लालू यादव को हमेशा कोसने वाले नीतीश कुमार भी पीछे नहीं रहे, परिवारवाद का लगा टैग
नीतीश कुमार, राजनीति में परिवारवाद के खिलाफ रहे हैं। लेकिन अब उनके बेटे की सियासत में एंट्री हो चुकी है। बिहार में 9 ऐसे सीएम हैं जिनके बेटे और बेटी सियासी पारी खेल रहे हैं।

बिहार की राजनीति में परिवार और सत्ता का रिश्ता कोई नया नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि लंबे समय तक परिवारवाद का विरोध करने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी अब इस बहस के केंद्र में आ गए हैं। वजह है उनके बेटे निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री।
सुशासन बाबू के नाम से मशहूर नीतीश कुमार हमेशा से परिवारवाद के खिलाफ मुखर रहे हैं और इस मुद्दे पर वे अक्सर लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार को निशाने पर लेते रहे हैं। लेकिन अब जब उनके बेटे निशांत कुमार ने भी सियासत की राह पकड़ ली है, तो राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठने लगा है कि क्या बिहार की राजनीति में परिवारवाद से कोई भी नेता पूरी तरह अछूता रह पाया है?
दरअसल बिहार का राजनीतिक इतिहास देखें तो कई ऐसे मुख्यमंत्री रहे हैं, जिनकी राजनीतिक विरासत आगे उनके बेटों ने संभाली। आंकड़ों के मुताबिक राज्य में कम से कम आठ ऐसे मुख्यमंत्री हुए हैं, जिनके बेटे आज भी राजनीति में सक्रिय हैं। हालांकि बड़ा सवाल यही है कि क्या ये नेता अपने पिता जैसी मजबूत पहचान बना पाए हैं या अब भी परिवार के नाम का सहारा ले रहे हैं।
निशांत कुमार: राजनीति में नई शुरुआत
नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार अब तक सार्वजनिक जीवन से काफी दूर रहे हैं। उन्होंने अपने पिता की तरह इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है और लंबे समय तक राजनीति से दूरी बनाए रखी।
निशांत कुमार की निजी जिंदगी भी काफी सादगी भरी मानी जाती है। उन्होंने अब तक शादी नहीं की है और उनका झुकाव अध्यात्म की ओर बताया जाता है। अब जब उनकी राजनीति में एंट्री हो चुकी है, तो माना जा रहा है कि भविष्य में उन्हें नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत संभालने की जिम्मेदारी मिल सकती है।
लालू परिवार: बिहार की सबसे चर्चित राजनीतिक विरासत
अगर बिहार में परिवारवादी राजनीति की बात हो और लालू प्रसाद यादव का नाम न आए, ऐसा हो नहीं सकता। लालू और उनकी पत्नी राबड़ी देवी दोनों मुख्यमंत्री रह चुके हैं। आज उनकी राजनीतिक विरासत उनके तीन बच्चों के हाथ में है—
तेजस्वी यादव
तेज प्रताप यादव
मीसा भारती
इनमें से तेजस्वी यादव फिलहाल राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की कमान संभाल रहे हैं और बिहार की राजनीति में प्रमुख विपक्षी चेहरा हैं। तेजस्वी उपमुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। वहीं तेज प्रताप यादव ने पार्टी और परिवार से मतभेद के बाद अपनी अलग राजनीतिक राह भी बनाने की कोशिश की।
हालांकि 2025 के विधानसभा चुनाव में उन्हें अपने पारंपरिक महुआ सीट से हार का सामना करना पड़ा। वहीं तेजस्वी यादव के नेतृत्व में महागठबंधन भी चुनाव में बड़ी जीत हासिल नहीं कर सका। इससे यह सवाल बना हुआ है कि क्या वे अपने पिता लालू यादव जैसी राजनीतिक पकड़ बना पाएंगे।
जीतन राम मांझी और उनके बेटे
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी भी उन नेताओं में शामिल हैं जिनकी राजनीतिक विरासत उनके बेटे आगे बढ़ा रहे हैं। उनके बेटे संतोष कुमार सुमन सक्रिय राजनीति में हैं और इस समय बिहार सरकार में मंत्री भी हैं।
जीतन राम मांझी ने बाद में हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) नाम की पार्टी बनाई और फिलहाल एनडीए के साथ जुड़े हुए हैं। संतोष सुमन अपने पिता की पार्टी में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
दरोगा राय की राजनीतिक विरासत
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दरोगा राय 1967 में बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। उनके पांच बेटे हैं, जिनमें डॉ. चंद्रिका राय ने राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई।
चंद्रिका राय 1985 में पहली बार विधायक बने। उन्होंने कांग्रेस, जनता दल और आरजेडी जैसी कई पार्टियों से चुनाव लड़ा और विधायक बने, लेकिन अपने पिता जैसा बड़ा राजनीतिक मुकाम हासिल नहीं कर पाए।
रामसुंदर दास के बेटे
बिहार के बड़े दलित नेता रामसुंदर दास 1979 में राज्य के मुख्यमंत्री बने थे। उनके बेटे संजय कुमार दास भी विधायक रहे, लेकिन वे राजनीति में कोई खास पहचान नहीं बना सके।
कर्पूरी ठाकुर की विरासत
बिहार के जननायक कहे जाने वाले कर्पूरी ठाकुर की राजनीतिक विरासत उनके बेटे रामनाथ ठाकुर आगे बढ़ा रहे हैं।रामनाथ ठाकुर जदयू के वरिष्ठ नेता हैं और राज्यसभा सांसद भी हैं। वे केंद्र सरकार में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय में राज्य मंत्री के रूप में भी काम कर चुके हैं। बिहार सरकार में भी वे मंत्री रह चुके हैं।
सत्येंद्र नारायण सिन्हा के बेटे
पूर्व मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा 1989 में बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। उनके बेटे निखिल कुमार भी राजनीति में सक्रिय रहे और उन्होंने राज्यपाल सहित कई महत्वपूर्ण संवैधानिक पद संभाले।
जगन्नाथ मिश्रा और भागवत झा आजाद की विरासत
पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा की राजनीतिक विरासत उनके बेटे नीतीश मिश्रा आगे बढ़ा रहे हैं। नीतीश मिश्रा बिहार सरकार में मंत्री रह चुके हैं और वर्तमान में भाजपा के विधायक हैं।इसी तरह पूर्व मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद के बेटे कीर्ति आजाद ने भी राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। क्रिकेटर के रूप में प्रसिद्धि पाने के बाद वे लंबे समय तक सांसद रहे और विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े।
परिवारवाद की बहस फिर तेज
बिहार की राजनीति में इन उदाहरणों से साफ है कि परिवारवाद का प्रभाव लंबे समय से बना हुआ है। अब जब नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार भी राजनीति में कदम रख चुके हैं, तो यह बहस फिर से तेज हो गई है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ये नए नेता अपने पिता की तरह मजबूत राजनीतिक पहचान बना पाएंगे, या फिर उनकी राजनीति परिवार के नाम तक ही सीमित रह जाएगी। आने वाले वर्षों में बिहार की राजनीति इस सवाल का जवाब जरूर देगी।

