Pune Porshe Case जैसे हादसों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- बच्चों की गलती के लिए माता-पिता जिम्मेदार
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Pune Porshe Case जैसे हादसों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- बच्चों की गलती के लिए माता-पिता जिम्मेदार

सुप्रीम कोर्ट ने पुणे पोर्श हादसे की सुनवाई के दौरान नाबालिगों द्वारा नशे में गाड़ी चलाने से होने वाले सड़क हादसों पर सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने ऐसे मामलों में सिर्फ नाबालिग नहीं, उनके माता-पिता भी जिम्मेदार है।


सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग बच्चों द्वारा नशे की हालत में गाड़ी चलाने से होने वाले हादसों पर सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने साफ कहा है कि ऐसे मामलों में केवल बच्चे ही नहीं, बल्कि उनके माता-पिता को भी जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि नशे में तेज रफ्तार गाड़ी चलाना किसी भी तरह से “जश्न” नहीं हो सकता, बल्कि यह बेगुनाह लोगों की जान लेने वाला अपराध है। यह टिप्पणी जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने उस मामले की सुनवाई के दौरान की, जो मई 2024 में पुणे में हुए एक दर्दनाक सड़क हादसे से जुड़ा है। इस हादसे में एक नाबालिग द्वारा तेज रफ्तार लग्जरी पोर्शे कार चलाने से दो लोगों की मौत हो गई थी।

माता-पिता की जिम्मेदारी पर सवाल

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने गहरी चिंता जताते हुए कहा कि ऐसे माता-पिता कितने गैर-जिम्मेदार होते हैं, जो अपने नाबालिग बच्चों को तेज रफ्तार गाड़ियां चलाने देते हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों को शराब, ड्रग्स और महंगी गाड़ियों के साथ “मौज-मस्ती” की खुली छूट देना समाज के लिए बेहद खतरनाक है। जस्टिस नागरत्ना ने साफ शब्दों में कहा कि नशे में गाड़ी चलाकर सड़क पर सो रहे या चल रहे बेगुनाह लोगों को कुचल देना कोई जश्न नहीं है। इस हादसे में दो निर्दोष लोगों की जान चली गई, और यह पहली बार नहीं है जब इस तरह की घटनाएं सामने आई हों।

ह सिर्फ कानून नहीं, सामाजिक समस्या भी

अदालत ने इसे सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि एक बड़ी सामाजिक समस्या बताया। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि आज के समय में कई माता-पिता के पास अपने बच्चों के साथ समय बिताने का वक्त नहीं है। इसके बदले वे बच्चों को पैसे, एटीएम कार्ड और मोबाइल फोन थमा देते हैं। उन्होंने कहा कि माता-पिता बच्चों की परवरिश और निगरानी से पीछे हट जाते हैं और यही लापरवाही ऐसे हादसों की जड़ बनती है। अदालत ने कहा कि कानून को भी बदलती सामाजिक सच्चाइयों के साथ कदम मिलाकर चलना होगा।

ड्राइवर को फंसा दो, सैंपल बदल दो

सुनवाई के दौरान मृतकों की मां की ओर से पेश वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि ऐसे मामलों में अक्सर एक ही पैटर्न देखने को मिलता है। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने सहमति जताई। उन्होंने कहा कि आमतौर पर किसी गरीब ड्राइवर को फंसा दिया जाता है, कहा जाता है कि वही गाड़ी चला रहा था। फिर खून के सैंपल बदल दिए जाते हैं और यह साबित करने की कोशिश की जाती है कि आरोपी ने शराब नहीं पी थी। आखिर में मामूली सजा होती है और आरोपी बच निकलता है।

क्यों दी गई जमानत?

इस मामले में खून के नमूने बदलने और सबूतों से छेड़छाड़ के आरोप में तीन आरोपियों आशीष सतीश मित्तल, आदित्य अविनाश सूद और अमर संतोष गायकवाड़ को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दी। अदालत ने कहा कि आरोपी लंबे समय से जेल में बंद हैं, इसलिए उन्हें जमानत दी जा रही है। हालांकि अदालत ने यह भी साफ किया कि इस मामले में अभी बहुत कुछ कहना बाकी है, लेकिन विस्तृत टिप्पणी से फिलहाल बचा जा रहा है ताकि ट्रायल प्रभावित न हो।

क्या था पूरा मामला?

यह हादसा 19 मई 2024 को पुणे के कल्याणी नगर इलाके में हुआ था। तेज रफ्तार पोर्शे कार ने दो लोगों अनीश अवधिया और अश्विनी कोष्टा को कुचल दिया था, जिससे उनकी मौत हो गई। हादसे के बाद आरोप लगे कि कार में बैठे नाबालिगों के खून के सैंपल बदले गए और सबूतों के साथ छेड़छाड़ की गई।

300 शब्दों के निबंध पर मचा बवाल

यह मामला तब पूरे देश में चर्चा का विषय बना, जब किशोर न्याय बोर्ड ने नाबालिग आरोपी को बेहद हल्की शर्तों पर जमानत दे दी। इसमें 300 शब्दों का निबंध लिखने जैसी शर्त भी शामिल थी। इस फैसले के बाद देशभर में नाराजगी फैल गई। बाद में पुणे पुलिस के अनुरोध पर किशोर न्याय बोर्ड ने अपना आदेश बदला और नाबालिग को सुधार गृह भेजा। हालांकि जून में हाईकोर्ट ने नाबालिग को रिहा करने का आदेश दे दिया।

माता-पिता की भी हुई गिरफ्तारी

जांच के दौरान नाबालिग के माता-पिता विशाल अग्रवाल और शिवानी अग्रवाल, एक डॉक्टर, अस्पताल के कर्मचारी और बिचौलियों समेत करीब 10 लोगों को खून के नमूने बदलने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। यह मामला अब भी न्यायिक प्रक्रिया में है।

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