ऑस्कर अवॉर्ड में प्रियंका चोपड़ा का ‘दाल गैडोट’ पल, कहां गलत हैं हम?
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ऑस्कर 2026 में प्रियंका चोपड़ा का शानदार लुक और खामोश प्रस्तुति

ऑस्कर अवॉर्ड में प्रियंका चोपड़ा का ‘दाल गैडोट’ पल, कहां गलत हैं हम?

संभव है कि गलती सितारों में नहीं बल्कि हमारी उम्मीदों में है। हम वहां गहराई ढूंढ रहे हैं...जहां शायद सिर्फ चमक ही मौजूद है!


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काश हम उस पल के गवाह बन पाते जब प्रियंका चोपड़ा (पीसी) 98वें अकैडमी अवॉर्ड्स की तैयारी कर रही थीं। लॉस एंजिलिस के एक आलीशान होटल में, अपनी स्टाइल टीम के साथ, जिसमें हेयरस्टाइलिस्ट ब्रिजेट ब्रेगर और मेकअप आर्टिस्ट मॉर्गेन मार्टिनी शामिल थे। कल्पना की जा सकती है कि हेयर और मेकअप टीम के बीच एक विनम्र लेकिन अहम खींचतान हुई होगी... क्योंकि फैशन के नियम एक स्ट्रैपलेस डियोर गाउन के साथ स्लीक बन (जूड़ा) की मांग करते हैं। लेकिन अंततः पीसी के घने, खास भारतीय बालों ने बाज़ी मार ली। वे कंधों पर खुले लहराते नजर आए जबकि साथ में उन्होंने शानदार बुलगारी एक्लेटिका नीलम हार पहना हुआ था।

हर बारीकी पर ध्यान दिया गया था, क्योंकि यह उनका ऑस्कर में प्रस्तुति देने का दूसरा मौका था, और दांव ‘देसी गर्ल, ग्लोबल स्टेज’ जैसा ऊंचा था। शायद उनकी पीआर टीम ने उन्हें ब्रीफ किया होगा... ‘स्टनिंग लगो’, ‘गाउन को बोलने दो’, ‘मुस्कुराओ’, ‘सिर हिलाओ’, ‘अपनी उपस्थिति को सहज रखो’ वगैरह। सब कुछ ठीक था लेकिन एक चीज़ को नज़रअंदाज़ कर दिया गया... उनके सह-प्रस्तुतकर्ता। मंच पर आते हैं जेवियर बार्डेम, एक ऐसे अभिनेता, जिनके लिए ‘ब्रुह, उसने झिझक नहीं की’ जैसे मीम्स बने हैं।

जैसे ही दोनों मंच पर आए, पीसी की सजी-धजी छवि का सामना सीधे भू-राजनीतिक सच्चाई से हुआ। यह एक ऐसा टकराव था, जिसकी तैयारी शायद महंगे से महंगे संकट प्रबंधन विशेषज्ञ भी नहीं कर सकते थे।

बार्डेम का बयान

बार्डेम ने माहौल बदल दिया!जोरदार ‘नो टू वॉर... और फ्री फिलिस्तीन’ के नारे के साथ। काश! पीसी की टीम ने थोड़ा होमवर्क किया होता। ऑस्कर विजेता बार्डेम सिर्फ ‘नो अ ला गुएरा’ बैज नहीं पहन रहे थे बल्कि अपनी सोच, राजनीति और विश्वास को दिल पर धारण किए हुए थे। एक साधारण गूगल सर्च, जो उनकी टीम आसानी से कर सकती थी, यह बता सकता था कि 2025 के एमी अवॉर्ड्स में उन्होंने केफियेह स्कार्फ को रेड कार्पेट का प्रतीक बना दिया था।

जहां बार्डेम ने हॉलीवुड की सबसे चमकदार रात के मंच का उपयोग गाज़ा में युद्ध खत्म करने की अपील के लिए किया, वहीं पीसी डियोर में सजी, एक तरह की दूरी बनाए खड़ी रहीं। मानो उनके मन में लगातार गणना चल रही हो... ब्रांड एंडोर्समेंट्स से जुड़े करोड़ों दांव और उन्होंने मिस वर्ल्ड 2000 का मूल नियम अपनाया ‘जब संदेह हो, मुस्कुराओ और सिर हिलाओ।’

पीसी को भारत के हर न्यूज़ पोर्टल की हेडलाइन में जगह मिली। लेकिन उस तरह नहीं, जैसा उन्होंने सोचा होगा। ‘बेस्ट ड्रेस्ड’ या ‘इंडियंस फॉर द विन’ नहीं, बल्कि एक नया व्यंग्यात्मक नाम ‘दाल गैडोट’। यह नाम Gal Gadot के संदर्भ से बना, जो इज़राइल की समर्थक मानी जाती हैं, और पीसी की ‘न्यूट्रल’ छवि का मिश्रण था।

बीते दौर की सक्रियता

हैरानी की बात भी नहीं है। पीसी ने कोई अलग राह नहीं चुनी। वे उसी ‘ब्रांड सेफ्टी’ नियम का पालन कर रही हैं, जो आज बॉलीवुड में आम हो चुका है। लेकिन एक समय था जब भारतीय सितारे सिर्फ ग्लैमर नहीं, अपने विचारों के लिए भी जाने जाते थे।

देव आनंद सिर्फ रोमांस के लिए नहीं बल्कि अपने विचारों के लिए भी खड़े रहते थे। उन्होंने 1970 के दशक की आपातकाल के खिलाफ आवाज उठाई, जिसका परिणाम यह हुआ कि उनकी फिल्मों को दूरदर्शन पर प्रतिबंधित कर दिया गया। जोखिम बड़ा था। लेकिन उन्होंने समझौता नहीं किया।

गीतकार साहिर लुधियानवी ने भी सत्ता के खिलाफ कई बार आवाज उठाई। ‘जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहां हैं’ जैसी पंक्तियां सीधे सत्ता पर प्रहार थीं। शबाना आज़मी ने झुग्गी बस्तियों के समर्थन में अपने आराम का त्याग किया। यहां तक कि अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान जैसे सितारों ने भी सामाजिक मुद्दों पर खुलकर विचार रखे।

आज के दौर में तुलना करें तो अंतर साफ दिखता है। रॉबर्ट डी नीरो (Robert De Niro) ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ‘जोकर’ कहा। शॉन पेन(Sean Penn) ऑस्कर छोड़कर यूक्रेन पहुंचे। मेरिल स्ट्रीप (Meryl Streep) ने गोल्डन ग्लोब्स में ट्रंप की नीतियों की खुलकर आलोचना की।


आखिर गलती किसकी?

आज हम अपने सितारों से सामाजिक जिम्मेदारी की उम्मीद करते हैं। जबकि वे अपने ब्रांड और छवि को प्राथमिकता देते हैं। शायद असली सवाल सितारों से ज्यादा हमसे जुड़ा है। क्या हम ऐसे लोगों को अपना आदर्श मानते हैं, जो बोलने से ज्यादा चुप रहना चुनते हैं?

क्योंकि जब मंच पर आपके साथ बार्डेम, पेन या डी नीरो जैसे लोग खड़े हों, जो अपनी आवाज को ही अपना सबसे बड़ा ‘आभूषण’ बनाते हैं, तब सबसे तेज जो सुनाई देता है, वह है एकदम सजी-धजी खामोशी की गूंज!

शायद रिकी जरवेस (Ricky Gervais) ने साल 2020 के गोल्डन ग्लोब्स में यह बात पहले ही कह दी थी कि अगर अवॉर्ड मिले तो बस आकर धन्यवाद कहो और चले जाओ... क्योंकि असली दुनिया की समझ हर किसी के पास नहीं होती।

संभव है कि गलती सितारों में नहीं बल्कि हमारी उम्मीदों में है। हम वहां गहराई ढूंढ रहे हैं...जहां शायद सिर्फ चमक ही मौजूद है!

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