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Binge Watching का मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव

वीकेंड पर हावी बिंज वॉचिंग, बढ़ रहीं मानसिक और भावनात्मक समस्याएं

अकेलेपन या भावनात्मक समस्याओं से जूझ रहे हैं तो बिंज वॉचिंग के जाल में ना फंसे। क्योंकि जो लोग मनोरंजन की भूख में बिंज वॉचिंग की तरफ गए हैं, वे खुद...


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Mental Health: सप्ताह की शुरुआत होते ही कभी लोग वीकेंड प्लानिंग में जुट जाते थे। दोस्तों को कॉल, मूवी का शो, लॉन्ग ड्राइव या छोटी-सी ट्रिप… लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है। बाहर जाने की जगह घर पर रहकर ओटीटी प्लेटफॉर्म पर पूरी सीरीज खत्म कर देना, यह नया वीकेंड कल्चर बन चुका है।

उपभोक्ता इंटेलिजेंस कंपनी नीलसनआईक्यू की एक रिसर्च के अनुसार भारत के बड़े शहरों में 66 प्रतिशत लोग वीकेंड पर बिंज वॉचिंग करना पसंद करते हैं। यह सर्वे 12 प्रमुख शहरों दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद जैसे महानगरों के 25 से 45 वर्ष आयु वर्ग के लोगों पर किया गया।

रिपोर्ट बताती है कि वीकेंड पर ये लोग औसतन 5 घंटे या उससे अधिक समय लगातार ओटीटी कंटेंट देखते हैं, जबकि वर्किंग डेज़ में यह स्क्रीन टाइम 3 घंटे से कम रहता है।

यानी वीकेंड अब “रिलैक्सेशन” से ज्यादा “स्क्रीन इमर्शन” में बदलता जा रहा है।

क्यों आकर्षित करती है बिंज वॉचिंग?

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार इसका एक न्यूरो-साइकोलॉजिकल कारण भी है। जब हम लगातार छोटे-छोटे एपिसोड, शॉर्ट वीडियो या सीरीज देखते हैं तो हमारे दिमाग को बहुत कम समय में डोपामिन रिवॉर्ड मिलता है। यह वैसा ही है जैसे कुछ सेकंड में मीठा खाने से मिलने वाला एनर्जी रश।

धीरे-धीरे दिमाग को “फास्ट एंटरटेनमेंट” की आदत हो जाती है। परिणाम यह होता है कि असली जीवन, दोस्तों से मिलना, परिवार के साथ बैठना, बच्चों का पार्क में खेलना, धीमा और बोरिंग लगने लगता है।

मेंटल हेल्थ पर क्या असर?

अमेरिकी मनोवैज्ञानिक मेनीजे बोडुरयान-टर्नर का कहना है कि अत्यधिक बिंज वॉचिंग शारीरिक और भावनात्मक रूप से जरूरी गतिविधियों से दूरी बढ़ा सकती है। इससे एंग्जाइटी, डिप्रेशन और नींद से जुड़ी समस्याएं बढ़ने का खतरा रहता है।

क्लिनिकल अनुभव भी यही संकेत देते हैं कि युवाओं और टीनएजर्स में स्क्रीन ओवरयूज़ एक बड़ा कारण बनकर उभर रहा है।

रात-रात भर सीरीज देखना

बिना फोन के बेचैनी महसूस होना

ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत

मूड स्विंग्स

नींद की समस्या

अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन भी यह सुझाव देता है कि सवाल “कितनी देर देखा” से ज्यादा अहम है “क्यों देखा?”

अगर कोई व्यक्ति तनाव से बचने का एकमात्र तरीका स्क्रीन को मानने लगे और जिम्मेदारियों से दूरी बनाने लगे, तो यह जोखिम का संकेत हो सकता है।



क्या अकेलापन बढ़ रहा है?

दिलचस्प बात यह है कि कई लोग तनाव या अकेलेपन से बचने के लिए बिंज वॉचिंग की ओर बढ़ते हैं, लेकिन यही आदत बाद में अकेलेपन को और गहरा कर सकती है।

चीन की हुआंगशान यूनिवर्सिटी की एक स्टडी में पाया गया कि जिन लोगों में बिंज वॉचिंग की आदत अधिक थी, उनमें अकेलेपन की भावना भी अधिक गहरी पाई गई।

अकेलेपन के कुछ सामान्य संकेत हो सकते हैं:

परिवार के बीच रहकर भी अलग-थलग महसूस करना

सोशल मीडिया पर सक्रिय, लेकिन रियल लाइफ में कम बातचीत

ओवरथिंकिंग

नींद में गड़बड़ी

लंबे समय तक इन संकेतों को नजरअंदाज करने से एंग्जाइटी और डिप्रेशन का खतरा बढ़ सकता है।


क्या ज्यादा स्क्रीन टाइम सीधे डिप्रेशन देता है?

अधिकांश शोध यह बताते हैं कि स्क्रीन टाइम और मानसिक स्थिति के बीच एक संबंध जरूर है।

जिन लोगों का स्क्रीन टाइम प्रतिदिन 3–4 घंटे से अधिक होता है, उनमें तनाव और चिंता के लक्षण ज्यादा देखे गए हैं।

वहीं 6 घंटे से अधिक स्क्रीन टाइम वाले समूह में डिप्रेशन और एंग्जाइटी के लक्षण अधिक सामान्य पाए गए।

लेकिन विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि यह हमेशा कारण-परिणाम (cause-effect) का रिश्ता नहीं होता।

कई बार पहले से मौजूद तनाव या अकेलापन ही स्क्रीन टाइम बढ़ा देता है।



बिंज वॉचिंग को कैसे कंट्रोल करें?

विशेषज्ञों के अनुसार कुछ छोटे कदम मददगार हो सकते हैं:

टीवी या ओटीटी ऑन करने से पहले खुद से पूछें, मैं अभी कैसा महसूस कर रहा/रही हूं?

ऑटोप्ले फीचर बंद करें

स्क्रीन टाइम के निश्चित घंटे तय करें

अकेले देखने के बजाय वॉच पार्टी या परिवार के साथ देखें

बच्चों के ऑफलाइन रूटीन को उतना ही रोचक बनाएं जितना उनका ऑनलाइन रूटीन

स्पोर्ट्स, आर्ट, म्यूजिक, डांस, ड्रॉइंग जैसी गतिविधियां डिजिटल समय का स्वस्थ विकल्प बन सकती हैं।

संतुलन ही समाधान

टेक्नोलॉजी समस्या नहीं है। समस्या तब बनती है जब उसका उपयोग संतुलन से बाहर चला जाए।

सोशल मीडिया, ओटीटी या यूट्यूब अपने-आप में नुकसानदेह नहीं हैं। लेकिन अगर वे वास्तविक रिश्तों, नींद और भावनात्मक स्वास्थ्य की जगह लेने लगें, तो यह चेतावनी है।

वीकेंड रिलैक्सेशन के लिए होता है, लेकिन अगर आराम की जगह थकान, खालीपन और मानसिक बोझ महसूस होने लगे तो शायद स्क्रीन से थोड़ा दूर होकर खुद से जुड़ने का समय आ गया है।


डिसक्लेमर- यह आर्टिकल जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी सलाह को अपनाने से पहले एक्सपर्ट से सलाह करें।


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