फॉर्म 7 पर अखिलेश यादव का डर कितना सही, देखें VIDEO
सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का कहना है कि फॉर्म सात के जरिए उनके वोटों का काटा जा रहा है। यही नहीं यह सब बीजेपी के इशारे पर हो रहा है।

साल 2027 यूपी के सियासी दलों के लिए बेहद खास है। पांच साल बाद एक बार फिर सियासी दल जनता की अदालत में होंगे। लड़ाई 202 के मैजिक नंबर की है। जिस दल की झोली में इतने विधायक आए उसका मतलब यह हुआ कि सूबे में उसकी सरकार होगी। हालांकि उससे पहले ही सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों बयानों के जरिए बता रहे हैं कि कौन यूपी के भविष्य के लिए बेहतर है। इन सबके बीच बड़ा मुद्दा चुनाव आयोग का है।
समाजवादी पार्टी, कांग्रेस तो सीधे सीधे आयोग को बीजेपी का एजेंट बता रहा है हालांकि बीएसपी नपे तुले अंदाजा में निशाना साधती है। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव एसआईआर के मुद्दे पर मुखर होकर चुनाव आयोग पर निशाना साधते हैं हालांकि उनके एजेंडे में इस समय फार्म सात है। वो कहते हैं कि फार्म सात बीजेपी के लिए हथियार बन चुका है। उसके जरिए समाजवादी पार्टी के वोटर्स के नाम काटे जा रहे हैं। हालांकि सीएम योगी आदित्यनाथ का कहना है कि जनता की अदालत में दो बार परास्त होने के बाद अखिलेश यादव ने अनर्गल आरोपों का बैंक बना रखा है। ऐसे में सवाल यह है कि फॉर्म सात पर अखिलेश यादव की चिंता कितनी जायज है।
अखिलेश यादव कहते हैं कि कागजी फार्मेट नहीं होना चाहिए। कोई एक ऐसा फॉर्म आए जिसपर नंबरिंग हो और होलोग्राम लगा हो और अबतक के जमा सारे फॉर्म-7 रद्द होने चाहिए. फार्म जमा करने के समय की सीसीटीवी निकाली जाए. ये धांधली पूरे उत्तर प्रदेश में चल रही है। PDA और मुस्लिम मतदाता का वोट काटा जा रहा है. 400 का बूथ है, लेकिन 300 वोट काट दिए गए हैं। लखनऊ के सरोजनीनगर विधानसभा में सबसे ज्यादा फार्म 7 जमा किए गए हैं. अलग-अलग मामले बताकर यह फार्म जमा किए गए हैं। एक आवेदन के नाम से 100 फार्म भरे गए हैं। अलग-अलग कंडीशन को बताकर यह फार्म जमा किए गए हैं।
चुनाव आयोग भाजपा के साथ मिलकर फार्म 7 से PDA वोट काटने का प्लान बना लिया है। कुछ लोगों का कहना है की मुख्यमंत्री कार्यालय में IAS , मंडलायुक्त और DM पर PDA वोटर्स के वोट कटवानो का दबाव बना रहे हैं. BLO के वोट भी काट दिए गए हैं. जो भी आरोपी पकड़ा जाए, उसके उपर FIR दर्ज करके उसके ऊपर राज्य के खिलाफ साजिश करने और 420 सी का मुकदमा चले।
अखिलेश यादव की फार्म सात पर चिंता और सियासी भविष्य को लेकर यूपी की राजनीति को समझने वालों का नजरिया अलग अलग है। कुछ जानकार कहते हैं कि दरअसल यह परिपाटी बन चुकी है कि जो कोई दल विपक्ष में होता है उसे सभी व्यवस्थाएं कंप्रोमाइज्ड नजर आती है। सरल शब्दों में कहें तो सत्ता पक्ष के इशारे पर संस्थाएं काम करती हैं। अब आप फॉर्म सात को लीजिए। फार्म सात की व्यवस्था वोटर लिस्ट से जुड़ी है। अगर कोई शख्स गलत तरीके से किसी विधानसभा में वोटर बनने में कामयाब होता है तो उसे फार्म सात के जरिए ही हटाया जाता है। सपा का आरोप है कि फार्म सात के मुद्दे पर जो काम बीएलओ को करना है उसे बीजेपी के कार्यकर्ता क्यों कर रहे हैं।
अखिलेश यादव इस मुद्दे पर दो तरह की बात करते हैं पहला तो ये कि फार्म सात का उपयोग बीएलओ को करना चाहिए। दूसरी तरफ पर वो निर्वाचन आयोग की मंशा पर सवाल भी उठाते हैं। ऐसे में वो खुद विरोधाभासी बात करते हैं। लेकिन अखिलेश यादव के पक्ष में बात करने वालों की भी कमी नहीं है। अखिलेश यादव के आरोपों और चिंता पर कुछ जानकार कहते हैं कि इसमें दो मत नहीं कि चुनाव आयोग सत्ता पक्ष के इशारे पर काम कर रहा है। लोकतंत्र की तो यही खूबसूरती है कि अगर किसी राजनीतिक दल को रंच मात्र व्यवस्था पर शक है तो आयोग उसे दूर करे। पारदर्शी व्यवस्था को लागू करे। लेकिन आपने देखा होगा कि आयोग ने किसी कोई भी सुधार या पारदर्शी प्रक्रिया तो तब अपनाया जब सुप्रीम कोर्ट का दबाव पड़ा।
अब 2027 समाजवादी पार्टी, बीजेपी,बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस के लिए क्यों अहम है। इसके पीछे अलग अलग वजह है। बीजेपी के पास हैट्रिक बनाने का मौका है तो समाजवादी पार्टी के लिए सरकार बनाने का अवसर क्योंकि कोई भी सरकार सत्ता में दो टर्म पूरी कर रही होती तो उसके खिलाफ सत्ता विरोधी लहर होती है। समाजवादी पार्टी को लगता है कि 2024 के आम चुनाव में जिस तरह से उसे कामयाबी मिली उसे वो आगे बढ़ाते हुए 2027 में वो अपनी साइकिल लखनऊ तक सरपट दौड़ा सकते हैं। लेकिन यदि ऐसा नहीं होता है कि तो मुश्किल बढ़ जाएगी। लगातार सत्ता से बाहर होने का अर्थ यह हुआ कि कार्यकर्ताओं के जोश को बनाए रखना आसान नहीं होता। वहीं कांग्रेस और बीएसपी के सामने हिमालय के पहाड़ों की तरह चुनौती है। कांग्रेस पूरे दमखम के साथ चुनावी लड़ाई में उतरने का प्रयास तो करती है लेकिन वो ऊर्जा जमीन पर नजर नहीं आती। वहीं बीएसपी के सामने भी अस्तित्व बचाने की लड़ाई है।
सियासी जानकार कहते हैं कि जिस तरह से पीडीए का राग अलाप कर अखिलेश यादव ने 2024 में बीजेपी की टैली आधे पर ला दिया। पीडीए के उसी नारे में उनके लिए उम्मीद है। अब यदि पीडीए में सेंध लगे चाहे वो सत्ता पक्ष की तरफ से हो या खुद की कमजोरियों से चुनावी लड़ाई जीतना आसान नहीं होगा। दरअसल एसआईआर, चुनाव आयोग, फार्म सात का जिक्र कर वो बीजेपी को घेरने की कोशिश के साथ ही वो अपने मतदाता वर्ग को यह संदेश देना चाहते हैं कि बीजेपी की मंशा को वो कामयाब नहीं होने देंगे।
हालांकि सियासी लड़ाई में जितना महत्वपूर्ण हथियार सरकार को कटघरे में खड़ा करना होता है उससे कहीं अधिक संगठन की मजबूती होता है। हाल ही में जिस तरह से मुस्लिम समाज के एक बड़े चेहरे नसीमुद्दीन सिद्दीकी को अखिलेश यादव अपने पाले में लाने में कामयाब हुए उन्होंने संदेश देने की कोशिश की है कि यूपी के मुस्लिम समाज से वो कितनी मुहब्बत करते हैं। सियासी जानकार यह भी कहते हैं कि फार्म सात का मुद्दा कम से कम इस साल के अप्रैल महीने तक तो वो गरमाते ही रहेंगे ताकि उनका अपना वोटबैंक यह महसूस करे कि उनके नेता ने साथ नहीं छोड़ा है।

