NEET PG  में कटऑफ कम करने पर सख्त सुप्रीम कोर्ट, केंद्र सरकार से मांगा जवाब
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NEET PG में कटऑफ कम करने पर सख्त सुप्रीम कोर्ट, केंद्र सरकार से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने NBEMS द्वारा NEET PG 2025-26 के लिए कट-ऑफ पर्सेंटाइल घटाने के फैसले पर केंद्र और अन्य पक्षों से जवाब मांगा है। इस फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने इसे अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन बताया है


सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और अन्य पक्षों से नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) के फैसले पर जवाब मांगा है, जिसमें NEET PG 2025-26 के लिए क्वालीफाइंग कट-ऑफ पर्सेंटाइल को बहुत कम कर दिया गया है। यह विवाद तब सामने आया जब देश में 18,000 से ज्यादा पोस्टग्रेजुएट मेडिकल सीटें खाली पड़ी हुई हैं। इन सीटों को भरने के लिए NBEMS ने कट-ऑफ में बड़ा बदलाव किया है। अब कट-ऑफ इतना घटाया गया है कि बहुत कम अंक वाले उम्मीदवार भी काउंसलिंग में शामिल हो सकेंगे।

कट-ऑफ में बड़ा बदलाव क्या है?

इस बदलाव के अनुसार अनारक्षित (जनरल) श्रेणी के लिए कट-ऑफ पर्सेंटाइल 50 से घटाकर 7 कर दिया गया है। वहीं आरक्षित वर्ग (SC/ST/OBC) के लिए कट-ऑफ 40 से घटाकर 0 कर दिया गया है। इसका मतलब यह हुआ कि आरक्षित वर्ग के वे उम्मीदवार भी तीसरे राउंड की काउंसलिंग में भाग ले सकेंगे, जिनके अंक 800 में से -40 तक हों। यानी बहुत कम अंक वाले उम्मीदवार भी अब सीट पाने की दौड़ में शामिल हो जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे शामिल हैं, ने यूनियन ऑफ इंडिया, NBEMS, नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) और अन्य पक्षों को नोटिस जारी कर इस मामले में दलीलें सुनने का आदेश दिया है।

संविधान का उल्लंघन करता है फैसला

इस फैसले के खिलाफ याचिका सामाजिक कार्यकर्ता हरीशरण देवगन, डॉ. सौरव कुमार, डॉ. लक्ष्य मित्तल और डॉ. आकाश सोनी ने दायर की है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि कट-ऑफ में अचानक बदलाव करना अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है। उनका कहना है कि चयन प्रक्रिया शुरू होने के बाद योग्यता के मानदंड बदलना सही नहीं है, क्योंकि उम्मीदवारों ने पहले से ही पुराने कट-ऑफ के आधार पर तैयारी की थी और अपने करियर की योजना बनाई थी। अब इस बदलाव से उनकी मेहनत और करियर को नुकसान हो सकता है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि पोस्टग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा को केवल व्यावसायिक गतिविधि की तरह नहीं देखा जा सकता। नियम बनाने वाली संस्थाओं का काम है कि वे शिक्षा के मानकों को बनाए रखें और गुणवत्ता गिरने से बचाएं।

मेडिकल समुदाय के कई लोग NBEMS के इस निर्णय को “अप्रत्याशित और तर्कहीन” मान रहे हैं। उनका मानना है कि इतने कम अंक पर उम्मीदवारों को काउंसलिंग में शामिल करने से मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता पर असर पड़ेगा और इससे चिकित्सा व्यवस्था में भरोसा कमजोर हो सकता है।

NEET PG देश के सबसे महत्वपूर्ण मेडिकल एडमिशन सिस्टम में से एक है और हर साल हजारों उम्मीदवार इसके लिए तैयारी करते हैं। कट-ऑफ में अचानक बदलाव से उम्मीदवारों की मेहनत प्रभावित होती है, मेडिकल शिक्षा के मानकों पर सवाल उठते हैं और चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी शक पैदा होता है। इसी वजह से यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा है और इसके फैसले का असर पूरे मेडिकल समुदाय पर पड़ सकता है।

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