US-इजरायल और ईरान युद्ध से बढ़ा महंगाई का खतरा, 3 गुना तक बढ़ गए एयर फ्रेट-शिपिंग चार्ज
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US-इजरायल और ईरान युद्ध से बढ़ा महंगाई का खतरा, 3 गुना तक बढ़ गए एयर फ्रेट-शिपिंग चार्ज

ईरान युद्ध से इंटरनेशनल ट्रेड प्रभावित हो गया है जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा मंडरा रहा है. इस युद्ध के चलते एयर फ्रेट महंगा हो चुका है तो होर्मुज ब्लॉकेज से ट्रेड संकट गहरा गया है.


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अमेरिका (United States) इजरायल (Israel) के ईरान (Iran) के हमले का बड़ा असर इंटरनेशनल ट्रे़ड (International Trade) और ग्लोबल सप्लाई चेन (Global Supply Chain) पर पड़ा है. इस युद्ध के चलते हवाई मार्ग ( Air Routes) के जरिए हो या समुद्री मार्ग (Sea Routes) दोनों ही के जरिए गुड्स इंपोर्ट या एक्सपोर्ट करना महंगा हो चुका है. स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait Of Hormuz) के ब्लॉकेज के चलते इंपोर्ट के लिए कंपनियां एयर कार्गो सर्विसेज (Air Cargo Services) का इस्तेमाल कर रहे हैं. लॉजिस्टिक्स इंडस्ट्री (Logistics Industry) से जुड़े सूत्रों के मुताबिक मौके का फायदा उठाते हुए एयरलाइंस ने एयर फ्रेट चार्ज (Air Freight Charge) को दो से तीगुना महंगा कर दिया है. एयरलाइंस ही नहीं बल्कि शिपिंग लाइंस ने भी अपने चार्ज को दो से तीन गुना तक बढ़ा दिया है. फ्रेट चार्ज में बढ़ोतरी का असर उन कंपनियों पर पड़ा है जो दूसरे देशों से कोई गुड्स इंपोर्ट कर रही हैं या फिर भारत से एक्सपोर्ट कर रही हैं.

डबल से ट्रिपल हुआ एयर-कार्गो और शिपिंग रेट

इससे स्पष्ट है कि सेंट्रल एशिया - मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का असर हवाई माल ढुलाई से लेकर समुद्री व्यापार तक, हर सेक्टर में लागत बढ़ा रही है और माल की आवाजाही भी धीमी पड़ गई है. लॉजिस्टिक कंपनी से जुड़े सूत्र ने द फेडरल देश से बताया कि अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध के चलते दुनिया भर में एयर कार्गो की कुल क्षमता करीब 20 फीसदी घट गई है, जबकि खाड़ी देशों की एयरलाइनों की क्षमता में 93 फीसदी तक गिरावट दर्ज की गई है. खाड़ी क्षेत्र के ऊपर बढ़े सुरक्षा खतरे और सीमित रिफ्यूलिंग विकल्पों के कारण कई फ्लाइट्स को लंबा रास्ता लेना पड़ रहा है, जिससे माल ढुलाई की क्षमता कम हो गई है. इसका सबसे ज्यादा असर उन रूट्स पर पड़ा है जो पहले खाड़ी के एयरलाइनों पर निर्भर थे, जिनमें भारतीय उपमहाद्वीप के व्यापार मार्ग भी शामिल हैं.

महंगे ATF के चलते भी बढ़ गई लागत

एयरलाइनों की लागत भी बढ़ गई है क्योंकि जेट फ्यूल की कीमतों में लगभग 20 फीसदी तक बढ़ोतरी हो चुकी है. इसका असर एयरफ्रेट और हवाई किराए दोनों पर पड़ा है. पहले से तय रेट्स पर अगर कोई कंपनी इंपोर्ट या एक्सपोर्ट करना चाहता है तो उसे कार्गों में स्पेस नहीं मिल रहा और उसे लंबा इंतजार करने के लिए कहा जा रहा है. समुद्री परिवहन में देरी और अनिश्चितता के कारण कई कंपनियां संवेदनशील गुड्स को समुद्र के बजाय हवाई रास्ते से भेज रही हैं, जिससे पहले से ही कम क्षमता वाले एयर कार्गो बाजार पर और दबाव बढ़ गया है.

मिडिल ईस्ट युद्ध से सप्लाई चेन संकट

समुद्री व्यापार में स्थिति और गंभीर है. मरीन इंश्योरेंस देने वाले P&I क्लबों ने खाड़ी क्षेत्र के लिए वॉर रिस्क कवर रद्द कर दिया है, जिसके बाद कई जहाजों ने यात्रा रोक दी है. एक रिपोर्ट के मुताबिक करीब 150 जहाज खाड़ी क्षेत्र में फंसे हुए हैं, जिनमें से 105 जहाज समुद्र में इंतजार कर रहे हैं और दर्जनों बंदरगाहों के अंदर खड़े हैं. शिपिंग कंपनियों ने तुरंत प्रभाव से वॉर रिस्क सरचार्ज लगा दिया है. 20 फुट कंटेनर पर लगभग 2000 डॉलर और 40 फुट कंटेनर पर करीब 3000 डॉलर एडिशनल चाोर्ज लिया जा रहा है. इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार की लागत तेजी से बढ़ रही है.

इंटरनेशनल सप्लाई चेन टूटी, महंगा हुआ आयात-निर्यात

दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्गों में से एक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज तकनीकी रूप से खुला होने के बावजूद लगभग बंद जैसा हो गया है, क्योंकि बीमा न मिलने और सुरक्षा खतरे के कारण जहाज इस रास्ते से गुजरने से बच रहे हैं. इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में लगभग 90 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई है. रेड सी (Red Sea) मार्ग पर भी कई ट्रांजिट रद्द कर दिए गए हैं और कुछ कंपनियां जहाजों को अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के रास्ते भेज रही हैं, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ रहे हैं. बहरीन में ऑपरेशन पूरी तरह बंद है, जबकि जेबेल अली पोर्ट धीमी गति से काम कर रहा है. इराक, कुवैत, सऊदी अरब, यूएई और कतर के बंदरगाहों पर भी असर पड़ा है.

साफ है अगर मिडिल ईस्ट में तनाव लंबा चला, तो आने वाले समय में तेल, गैस, हवाई किराया, और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है, क्योंकि वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है.

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