
हार, कलह और कमान, क्या तेजस्वी यादव बनेंगे आरजेडी के असली बॉस?
बिहार चुनाव में हार और पारिवारिक कलह के बीच तेजस्वी यादव को आरजेडी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने की चर्चा तेज, क्या बदलेगा पार्टी का भविष्य?
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले आरजेडी के कद्दावर नेता तेजस्वी यादव कहा करते थे कि इस दफा नीतीश कुमार सत्ता से बाहर होंगे। लेकिन नतीजे जब सामने आए तो वो चौंकाने वाले रहे। नीतीश कुमार ना सिर्फ 85 सीटों पर कब्जा जमाने में कामयाब हुए बल्कि एक बार फिर सीएम की कुर्सी पर काबिज होने में कामयाब हुए। इन सबके बीच आरजेडी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। पार्टी 25 सीटों पर सिमट गई। नतीजों के बाद लालू प्रसाद परिवार में कलह भी खुलकर सामने आ गई। लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने खुलकर अपने भाई तेजस्वी यादव पर तीखे आरोप लगाए। लेकिन अब खबर आ रही है कि 25 जनवरी को आरजेडी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में तेजस्वी राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जा सकते हैं।
अध्यक्ष/ कार्यकारी अध्यक्ष की ताकत
तेजस्वी यादव को कार्यकारी अध्यक्ष की कमान की संभावना से पहले आपको बताएंगे कि अध्यक्ष की कितनी ताकत होती है और तेजस्वी यादव की अगुवाई में लड़े गए चुनावों का नतीजा कैसा रहा। राष्ट्रीय अध्यक्ष, पार्टी के सर्वेसर्वा होते हैं, पार्टी का झंडा, चिन्ह और नाम बदलने का अधिकार होता है। सांसद से विधायक तक टिकट के संबंध में अंतिम फैसला लेता है। चुनावी सिंबल पर हस्ताक्षर होते हैं। पार्टी के कार्यकारिणी के सदस्यों को चुनने का अधिकार, 11 सदस्यों वाले कोर ग्रुप का गठन।
तेजस्वी के नेतृत्व में लड़े गए चुनावों के नतीजे
बिहार विधानसभा चुनाव में 2025 में आरजेडी 143 सीटों पर चुनाव लड़ी। लेकिन जीत 25 सीट पर मिली। बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में पार्टी 114 सीट पर लड़ी, जीत 75 सीट पर मिली। लोकसभा चुनाव में पार्टी 40 में से 23 सीट पर चुनाव लड़ी। लेकिन जीत महज 4 सीट पर मिली।
पहला कारण
ऐसे में सवाल यह है कि तेजस्वी यादव के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनने से क्या कुछ बदल जाएगा। तेजस्वी के कार्यकारी अध्यक्ष बनने का मतलब यह होगा कि लीडरशिप में बदलाव हो जाएगा। तेजस्वी यादव के हाथ में पूरी ताकत आ जाएगी। बता दें कि 5 जुलाई 1997 को आरजेडी का गठन हुआ था और तब से लालू यादव पार्टी की ताकत बने हुए हैं। लालू यादव, भले ही स्वास्थ्य संबंधी वजहों से अब उतने सक्रिय नहीं हैं लेकिन सच यह भी है कि उनके कद का नेता नीतीश कुमार को छोड़कर दूसरा कोई नहीं है। अब लालू यादव खुद अध्यक्ष की जिम्मेदारी से अलग करें यह पार्टी को सूट नहीं करता है। ऐसे में पार्टी के नेताओं को लगता है कि एक ऐसी व्यवस्था हो जिसमें लालू के साथ साथ पार्टी के निर्णायक फैसलों की जिम्मेदारी तेजस्वी यादव के हाथ में हो। ऐसा होने पर तेजस्वी फैसले ले सकेंगे जिसमें लालू यादव की भी सहमति होगी। तेजस्वी यादव को कोई और चुनौती नहीं दे सकेगा। तेजस्वी, पार्टी की नीति, संगठन में बदलाव और टिकट वितरण पर स्वतंत्र तरीके से फैसला कर सकेंगे। मौजूदा समय में पार्टी के सामने अनुशासन का संकट है और कार्यकारी अध्यक्ष रहते हुए तेजस्वी सख्ती से निर्णय कर सकेंगे।
दूसरा कारण
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले जब लालू यादव ने अपने बड़े बेटे तेज प्रताप यादव को परिवार और पार्टी से निकाला तो तेज प्रताप यादव ने अपनी पार्टी जनशक्ति जनता दल बनाई। हाल ही में दही चूड़ा भोज में ना सिर्फ लालू यादव शामिल बल्कि रबड़ी देवी के उनके साथ तीनों भाई प्रभुनाथ, साधु और सुभाष यादव हुए थे। इसके बाद यह कयास लगने लगे कि लालू यादव और रबड़ी देवी चाहती हैं कि पूरा परिवार एकजुट हो। इसके साथ ही तेज प्रताप यादव ने कहा कि जनशक्ति जनता दल ही असली आरजेडी है। लेकिन तेजस्वी यादव नहीं चाहते कि आरजेडी में इन लोगों की एंट्री हो। ऐसे में तेजस्वी यादव, राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनकर बहुत चीजों को सुरक्षित कर सकते हैं।
तीसरी वजह
इसके साथ ही सबसे बड़ी बात यह है कि तेजस्वी यादव का राष्ट्रीय कद बढ़ेगा। इंडिया गठबंधन की बैठकों में उन्हें तवज्जो मिलेगी। बिहार के बाहर किस पार्टी से मिलकर चुनाव लड़ना है। कितनी सीटों पर समझौता करना है। जानकार कहते हैं कि तेजस्वी यादव अभी असंवैधानिक तौर पार्टी के कर्ताधर्ता हैं। लेकिन राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनने का मतलब है कि पार्टी का कोई दूसरा सदस्य उनके फैसलों पर उंगली नहीं उठा सकेगा। आरजेडी के कद्दावर नेता शिवानंद तिवारी कहते हैं कार्यकारी अध्यक्ष को नियमित अध्यक्ष की तरह पावर होता है। वो एक खास प्रसंग का जिक्र करते हुए कहा कि लालू यादव जब जेल जा रहे थे को रंजन यादव को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया। लेकिन उनकी महत्वाकांक्षा जाग गई। रंजन यादव कुछ ऐसे फैसले लेने लगे जो लालू को नागवार लगा। लालू प्रसाद यादव ने उनसे पूछा कि क्या कार्यकारी अध्यक्ष फैसले ले सकता है जब कहा गया हां तो उन्होंने रंजन यादव को हटा दिया गया। कहने का अर्थ यह है कि अगर तेजस्वी यादव को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया तो उनके सारे फैसले पार्टी के हर एक सदस्य को मानना होगा। अगर कोई सदस्य तेजस्वी यादव के फैसलों के खिलाफ गया तो उसका भविष्य तेजस्वी के निर्णय पर निर्भर करेगा। कहने का अर्थ यह है कि आरजेडी में नियमित अध्यक्ष के बाद कार्यकारी अध्यक्ष की भूमिका बेहद अहम है।

