ये है लत लगने की थिअरी, बच्चो का दिमाग ऐसे कंट्रोल करता है सोशल मीडिया
बच्चों में सोचने-समझने की क्षमता पूरी तरह विकसित ना होने की प्रक्रिया का लाभ उठा रहे हैं ऑनलाइन गेम्स और सोशल मीडिया। डॉक्टर ने बताई प्रक्रिया...
ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, स्पेन और जर्मनी जैसे देशों ने छोटे बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर सख्ती शुरू कर दी है। भारत में भी स्थिति चिंताजनक है। हाल ही में गाजियाबाद में तीन सगी बहनों द्वारा ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े दबाव के बीच आत्महत्या की घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया। सवाल उठता है कि आखिर सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम्स बच्चों की मानसिक सेहत पर ऐसा क्या असर डाल रहे हैं? इस विषय पर मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के सीनियर साइकेट्रिस्ट डॉ. राजेश कुमार ने विस्तार से समझाया...।
यूज, मिसयूज, ओवरयूज और एडिक्शन का फर्क
डॉ. कुमार के अनुसार इंटरनेट आज जीवन का हिस्सा है। समस्या इंटरनेट नहीं, बल्कि उसका दुरुपयोग है।
यूज यानी सीमित और उद्देश्यपूर्ण उपयोग।
मिसयूज यानी जरूरत से अधिक इस्तेमाल।
ओवरयूज यानी समय और नियंत्रण दोनों का टूटना।
एडिक्शन यानी लत, जहां व्यक्ति चाहकर भी खुद को रोक नहीं पाता।
यह बदलाव धीरे-धीरे होता है और अक्सर परिवार को देर से पता चलता है।
ऑनलाइन गेम्स और सोशल मीडिया में फर्क क्यों खतरनाक है?
डॉ. कुमार बताते हैं कि आउटडोर खेलों में जीत-हार या खुशी का अनुभव समय लेकर आता है। लेकिन ऑनलाइन गेम्स और सोशल मीडिया तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं। लाइक, फॉलोअर्स, लेवल अप, रिवॉर्ड – सब कुछ सेकंडों में मिल जाता है।
यहीं से शुरू होता है दिमाग का रिवार्ड सिस्टम।
डोपामिन और रिवार्ड सिस्टम का खेल
डोपामिन एक न्यूरोट्रांसमीटर है जो हमें खुशी और उत्साह का अनुभव कराता है। जब बच्चे गेम जीतते हैं या सोशल मीडिया पर लाइक्स मिलते हैं, तो डोपामिन का स्तर बढ़ता है। यह “किक” उन्हें बार-बार वही अनुभव लेने के लिए प्रेरित करती है। समस्या तब बढ़ती है जब यह रिवार्ड बहुत तेजी से और बार-बार मिलने लगे। दिमाग उस त्वरित सुख का आदी हो जाता है।
बच्चों का दिमाग क्यों ज्यादा संवेदनशील है?
बचपन और किशोरावस्था में दिमाग का रिवार्ड सिस्टम जल्दी विकसित हो जाता है। लेकिन निर्णय लेने और सही-गलत समझने वाला हिस्सा, जिसे प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स कहते हैं, लगभग 18 से 20 साल की उम्र तक पूरी तरह विकसित नहीं होता। यानी चाहत पहले विकसित हो जाती है, लेकिन नियंत्रण बाद में। इसी गैप का फायदा डिजिटल एल्गोरिदम उठाते हैं।
एल्गोरिदम कैसे बनाते हैं निर्भर?
सोशल मीडिया और गेमिंग प्लेटफॉर्म तीन मानवीय प्रवृत्तियों पर काम करते हैं:
सोशलाइजेशन – लोगों से जुड़ने की चाह
नोवेल्टी सीकिंग – नई चीजें देखने और जानने की ललक
स्टेटस की भावना – लाइक्स, फॉलोअर्स, रैंकिंग
रील्स और शॉर्ट वीडियो 30 सेकंड के इसलिए होते हैं क्योंकि ध्यान अवधि कम होती जा रही है। हर कुछ सेकंड में नया कंटेंट दिखाकर दिमाग को लगातार उत्तेजित किया जाता है।
एडिक्शन के संकेत क्या हैं?
डॉ. कुमार के अनुसार कुछ स्पष्ट संकेत हैं...
मोबाइल को लेकर अत्यधिक व्यस्तता
पढ़ाई या काम में गिरावट
परिवार और दोस्तों से दूरी
समय का लगातार बढ़ना
रोकने पर चिड़चिड़ापन
नींद की समस्या
गुस्सा या आक्रामक व्यवहार
अगर बच्चा 30 मिनट से 2-3 घंटे और फिर 5-6 घंटे तक पहुंच जाए, तो यह चेतावनी का संकेत है।
विड्रॉल और टॉलरेंस
एडिक्शन में दो महत्वपूर्ण बातें होती हैं...
टॉलरेंस – पहले जितनी खुशी आधे घंटे में मिलती थी, अब उतनी खुशी पाने के लिए अधिक समय चाहिए।
विड्रॉल – मोबाइल हटाने पर बेचैनी, गुस्सा, चिंता या आक्रामकता।
कुछ बच्चे वाई-फाई बंद होने पर भी अत्यधिक बेचैन हो जाते हैं।
कौन बच्चे ज्यादा जोखिम में हैं?
कुछ बच्चे ज्यादा संवेदनशील होते हैं...
एंग्जायटी या डिप्रेशन से जूझ रहे बच्चे
एडीएचडी वाले बच्चे
पारिवारिक तनाव
ब्रोकन फैमिली
नींद की समस्या
अचानक जीवन में बड़ा तनाव
अनुमान है कि भारत में करोड़ों लोग इंटरनेट एडिक्शन से प्रभावित हैं, हालांकि सटीक आंकड़े अभी सीमित हैं।
शारीरिक और मानसिक प्रभाव
अत्यधिक स्क्रीन टाइम से...
गर्दन और सर्वाइकल दर्द
कार्पल टनल सिंड्रोम
मोटापा
सिरदर्द
नींद की कमी
व्यवहार में बदलाव
साथ ही सामाजिक अलगाव और आत्मविश्वास में गिरावट भी देखी जाती है।
डर लगने के बावजूद बच्चा क्यों नहीं रुकता?
यह प्रक्रिया धीरे-धीरे आगे बढ़ती है। गेम्स में टास्क धीरे-धीरे कठिन और नियंत्रित करने वाले होते जाते हैं। जब बच्चा पहले ही एडिक्शन की अवस्था में पहुंच चुका होता है, तो उसका निर्णय नियंत्रण कमजोर हो जाता है। कुछ मामलों में चरम घटनाएं भी सामने आई हैं, जहां किशोर गंभीर हिंसक या आत्मघाती व्यवहार तक पहुंच गए।
माता-पिता क्या करें?
डॉ. कुमार के अनुसार पहला कदम है – स्वीकार करना। अक्सर परिवार समस्या को लंबे समय तक नजरअंदाज करता है। मारना-डांटना समाधान नहीं है।
क्या करें...
स्क्रीन टाइम तय करें
घर में नो मोबाइल जोन बनाएं
खुद उदाहरण बनें
आउटडोर खेल बढ़ाएं
योग और मेडिटेशन अपनाएं
जरूरत पड़े तो मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से मिलें
ऑनलाइन उपलब्ध स्केल्स के जरिए भी लक्षणों की शुरुआती पहचान की जा सकती है।
सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम्स पूरी तरह बुरे नहीं हैं, लेकिन अनियंत्रित उपयोग खतरनाक हो सकता है। समस्या अचानक नहीं बनती, बल्कि धीरे-धीरे विकसित होती है। बच्चों का दिमाग विकास की अवस्था में होता है, इसलिए उन्हें डिजिटल दुनिया में मार्गदर्शन की जरूरत है। डिजिटल संतुलन ही असली समाधान है।
डिसक्लेमर- यह आर्टिकल जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी सलाह को अपनाने से पहले डॉक्टर से परामर्श करें।

