आधारित है। मतदाता विकल्प खोज रहे हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि उसका फायदा सिर्फ कांग्रेस को ही मिले।

कांग्रेस की ‘दो मोर्चों’ की लड़ाई

मलाबार के एक वरिष्ठ UDF नेता ने कहा, 'स्थिति 2010-11 जैसी है। तब हमने स्थानीय निकाय चुनाव ज्यादा मजबूती से जीते थे, लेकिन विधानसभा चुनाव में उस जीत को दोहरा नहीं पाए। आपको पिरावोम में टी. एम. जैकब की 157 वोटों से जीत और मनालूर में पी. ए. माधवन की जीत याद होगी। उन्हीं छोटे अंतर ने हमें जीत दिलाई थी। वरना हम तब भी हार सकते थे।'

उन्होंने आगे कहा, 'उस समय CPI(M) के अंदर भी पिनराई और वी. एस. अच्युतानंदन के बीच गुटबाजी के कारण अंदरूनी समस्याएं थीं। इस बार BJP का प्रभाव बहुत महत्वपूर्ण है, और हम यह पक्के तौर पर नहीं कह सकते कि वह हमारे वोट नहीं काटेगी। फिलहाल हमें अल्पसंख्यकों का समर्थन मिला हुआ है, लेकिन केवल उसी के भरोसे जीतना मुश्किल हो सकता है।' उन्होंने यह भी कहा, 'CPI(M) शायद केरल के मध्य और दक्षिणी इलाकों पर ज्यादा भरोसा कर रही है। सच कहें तो मुकाबला कड़ा है, लेकिन हमें लगता है कि हमारे पास अभी भी थोड़ी बढ़त है।' इसी वजह से त्रिक्काकारा जैसे अंदरूनी सर्वे महत्वपूर्ण हैं। इनका मकसद सिर्फ जनता की राय जानना नहीं, बल्कि पार्टी के संगठन की स्थिति समझना है। ऐसे सर्वे उन सीटों पर भी हो रहे हैं, जहां कांग्रेस पिछली बार चुनाव हार गई थी और इस बार उम्मीदवार बदलने पर विचार कर रही है।

‘बाएं और दाएं के बीच फंसी कांग्रेस’

उम्मीदवार की पसंद से जुड़े सवाल यह दिखाते हैं कि कड़े मुकाबले में नेता की साख और स्थानीय नेटवर्क बहुत अहम हो सकते हैं। जो शहरी सीटें पहले कांग्रेस का गढ़ मानी जाती थीं, वहां अब कड़ा मुकाबला है, खासकर दक्षिण के इलाकों और राजधानी में। BJP ने मध्यम वर्ग वाले इलाकों में अपनी पकड़ बढ़ाई है, जबकि वाम दलों को कम आय वाले लोगों में कल्याण योजनाओं के कारण समर्थन मिल रहा है। ऐसे में कांग्रेस खुद को इन दोनों के बीच फंसा हुआ महसूस कर रही है।

मनोरामा–सीवोटर सर्वे के नतीजे इस दुविधा को और मजबूत करते हैं। जो 40 प्रतिशत लोग अभी भी LDF का समर्थन कर रहे हैं, वे एक मजबूत विचारधारा और कल्याण योजनाओं पर भरोसा करने वाले स्थायी वोटर हैं। बाकी वोटर पूरी तरह तय नहीं हैं, और यह स्थिति तीसरी पार्टी को भी उतना ही फायदा दे सकती है जितना मुख्य विपक्ष को। कांग्रेस नेताओं को यह भी चिंता है कि अगर सरकार विरोधी माहौल के साथ कोई साफ और मजबूत संदेश नहीं होगा, तो इसका उल्टा असर भी हो सकता है। केरल की राजनीति में पहले भी सरकार के खिलाफ लहर तभी सफल हुई है जब विपक्ष ने मजबूत विकल्प और स्पष्ट योजना पेश की हो। फिलहाल UDF का प्रचार खुद मुद्दे तय करने के बजाय सिर्फ प्रतिक्रिया देता हुआ नजर आ रहा है।

वाम दलों की रणनीति सीटों को स्थानीय मुद्दों तक सीमित रखने की है। उनके विधायक अपने क्षेत्र में किए गए काम, कल्याण योजनाओं और संकट के समय की गई मदद को सामने रख रहे हैं। सर्वे में स्थानीय विधायकों को मिल रहा समर्थन इस रणनीति को सही साबित करता है और पूरे राज्य में सरकार विरोधी माहौल के असर को कम करता है। CPI(M) की राज्य समिति के एक सदस्य ने कहा, 'हमें लोकसभा और स्थानीय निकाय चुनावों में लगातार हार का सामना करना पड़ा, और अल्पसंख्यक वोटों का बदलना एक बड़ा कारण था। लेकिन हमारे पास अभी भी मुकाबला करने का मौका है। हम सरकार की विकास और कल्याण योजनाओं की ताकत पर भरोसा कर रहे हैं। जहां-जहां वोट BJP की ओर गए हैं, हमने उन इलाकों की पहचान कर ली है और वहीं ज्यादा ध्यान देंगे। सबरीमला सोना चोरी मामले में हाल के घटनाक्रम, जिसमें शक की सुई कांग्रेस नेतृत्व के कुछ लोगों की ओर भी जा रही है, हमारी स्थिति को और मजबूत कर सकते हैं।'

BJP के वोट प्रतिशत में धीरे-धीरे बढ़ोतरी होने से स्थिति और जटिल हो गई है। भले ही वह बहुत ज्यादा सीटें न जीते, लेकिन अगर कुछ खास क्षेत्रों में उसे 10 प्रतिशत या उससे ज्यादा वोट मिलते हैं, तो नतीजे काफी बदल सकते हैं। कांग्रेस के रणनीतिकार निजी तौर पर मानते हैं कि जहां तीन पार्टियों के बीच मुकाबला होता है, वहां कुछ महत्वपूर्ण सीटों पर वाम दलों के पक्के और अनुशासित वोटरों को फायदा मिल सकता है। कनुगोलु की लीक हुई रिपोर्ट में भी चेतावनी दी गई थी कि कई जगह मुकाबला बहुत कड़ा होगा, संगठन में कमियां हैं और बूथ स्तर पर कमजोरी के कारण करीबी लड़ाई हारी जा सकती है। केरल की राजनीति इस समय काफी बदलती और अनिश्चित है। वाम दलों के पास अब भी मजबूत और स्थायी समर्थन है। BJP धीरे-धीरे अपना आधार बढ़ा रही है। कांग्रेस माहौल और छवि के स्तर पर आगे दिखती है, लेकिन संगठन के मामले में उसे दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।


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