
पश्चिम बंगाल के सरकारी मदरसे अलग-थलग नहीं, BJP की धारणा गलत
पश्चिम बंगाल के सरकारी मान्यता प्राप्त मदरसों में गैर-मुस्लिम छात्र और शिक्षक भी पढ़ते और काम करते हैं। ये मदरसे छात्रों की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव लाए हैं।
पश्चिम बंगाल में सरकारी मान्यता प्राप्त मदरसों को अक्सर कुछ लोग अलग-थलग धार्मिक केंद्र के रूप में पेश करते हैं, लेकिन हकीकत इससे अलग है। राज्य में कुल 614 मान्यता प्राप्त मदरसे हैं। राज्य मदरसा शिक्षा बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, हाई मदरसों में लगभग 17% छात्र गैर-मुस्लिम हैं। वहीं करीब 11% शिक्षक और अन्य कर्मचारी भी गैर-मुस्लिम समुदाय से हैं। इससे साफ है कि इन मदरसों में अलग-अलग समुदायों के लोग पढ़ते और काम करते हैं।
28 साल के बाबर अली जम्मू-कश्मीर में अपनी अगली फील्ड पोस्टिंग का इंतजार कर रहे हैं। ये दूसरा मौका होगा जब उनकी तैनाती जम्मू-कश्मीर में होगी। द फेडरेल से बात करते हुए उन्होंने बताया कि, 'आदेश आ गया है। [मेरा मूवमेंट ऑर्डर 20 मार्च का है।] मैं दोबारा फील्ड में जाने के लिए बहुत उत्साहित हूं। हर सैनिक चाहता है कि उसे ऐसी जगह पोस्टिंग मिले जहां सुरक्षा की बड़ी जिम्मेदारी हो। आखिर हम सेना में इसलिए भर्ती होते हैं क्योंकि हम देश के लिए मोर्चे पर खड़ा होना चाहते हैं, और मैं भी इससे अलग नहीं हूं।' अली ने फोन पर बातचीत में कहा। उनकी आवाज में देश सेवा का जज़्बा साफ झलकता है।
अली भारतीय सेना की आर्टिलरी रेजिमेंट की 237 फील्ड यूनिट में गनर हैं। फिलहाल वे उत्तर प्रदेश के सिकंदराबाद में तैनात हैं। वे कहते हैं कि पश्चिम बंगाल के एक ग्रामीण गांव के मदरसे में पढ़ाई के दौरान ही उनके अंदर देश के प्रति कर्तव्य की भावना पैदा हुई। वे कहते हैं,'आज मैं जो भी हूं, उसके लिए मैं अपने मदरसे के शिक्षकों द्वारा दिए गए संस्कारों का आभारी हूं।'
पूर्व बर्दवान जिले के केतुग्राम स्थित अगार्डांगा हाई मदरसे की कक्षा से लेकर भारतीय सेना की आर्टिलरी यूनिट तक का उनका सफर एक ऐसी सच्चाई दिखाता है, जो पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) द्वारा पेश की गई राजनीतिक धारणा से अलग है।
पिछले हफ्ते राज्य विधानसभा में अंतरिम बजट पर चर्चा के दौरान बीजेपी विधायक अग्निमित्रा पॉल ने मदरसा शिक्षा के लिए दिए गए धन पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि, 'ऐसे संस्थान डॉक्टर, इंजीनियर और शिक्षक बनाने के बजाय अपराधी पैदा करते हैं।' उनके इस बयान को सत्तापक्ष के विरोध के बाद 'विभाजनकारी भाषा' बताकर कार्यवाही से हटा दिया गया।
हालांकि, इस विवाद ने यह बहस शुरू कर दी कि राज्य की राजनीति में मदरसों को किस तरह पेश किया जाता है। अगर छात्रों की संख्या, कर्मचारियों की संरचना और छात्रों की उपलब्धियों को ध्यान से देखा जाए, तो पश्चिम बंगाल में मदरसा शिक्षा की तस्वीर काफी समावेशी नजर आती है।
अगार्डांगा हाई मदरसा के वरिष्ठ प्रशासनिक कर्मचारी सिबाराम साहा ने द फेडरेल को बताया,'हमारे संस्थान के पूर्व छात्र आज कई क्षेत्रों में काम कर रहे हैं,जैसे चिकित्सा,इंजीनियरिंग,शिक्षण,पुलिस और सशस्त्र बल।'साहा खुद भी इसी मदरसे के पूर्व छात्र हैं। अगार्डांगा हाई मदरसा में कुल 884 छात्रों में से 375 छात्र हिंदू हैं। वहीं 21 कर्मचारियों में से 9 हिंदू समुदाय से हैं। साहा ने कहा,'1925 में स्थापना के बाद से ही इस मदरसे में हिंदू छात्र पढ़ते आ रहे हैं। पश्चिम बंगाल के कई अन्य मदरसों की तरह यहां भी हिंदू छात्र शुरू से ही अहम हिस्सा रहे हैं।'उन्होंने दावा किया,'इलाके में तीन हाई स्कूल हैं, फिर भी हमारे संस्थान में सबसे ज्यादा छात्र पढ़ते हैं, जिनमें हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के बच्चे शामिल हैं।'
बीजेपी और उसके सहयोगी दलों के कुछ नेताओं द्वारा जैसा दिखाया जाता है, उसके उलट पश्चिम बंगाल के मदरसे अलग-थलग धार्मिक केंद्र नहीं हैं। ये राज्य की मुख्यधारा की शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं। यहां राज्य माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का लगभग पूरा पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है, केवल दो विषय अरबी भाषा से जुड़े होते हैं। इन मदरसों में बड़ी संख्या में गैर-मुस्लिम छात्र भी पढ़ते हैं। पश्चिम बंगाल मदरसा शिक्षा बोर्ड के 2025 के आंकड़ों के अनुसार, हाई मदरसों (कक्षा 10 तक) में लगभग 17 प्रतिशत छात्र गैर-मुस्लिम हैं। वहीं करीब 11 प्रतिशत शिक्षक और अन्य कर्मचारी भी गैर-मुस्लिम समुदाय से हैं। प्रबंधन समितियों में भी गैर-मुस्लिम सदस्यों की अच्छी भागीदारी है।
मदरसा शिक्षा बोर्ड के रिकॉर्ड के अनुसार, कई जिलों के कुछ मदरसों में मुस्लिम छात्र अल्पसंख्यक हैं। इनमें बर्दवान का ओरग्राम चतुसपाली हाई मदरसा, उत्तर दिनाजपुर का कस्बा एमएम हाई मदरसा, पश्चिम मिदनापुर का चंद्रकोना इस्लामिया हाई मदरसा, हुगली का डाबरा हाई मदरसा और दक्षिण 24 परगना का सागर मोनिरुद्दीन हाई मदरसा शामिल हैं। पिछले साल हाई मदरसा (कक्षा 10) की परीक्षा में 47,376 छात्रों ने हिस्सा लिया था, जिनमें 1,046 छात्र गैर-मुस्लिम थे। भले ही परीक्षा में गैर-मुस्लिम छात्रों की संख्या कुल हिस्सेदारी से कम थी, फिर भी ये आंकड़े इस धारणा को चुनौती देते हैं कि मदरसों में केवल एक धर्म विशेष की धार्मिक शिक्षा दी जाती है।
कूचबिहार जिले के बारो नलधोंद्रा एच.के. हाई मदरसा के पूर्व छात्र मुर्शिद आलम ने कहा,'अगर मेरे इलाके में मदरसा नहीं होता,तो शायद मैं पढ़ाई ही नहीं कर पाता। मेरे पिता दिहाड़ी मजदूर हैं,उनके लिए हम चारों भाई-बहनों की पढ़ाई का खर्च उठाना मुश्किल होता।'
पिछले साल आलम ने नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (NEET) पास किया और मालदा मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया। आलम के अनुसार, मदरसे की पढ़ाई कभी भी उनके सपनों या एमबीबीएस में प्रवेश के रास्ते में रुकावट नहीं बनी। बल्कि उनका कहना है कि मदरसे में मिली मजबूत बुनियादी शिक्षा ने उन्हें NEET जैसी कठिन राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा की तैयारी में मदद की।
लिंग, जाति या धर्म के आधार पर नहीं होता भेदभाव
बारो नलधोंद्रा एच.के. हाई मदरसा के शिक्षक खुर्शीद आलम ने कहा,'यह दुख की बात है कि मदरसा शिक्षा को अब भी गलत तरीके से समझा और पेश किया जाता है। इन संस्थानों के बारे में बार-बार गलत धारणा फैलाई जाती है, जबकि ये राज्य के अलग-अलग समुदायों के हजारों गरीब छात्रों को शिक्षा देते हैं। मदरसे लिंग, जाति या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करते। उन्होंने बच्चों को पढ़ने और अपना भविष्य बनाने का मौका देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।'
पिछले साल हाई मदरसा परीक्षा में लड़कियों की संख्या लड़कों से ज्यादा थी। परीक्षा में 28,653 छात्राएं शामिल हुईं, जबकि 15,420 छात्र परीक्षा में बैठे। नतीजों में भी लड़कियों ने बेहतर प्रदर्शन किया। टॉप 10 मेरिट सूची में शामिल 15 छात्रों में से 12 यानी 80 प्रतिशत लड़कियां थीं। इस समय राज्य में कुल 614 मान्यता प्राप्त मदरसे हैं। इनमें से 102 सीनियर मदरसा शिक्षा प्रणाली (कक्षा 12 के समान) के तहत चलते हैं, जबकि 423 हाई मदरसा शिक्षा प्रणाली (कक्षा 10 तक) का हिस्सा हैं।
पश्चिम बंगाल के अंतरिम बजट में अल्पसंख्यक मामलों और मदरसा शिक्षा विभाग के लिए लगभग 5,713 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। बीजेपी विधायक अग्निमित्रा पॉल ने इस राशि के आकार पर आपत्ति जताई, लेकिन यह पूरी रकम केवल मदरसा शिक्षा पर खर्च नहीं होती। इस बजट में छात्रवृत्ति, कल्याणकारी योजनाएं, छात्रावास और प्रशासनिक खर्च भी शामिल हैं। अंतरिम बजट में मदरसा शिक्षा के लिए अलग से कोई राशि तय नहीं बताई गई है।
पश्चिम बंगाल मदरसा शिक्षा बोर्ड के अधिकारियों ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करने से इनकार किया। हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि बीजेपी विधायक की टिप्पणी में सरकारी मान्यता प्राप्त मदरसों और खारिजी मदरसों को एक जैसा समझ लिया गया। खारिजी मदरसे अपने अलग पाठ्यक्रम पर चलते हैं और निजी या सामुदायिक दान से संचालित होते हैं। वे मुख्यधारा की शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा नहीं हैं। बंगाल मदरसा एजुकेशन फोरम के इसराउल मंडल का कहना है कि राज्य सरकार द्वारा चलाए जा रहे मदरसों पर सवाल उठाने के बजाय, कोशिश यह होनी चाहिए कि खारिजी मदरसों को भी सरकारी व्यवस्था के दायरे में लाया जाए, ताकि उन पर बेहतर निगरानी और नियंत्रण हो सके।

