ओबीसी-ईबीसी दांव या सवर्ण चेहरा, बिहार में अब सीएम पर मंथन
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ओबीसी-ईबीसी दांव या सवर्ण चेहरा, बिहार में अब सीएम पर मंथन

बिहार में पहली बार बीजेपी सीएम की चर्चा तेज है। सम्राट चौधरी का नाम सबसे आगे माना जा रहा है जबकि पार्टी OBC या EBC चेहरा लाकर भी नया राजनीतिक समीकरण बना सकती है।


बिहार की राजनीति एक बार फिर संभावित बदलाव के संकेत दे रही है। लंबे समय से सूबे की सत्ता क्षेत्रीय दलों और गठबंधन राजनीति के इर्द-गिर्द घूमती रही है, जहां मुख्यमंत्री पद अक्सर सहयोगी दलों के पास रहा और भाजपा जूनियर पार्टनर की भूमिका में दिखी। ऐसे में अब यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या आने वाले समय में बिहार को पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री मिल सकता है।

राजनीतिक हलकों में इस संभावना को इसलिए भी गंभीरता से देखा जा रहा है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में राज्य में भाजपा का संगठनात्मक विस्तार और चुनावी प्रदर्शन दोनों मजबूत हुए हैं। अगर भविष्य में सत्ता का गणित भाजपा के पक्ष में जाता है, तो पार्टी पहली बार राज्य में शीर्ष नेतृत्व स्थापित करने की कोशिश कर सकती है। इसी संदर्भ में कई नाम चर्चा में हैं, जिनमें सबसे प्रमुख नाम सम्राट चौधरी का माना जा रहा है। साथ ही यह संभावना भी जताई जा रही है कि भाजपा किसी नए अति पिछड़ा जाति (OBC) या आर्थिक तौर पर पिछड़ा वर्ग (EBC) चेहरे को आगे कर राजनीतिक समीकरणों को नया मोड़ दे सकती है।

बिहार में मुख्यमंत्री पद भाजपा के लिए क्यों अहम

बिहार देश के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक राज्यों में से एक है। 40 लोकसभा सीटों वाला यह सूबा देश की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है। भाजपा ने पिछले एक दशक में कई राज्यों में अपने दम पर सरकार बनाई है, लेकिन बिहार में वह अब तक मुख्यमंत्री पद तक नहीं पहुंच पाई है। ऐतिहासिक तौर पर बिहार में भाजपा का विस्तार गठबंधन राजनीति के माध्यम से हुआ।

1990 के दशक से भाजपा ने क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर अपने राजनीतिक आधार को मजबूत किया। लंबे समय तक जनता दल (यूनाइटेड) के साथ गठबंधन में रहते हुए पार्टी ने संगठन और सामाजिक आधार को विस्तार दिया, जबकि मुख्यमंत्री पद नीतीश कुमार के पास रहा। इस दौरान भाजपा ने सत्ता में भागीदारी जरूर की, लेकिन नेतृत्व की भूमिका में आने की कोशिश सीमित रही। अब बदलते राजनीतिक माहौल और पार्टी के बढ़ते आत्मविश्वास के बीच यह चर्चा तेज हो रही है कि भाजपा बिहार में भी शीर्ष नेतृत्व स्थापित करना चाहती है।

सम्राट चौधरी क्यों माने जा रहे हैं प्रमुख दावेदार?

संभावित मुख्यमंत्री चेहरों की चर्चा में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी का नाम सबसे आगे बताया जा रहा है। उनका राजनीतिक सफर कई दलों से होकर गुजरने के बाद भाजपा तक पहुंचा है, जहां उन्होंने कम समय में संगठन में महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया।

सम्राट चौधरी की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उनका सामाजिक आधार माना जाता है। वे कुशवाहा समुदाय से आते हैं, जो बिहार की राजनीति में एक प्रभावशाली पिछड़े वर्ग से हैं। भाजपा पिछले कई वर्षों से राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग और आर्थिक तौर पर पिछड़े वर्गों के बीच अपना प्रभाव बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। ऐसे में सम्राट चौधरी का नाम राजनीतिक और सामाजिक दोनों दृष्टि से बेहतर माना जा रहा है।

इसके अलावा प्रदेश अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संगठन को आक्रामक राजनीतिक शैली में सक्रिय किया है और राज्य सरकार की नीतियों के खिलाफ लगातार मुखर रहे हैं। यही वजह है कि पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह उन्हें संभावित मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में देखा जा रहा है।

विजय चौधरी का नाम क्यों चर्चा में

कुछ राजनीतिक चर्चाओं में विजय चौधरी का नाम भी सामने आता है। वे लंबे समय से बिहार की राजनीति में सक्रिय रहे हैं और प्रशासनिक अनुभव भी रखते हैं। हालांकि वे सीधे तौर पर भाजपा से नहीं जुड़े रहे, इसलिए उनका नाम भाजपा के संभावित मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में कम और व्यापक राजनीतिक समीकरणों के संदर्भ में अधिक देखा जाता है।

यदि भविष्य में कोई नया गठबंधन समीकरण बनता है या सत्ता संतुलन के लिए व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व की रणनीति अपनाई जाती है, तो ऐसे अनुभवी नेताओं के नाम चर्चा में आना स्वाभाविक है।

बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। राज्य में पिछड़ा और आर्थिक तौर पर पिछड़े वर्ग में आबादी काफी बड़ी है और पिछले तीन दशकों में इन वर्गों की राजनीतिक भूमिका लगातार मजबूत हुई है। भाजपा ने हाल के समय में इन वर्गों के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए कई रणनीतिक कदम उठाए हैं। ऐसे में यह संभावना भी जताई जा रही है कि पार्टी मुख्यमंत्री पद के लिए किसी ऐसे चेहरे को आगे ला सकती है जो अपेक्षाकृत नया हो, लेकिन सामाजिक रूप से व्यापक स्वीकार्यता रखता हो।

विशेष रूप से EBC वर्ग से आने वाला कोई नेता पार्टी के लिए एक बड़ा राजनीतिक प्रयोग हो सकता है। इससे भाजपा को पारंपरिक जातीय ध्रुवीकरण से अलग एक नया राजनीतिक संदेश देने का अवसर मिल सकता है।

क्या चार दशक बाद बिहार को सवर्ण मुख्यमंत्री मिल सकता है

बिहार की राजनीति पर पिछले चार दशकों से सामाजिक न्याय की राजनीति का गहरा प्रभाव रहा है। 1990 के दशक में मंडल आंदोलन के बाद राज्य की सत्ता संरचना में पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों का प्रभाव तेजी से बढ़ा।

लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी और बाद में नीतीश कुमार के नेतृत्व में राज्य की राजनीति में पिछड़े वर्गों का वर्चस्व स्थापित हुआ। ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि क्या लगभग चार दशक बाद बिहार को फिर से कोई सवर्ण मुख्यमंत्री मिल सकता है।

हालांकि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए यह संभावना फिलहाल कम मानी जा रही है। भाजपा भी पिछले कई वर्षों से अपने सामाजिक आधार को OBC और EBC वर्गों में विस्तार देने की रणनीति पर काम कर रही है। इसलिए पार्टी के लिए वही सामाजिक समीकरण अधिक व्यावहारिक माने जाते हैं जो व्यापक जनसमर्थन सुनिश्चित कर सकें।

नीतीश कुमार की भूमिका और संभावित समीकरण

बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार लंबे समय तक केंद्रीय भूमिका में रहे हैं। पिछले दो दशकों में उन्होंने अलग-अलग राजनीतिक गठबंधनों के साथ कई बार सरकार बनाई। ऐसे में यह भी चर्चा होती रही है कि भविष्य में किसी राजनीतिक समझौते के तहत उनके किसी करीबी को मुख्यमंत्री पद दिया जा सकता है।

हालांकि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में भाजपा और जेडीयू के रिश्ते काफी जटिल रहे हैं। इसलिए इस तरह के संभावित समीकरणों को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों के बीच मतभेद भी देखने को मिलते हैं।

बिहार की राजनीति में संक्रमण दौर

दरअसल, बिहार की राजनीति इस समय एक संक्रमणकालीन दौर से गुजर रही है। एक ओर पारंपरिक क्षेत्रीय दल जैसे राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल (यू) अब भी मजबूत सामाजिक आधार रखते हैं, वहीं भाजपा राज्य में तेजी से अपना राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

पिछले चुनावों में भाजपा का वोट शेयर और सीटों की संख्या दोनों में वृद्धि देखी गई है। इससे पार्टी के भीतर यह विश्वास बढ़ा है कि वह आने वाले समय में राज्य की राजनीति में अधिक निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

कुल मिलाकर बिहार में मुख्यमंत्री पद को लेकर चल रही चर्चा कई स्तरों पर दिलचस्प है। एक तरफ सम्राट चौधरी जैसे नेताओं के नाम प्रमुखता से सामने आ रहे हैं, तो दूसरी तरफ नए सामाजिक प्रयोग की संभावनाओं पर भी विचार किया जा रहा है। साथ ही यह बहस भी जारी है कि क्या बिहार को चार दशक बाद फिर से कोई सवर्ण मुख्यमंत्री मिल सकता है।

हालांकि अंतिम फैसला केवल संभावित चेहरों से तय नहीं होगा। इसके पीछे चुनावी नतीजे, गठबंधन की संरचना, जातीय संतुलन और राजनीतिक रणनीति जैसे कई कारक निर्णायक भूमिका निभाएंगे। फिलहाल बिहार की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां आने वाले समय में नेतृत्व के साथ-साथ सामाजिक समीकरणों में भी बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

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