विज्ञान-तकनीक में ईरान की उड़ान, दुनिया के सामने नई तस्वीर
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युद्ध की दुनिया से परे इरान का समृद्ध समाज

विज्ञान-तकनीक में ईरान की उड़ान, दुनिया के सामने नई तस्वीर

इरान को लेकर युद्ध और आतंक की घिसी-पिटी कहानी से परे एक और कहानी भी है, जो अब तक छिपी हुई है। यह वह कहानी है जो वैश्विक मीडिया की चौखट शायद ही पार कर पाती है...


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ईरान का नाम लेते ही कुछ जानी-पहचानी तस्वीरें उभरती हैं। जैसे, आसमान में घातक चाप बनाता हुआ शाहेद-136 ड्रोन, और पहाड़ के भीतर बसे नतांज और फोर्डो (जहां ईरान की परमाणु सुविधाएं स्थित हैं) में मोटी दीवारों के पीछे गूंजती यूरेनियम संवर्धन सेंट्रीफ्यूज मशीनें। विज्ञान और तकनीक की बात आते ही अक्सर यही एक तस्वीर सामने आती है। कभी-कभी एक अलग स्मृति भी उभरती है, मरयम मिर्जाखानी। वह गणितज्ञ, जिन्होंने 2014 में अपने कार्य के लिए प्रतिष्ठित फील्ड्स मेडल पाने वाली पहली महिला बनकर इतिहास रचा।

लेकिन इस घिसी-पिटी कहानी से परे एक और कहानी भी है, जो अब तक छिपी हुई है। यह वह कहानी है जो वैश्विक मीडिया की चौखट पार शायद ही कर पाती है। और जब कभी सामने आती भी है, तो बिखरे हुए, हल्के और अनदेखे रह जाने वाले अंशों में जब तक कोई गहराई से पढ़ने की कोशिश न करे। जो देखने का साहस करता है, उसके लिए यहां एक आश्चर्य छिपा है।

ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स 2025 के अनुसार, 139 अर्थव्यवस्थाओं में ईरान 70वें स्थान पर है, जबकि नवाचार के ठोस परिणामों यानी शोध के वास्तविक उत्पादों में वह वैश्विक स्तर पर 46वें स्थान पर है। नैनोटेक्नोलॉजी प्रकाशनों और उत्पादन के मामले में ईरान दुनिया में चौथे या पांचवें स्थान पर है।

डॉ. महमूद बरानी और डॉ. हसन नमाज़ी जैसे शोधकर्ताओं ने नैनोमेडिसिन और दवा वितरण प्रणालियों (drug delivery systems) में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त कार्य किया है। ये प्रयास अलग-थलग नहीं हैं, बल्कि एक व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा हैं, जो अक्सर विपरीत परिस्थितियों के बावजूद आगे बढ़ती रही है।

बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में ईरान इस्लामी दुनिया में अग्रणी है। वैज्ञानिक जर्नल रेटिंग प्लेटफॉर्म SCImago के 2024 के आंकड़ों के अनुसार, बायोटेक्नोलॉजी में 1,111 शोधपत्रों के साथ ईरान इस्लामी देशों में पहले और वैश्विक स्तर पर 15वें स्थान पर है।

जब कोविड-19 महामारी ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में लिया, तब ईरान को दोहरी मार झेलनी पड़ी। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण वैक्सीन आयात जटिल हो गया, जिससे पहले से गंभीर स्थिति और कठिन हो गई। ऐसे समय में समाधान देश के भीतर से ही आया। ईरान ने तेजी से कई स्वदेशी वैक्सीन विकसित और निर्मित कीं, जिनमें कोवईरान बरकत (निष्क्रिय वायरस आधारित वैक्सीन) शामिल है। पास्टोकोवैक्स, एक रिकॉम्बिनेंट प्रोटीन वैक्सीन, क्यूबा के साथ मिलकर विकसित की गई, और फखरा वैक्सीन भी तैयार की गई।

रॉयन इंस्टीट्यूट फॉर स्टेम सेल बायोलॉजी एंड टेक्नोलॉजी जैसे संस्थानों ने विशेष रूप से स्टेम सेल अनुसंधान और पुनर्योजी चिकित्सा (regenerative medicine) के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय पहचान हासिल की है। कैंसर के उपचार की उभरती और अत्यधिक संभावनाशील तकनीक CAR-T सेल जीन थेरेपी के जरिए ईरानी वैज्ञानिकों ने रक्त कैंसर (ल्यूकेमिया) के एक मरीज का सफल इलाज किया है। इसी तरह, सीमित प्रयोगशाला संसाधनों के बावजूद जेनेटिक इंजीनियरिंग और मेडिकल बायोटेक्नोलॉजी में अनुसंधान लगातार विस्तार पा रहा है।

रॉयन इंस्टीट्यूट फॉर स्टेम सेल बायोलॉजी एंड टेक्नोलॉजी जैसे संस्थानों ने विशेष रूप से स्टेम सेल अनुसंधान और पुनर्योजी चिकित्सा के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय पहचान हासिल की है।

हस्ती-सादात हुसैनी, एक ईरानी महिला आविष्कारक, हाल ही में अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में रहीं। उनकी स्टेम सेल आधारित थेरेपी, ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (HPV) को नियंत्रित करने के लिए विकसित की गई है, जो स्टेम सेल ग्राफ्ट के माध्यम से सर्वाइकल घावों के उपचार को बढ़ावा देती है। इस आविष्कार को 2025 में जेनेवा में आयोजित 50वीं इंटरनेशनल एग्जीबिशन ऑफ इन्वेंशंस में वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी ऑर्गनाइजेशन (WIPO) का पुरस्कार मिला।

एक अन्य उदाहरण में, वैज्ञानिक हैदर हैदरी खोई ने प्रेरित प्लूरिपोटेंट स्टेम सेल्स (ऐसी कोशिकाएं जो विभाजन के माध्यम से स्वयं को पुनः निर्मित कर सकती हैं और भ्रूण की तीन प्रमुख जर्म परतों में विकसित हो सकती हैं) का उपयोग कर मानव भ्रूण का एक प्रयोगशाला मॉडल विकसित किया। इससे वास्तविक भ्रूण का उपयोग किए बिना प्रारंभिक विकास के बड़े स्तर पर अध्ययन संभव हो सका।

जुलजनाह सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल, जिसमें दो ठोस ईंधन चरण और एक सहायक तरल ईंधन चरण शामिल है, पूरी तरह स्वदेशी विकास है। इसकी पेलोड क्षमता 220 किलोग्राम और अधिकतम ऊंचाई 500 किलोमीटर है। बिना बाहरी सहायता के ईरानी वैज्ञानिकों द्वारा इसका विकास दुनिया के लिए आश्चर्यजनक रहा। इसके साथ ही, स्वदेशी ड्रोन और मिसाइल तकनीकों का विकास भी लगातार जारी है।

ईरानी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी द्वारा विकसित सिना रोबोटिक सर्जरी सिस्टम दूरस्थ सर्जरी को संभव बनाता है। ऐसे सिस्टम ईरान को उन गिने-चुने देशों में शामिल करते हैं जो सर्जिकल रोबोटिक्स का निर्माण और निर्यात करने में सक्षम हैं।

वैश्विक विज्ञान में ईरान की स्थिति केवल उदाहरणों तक सीमित नहीं है। नेचर इंडेक्स 2025 में 30वें स्थान पर रहते हुए, इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च इन फंडामेंटल साइंसेज, फर्दोसी यूनिवर्सिटी ऑफ मशहद और तेहरान यूनिवर्सिटी जैसे शोध संस्थान देश में बढ़ते ज्ञान-आधार को मजबूत आधार प्रदान कर रहे हैं।

फार्माकोलॉजी, टॉक्सिकोलॉजी, रेडियोलॉजी और न्यूक्लियर मेडिसिन के क्षेत्रों में ईरान क्षेत्र में शीर्ष स्थान पर है। वहीं भौतिक विज्ञान में, नेचर इंडेक्स के अनुसार, वह दूसरे स्थान पर है। एयरोस्पेस इंजीनियरिंग, परमाणु तकनीक और संबंधित इंजीनियरिंग क्षेत्रों में जैसे सैटेलाइट प्रक्षेपण, ड्रोन तकनीक और स्वदेशी एयरोस्पेस क्षमताएं प्रतिबंधों के बावजूद निरंतर प्रगति हो रही है।

बायोफ्यूल, स्मार्ट मटेरियल और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (विशेष रूप से हार्डवेयर एक्सेलेरेटर) जैसे विशेष क्षेत्रों में भी ईरान का प्रदर्शन मजबूत रहा है।

यूनेस्को के विज्ञान संकेतकों के अनुसार, अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर खर्च सीमित है, जो सामान्यतः जीडीपी का लगभग 0.5 से 0.7 प्रतिशत रहता है। आर्थिक दबाव भी लगातार बने हुए हैं। फिर भी, शोधकर्ताओं की घनता एक अलग कहानी बताती है। वर्ष 2021 में देश में प्रति दस लाख आबादी पर लगभग 2,240 शोधकर्ता दर्ज किए गए, जो वैश्विक औसत (1,420 प्रति दस लाख) से काफी अधिक है और भारत (201 प्रति दस लाख) की तुलना में बहुत ऊंचा है। यहां तक कि चीन (1,849 से 2,000+ प्रति दस लाख) के मुकाबले भी ये आंकड़े उल्लेखनीय हैं। ये दर्शाते हैं कि उच्च शिक्षा और शोध संस्थानों में निरंतर निवेश बना रहा है, जो ब्रेन ड्रेन जैसी चुनौतियों के बावजूद जारी है। राज्य-समर्थित विश्वविद्यालय और विशेषीकृत शोध संस्थान ईरान के विज्ञान और प्रौद्योगिकी तंत्र की रीढ़ हैं।

यूएनसीटैड (UNCTAD) की “साइंस, टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन पॉलिसी रिव्यू ऑफ ईरान (2016)” रिपोर्ट के अनुसार, देश में विज्ञान और प्रौद्योगिकी तंत्र के विकास के तीन चरण रहे। इनमें 1990 के दशक में उच्च शिक्षा का विस्तार, 2000 के दशक में शोध और उभरती तकनीकों के लिए आधारभूत संरचना का निर्माण और 2010 के दशक में नवाचार एवं ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण। रिपोर्ट यह भी बताती है कि एक विरोधाभासी स्थिति में, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने घरेलू विज्ञान और प्रौद्योगिकी विकास को प्रोत्साहित किया, जिससे स्वदेशी नवाचार का मार्ग मजबूत हुआ।

एक और महत्वपूर्ण पहलू महिलाओं की भागीदारी है। युवा महिलाओं में साक्षरता दर लगभग 99 प्रतिशत है और यूनेस्को के अनुसार विश्वविद्यालयों में 58 से 62 प्रतिशत छात्राएं हैं। पीएचडी और डॉक्टोरल कार्यक्रमों में भी लगभग 58 प्रतिशत छात्राएं हैं। कई विषयों, विशेषकर जीवन विज्ञान (लाइफ साइंसेज) में, महिलाओं का बहुमत है।

पीएचडी और डॉक्टोरल कार्यक्रमों में महिलाओं की भागीदारी लगभग 58 प्रतिशत है, और कई क्षेत्रों, खासकर जीवन विज्ञान में, वे बहुसंख्यक हैं।

STEM (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित) के उच्च शिक्षा स्तर पर महिलाओं की भागीदारी लगभग 25 प्रतिशत है, जो 2021 में संयुक्त राज्य अमेरिका (12.7 प्रतिशत) से कहीं अधिक है। जीवन और चिकित्सा विज्ञान, जीवविज्ञान तथा रसायन विज्ञान जैसे क्षेत्रों में महिलाओं का वर्चस्व है, जहां उनकी हिस्सेदारी अक्सर 50 से 60 प्रतिशत या उससे भी अधिक होती है। हालांकि इंजीनियरिंग, भौतिकी और मुख्य तकनीकी क्षेत्रों की तस्वीर अलग है। यूनेस्को के संकेतकों के अनुसार यहां आमतौर पर 20 से 30 प्रतिशत छात्राएं ही होती हैं।

1979 के बाद लागू नीतियों के चलते महिलाओं की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। नि:शुल्क शिक्षा, शिक्षा पर सांस्कृतिक जोर और विशेष रूप से महिला अभ्यर्थियों के लिए उदार छात्रवृत्तियों ने बड़े पैमाने पर महिलाओं की शिक्षा में भागीदारी को बढ़ावा दिया। इसके अलावा, कई प्रवेश परीक्षाओं में महिलाएं अक्सर पुरुषों से बेहतर प्रदर्शन करती हैं और कुछ संकायों में उनका दबदबा होता है। STEM शिक्षा में यूनेस्को का समायोजित जेंडर-पैरिटी इंडेक्स ईरान को अमेरिका और कई यूरोपीय देशों से ऊपर रखता है।

ईरान या वह भौगोलिक क्षेत्र जो आज इस देश का रूप ले चुका है, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपनी दक्षता के लिए नया नहीं है। प्राचीन काल से ही यह ज्ञान-सृजन का एक प्रमुख केंद्र रहा है। उदाहरण के लिए, पश्चिमी ईरान के ज़ाग्रोस पर्वतों में गेहूं, जौ, मसूर और मटर जैसी फसलों का प्रारंभिक घरेलूकरण हुआ। पिस्ता, बादाम और अखरोट जैसी फसलों की जड़ें भी ईरानी धरती से गहराई से जुड़ी हैं। इसके बाद पर्शियन व्हील, जिसे अरबी में साकिया और उत्तर भारत में रहट कहा जाता है, इसका विकास हुआ, जो गियर आधारित, पशु-चालित जल उठाने की तकनीक थी। यह 12वीं से 17वीं शताब्दी के बीच पश्चिम एशिया से भारतीय उपमहाद्वीप तक फैल गई। इससे छोटे बगीचों की जगह बड़े खेतों में सिंचाई संभव हुई और गन्ना तथा कुछ क्षेत्रों में धान जैसी फसलों की खेती का विस्तार हुआ। इसके साथ ही यांत्रिक ज्ञान-गियर, गति और मिल तकनीक यूरेशिया के विभिन्न क्षेत्रों में नए-नए उपयोगों के साथ फैलता गया।

9वीं से 12वीं शताब्दी के बीच, फारस (आज का ईरान) के विद्वानों ने वैश्विक विज्ञान की दिशा तय की। मुहम्मद इब्न मूसा अल-ख्वारिज्मी ने रैखिक और द्विघात समीकरणों को व्यवस्थित किया, जिससे आधुनिक बीजगणित की नींव पड़ी। हिंदू अंकों के साथ उनके कार्य का प्रभाव इतना व्यापक था कि “एल्गोरिदम” और “अलजेब्रा” जैसे शब्द उनके नाम और उपाधि से ही निकले हैं। उमर खय्याम, जो कवि, गणितज्ञ और खगोलशास्त्री थे, इन्होंने सुल्तान मलिक-शाह के अनुरोध पर 1079 ईस्वी में जलाली कैलेंडर तैयार किया, जो अपने समय के सबसे सटीक सौर कैलेंडरों में से एक था। चिकित्सा के क्षेत्र में इब्न सीना (एविसेना) की ‘कैनन’ नामक कृति ने यूनानी, फारसी और भारतीय परंपराओं को एक साथ जोड़ते हुए एक ऐसा ग्रंथ तैयार किया, जिसने पीढ़ियों तक ज्ञान को प्रभावित किया।

हालांकि, आधुनिक ईरान में ‘सुप्रीम लीडर’ के फतवे विज्ञान की सीमाओं को स्पष्ट रूप से निर्धारित करते हैं। 1990 के दशक में जारी एक फतवे के अनुसार, परमाणु हथियारों के विकास, उत्पादन, भंडारण या उपयोग पर शोध धार्मिक रूप से निषिद्ध (हराम) है। प्रजनन क्लोनिंग यानी पूर्ण रूप से क्लोन मानव का निर्माण स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित है। शोध के उद्देश्य से विशेष रूप से भ्रूण का निर्माण करना, बजाय अतिरिक्त IVF भ्रूणों के उपयोग के, ईरान के बायोएथिक्स नियमों के तहत निषिद्ध है। इसी प्रकार, यूजेनिक्स (मानव जीन पूल को सुधारना, श्रेष्ठ गुणों का चयन या गैर-चिकित्सीय सुधार) से जुड़े किसी भी आनुवंशिक शोध पर भी रोक है।

फिर भी, चिकित्सीय क्लोनिंग जैसे स्टेम सेल अनुसंधान के लिए सोमैटिक सेल न्यूक्लियर ट्रांसफर की अनुमति है, और इन क्षेत्रों में ईरानी शोधकर्ताओं का कार्य उल्लेखनीय माना जाता है और यहीं एक आश्चर्य सामने आता है। डार्विन के विकासवाद पर आधारित शिक्षा और शोध चाहे वह सामान्य जीवविज्ञान हो या मानव विकास ईरान में प्रतिबंधित नहीं है। यह स्कूल पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकों का हिस्सा है और एक सक्रिय अध्ययन क्षेत्र बना हुआ है। ईरानी संस्थान प्राचीन डीएनए, जनसंख्या के आनुवंशिक ढांचे, मानव जीनोम और जनसंख्या आनुवंशिकी पर शोध और प्रकाशन करते हैं।

आयतोल्लाह खामेनेई के 2018 के वक्तव्य में विकासवाद को रूमी के आध्यात्मिक दृष्टिकोण से जोड़ा गया, जिसमें विकास को एक आध्यात्मिक और उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया के रूप में देखा गया ईश्वर की ओर लौटने की आकांक्षा के रूप में। इसने भौतिकवादी डार्विनीय दृष्टिकोण और इस्लामी दार्शनिक अवधारणा के बीच अंतर स्पष्ट किया। इसलिए, जैविक विकास पर वैज्ञानिक शोध या शिक्षण को इस्लाम के विरुद्ध नहीं माना जाता। डार्विनीय विकास, प्राकृतिक चयन, अनुकूलन और प्रजाति निर्माण जैसे सिद्धांत दशकों से बिना किसी सेंसरशिप के राष्ट्रीय पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं।

इस संदर्भ में ईरान अपने पड़ोसी देशों से स्पष्ट रूप से अलग है। तुर्की (2017 से), सीरिया (शासन परिवर्तन के बाद), इराक (शासन परिवर्तन के बाद), अफगानिस्तान (तालिबान शासन में), पाकिस्तान (आंशिक रूप से) और सऊदी अरब में विकासवाद की शिक्षा और शोध पर प्रतिबंध या गंभीर सीमाएं हैं। वहीं, ईरान की तरह मलेशिया और इंडोनेशिया में ऐसे प्रतिबंध नहीं हैं।

दशकों से जारी प्रतिबंधों और सीमित संसाधनों के बावजूद, ईरान का वैज्ञानिक उत्पादन केवल टिके रहने तक सीमित नहीं रहा बल्कि पिछले कुछ दशकों में इसका विस्तार हुआ है।

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