कांशीराम और भारत रत्न,राहुल गांधी ने सबको मात दी या नया दांव चला?

17 March 2026 9:26 AM IST

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने कहा कि वो और उनकी पार्टी कांशीराम को भारत रत्न देने की वकालत करती है। क्या इस मांग के जरिए उन्होंने अपने विपक्षियों पर निशाना साधने की कोशिश की है।

कांशीराम की जयंती से पहले राहुल गांधी ने अपने एक बयान से छक्का मार दिया। उन्होंने ना सिर्फ सपा को हैरान कर दिया बल्कि बीएसपी और बीजेपी के दलित प्रेम पर भी सवाल उठा दिया। कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग के बाद मानो यूपी की सियासत में उबाल आ गया। पहला यह कि क्या अब कांग्रेस ने मन बना लिया है कि दलित वोटों के मुद्दे पर अब खुलकर बैटिंग करनी है। क्या वो समाजवादी पार्टी से यूपी चुनाव में मोलभाव की जुगत में जुट गए हैं। क्या राहुल गांधी, बीजेपी को दलित मुद्दे पर बैकफुट लाने की कोशिश कर रहे हैं जो लाभार्थी के नाम पर खुद को दलितों का शुभचिंतक बताती है या राहुल गांधी सिर्फ सांकेतिक राजनीति कर रहे हैं।क्या यह सिर्फ सम्मान की मांग है। या फिर यह एक ऐसा राजनीतिक दांव है जिसमें अखिलेश यादव, मायावती और नरेंद्र मोदी तीनों को एक साथ घेरने की कोशिश की गई है। क्या राहुल गांधी ने एक ही चाल में बसपा सपा और बीजेपी तीनों की राजनीति को बेपटरी कर दिया है

सबसे पहले बात उस शख्स की जिसके नाम पर यह पूरा विवाद खड़ा है यानी कि कांशीराम। कांशीराम सिर्फ एक नेता नहीं थे वे भारत में बहुजन राजनीति के सबसे बड़े वास्तुकार माने जाते हैं। उन्होंने एक नारा दिया था जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी। यह सिर्फ नारा नहीं था बल्कि एक पूरी राजनीतिक रणनीति थी। उन्होंने पहले बामसेफ बनाया फिर डीएस-4 और आखिरकार 1984 में बहुजन समाज पार्टी का गठन किया। बसपा सिर्फ एक पार्टी नहीं थी बल्कि यह दलित राजनीति को सत्ता तक पहुंचाने का आंदोलन था और इसी आंदोलन से उभरीं मायावती जो कई बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। ऐसे में सवाल बहुत वाजिब है कि अगर कांशीराम इतने बड़े नेता थे तो उन्हें अब तक भारत रत्न क्यों नहीं मिला।

सियासत में कोई भी मांग सिर्फ मांग नहीं बल्कि संदेश भी होती है। यह संदेश तीन दिशाओं में जा रहा है। बसपा, समाजवादी पार्टी और बीजेपी की तरफ और यहीं से शुरू होता है राजनीतिक खेल। पहला संदेश क्या मायवती असहज होंगी। अगर कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग उठती है तो सबसे पहले खुशी किसे होनी चाहिए। अगर व्यवहारिक तौर पर देखें मायावती को। क्योंकि कांशीराम की वे सबसे बड़ी राजनीतिक वारिस मानी जाती हैं। लेकिन यहां एक अजीब स्थिति बनती हुई नजर आ रही है। अगर यह मांग राहुल गांधी उठाते हैं और सरकार मान लेती है तो राजनीतिक लाभ किसे मिलेगा। हालांकि मायावती पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस पार्टी तो कांशीराम की जयंती पर छुट्टी का ऐलान नहीं कर भला फिर यह पार्टी अब मान्यवर श्री कांशीराम जी को कैसे इस उपाधि से सम्मानित कर सकती है? लेकिन अगर कांशीराम को भारत रत्न दिलाने का श्रेय कांग्रेस ले जाए तो यह बसपा के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका हो सकता है।

कांशीराम की राजनीति का केंद्र दलित समाज था और उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट बैंक बहुत महत्वपूर्ण है। राहुल गांधी अगर इस मुद्दे पर और आक्रामक तरीके से आगे बढ़ते हैं तो यह संदेश जा सकता है कि कांग्रेस भी बहुजन राजनीति की विरासत में हिस्सेदारी चाहती है। और यही बात समाजवादी पार्टी को भी असहज कर सकती है क्योंकि यूपी में दलित और पिछड़ा वोट यही तो असली चुनावी गणित है। लिहाजा अखिलेश यादव भी खुद को दलित समाज का पहरुआ बताने के लिए दो कदम आगे चले।

तीसरा सवाल – बीजेपी क्या करेगी? अब सबसे दिलचस्प स्थिति बीजेपी की है। अगर बीजेपी कांशीराम को भारत रत्न देने से इनकार करती है तो विपक्ष कहेगा कि देखिए बीजेपी दलित नेताओं को सम्मान नहीं देना चाहती और अगर बीजेपी यह सम्मान दे देती है तो राहुल गांधी कहेंगे कि देखिए हमने दबाव बनाया तब जाकर सरकार ने फैसला लिया। यानि राजनीतिक श्रेय फिर भी कांग्रेस ले सकती है। यही वजह है कि यह मुद्दा बीजेपी के लिए भी आसान नहीं है। लेकिन असली सवाल कुछ और है। यह पूरी बहस हमें एक और सवाल की तरफ ले जाती है।

तो क्या भारत रत्न अब पूरी तरह राजनीतिक पुरस्कार बन गया है इतिहास देखें तो कई बार ऐसा हुआ है कि भारत रत्न देने का फैसला भी राजनीतिक समीकरणों से प्रभावित हुआ। कभी चुनाव से पहले कभी गठबंधन के दबाव में कभी किसी क्षेत्रीय संतुलन के लिए। तो क्या कांशीराम का नाम भी उसी राजनीति का हिस्सा बन रहा है? भारतीय राजनीति में नेताओं को याद करने का एक अजीब तरीका है। जब तक वे जिंदा रहते हैं उन्हें चुनावी मंचों पर शायद ही याद किया जाता है। लेकिन जैसे ही उनकी विरासत वोट दिलाने लगती है सबको अचानक उनकी याद आने लगती है। आज कांशीराम के नाम पर वही हो रहा है। जो पार्टियां कभी उनके आंदोलन के खिलाफ थीं वे भी आज उन्हें सम्मान देने की बात कर रही हैं और जो पार्टियां खुद को उनकी असली वारिस बताती हैं वे भी खुलकर इस मांग को अपने एजेंडे का हिस्सा नहीं बना पा रहीं।

एक समय था जब दलित राजनीति का केंद्र बसपा थी। लेकिन आज हालात बदल चुके हैं। आज दलित वोट कई पार्टियों में बंट रहा है। बीजेपी भी दलित नेताओं को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस भी इस वोट बैंक को वापस पाने की कोशिश में है और क्षेत्रीय दल भी इसे छोड़ना नहीं चाहते। यानी कांशीराम की विरासत आज भी भारतीय राजनीति का एक बड़ा हिस्सा है। अब आखिरी सवाल यह है कि इस पूरे मुद्दे से फायदा किसे होगा? अगर यह बहस लंबी चलती है तो फायदा होगा। कांग्रेस को, दलित राजनीति को और शायद उस नेता की विरासत को भी जिसे आज फिर याद किया जा रहा है कांशीराम। लेकिन नुकसान किसे हो सकता है? उन पार्टियों को जो खुद को बहुजन राजनीति का असली प्रतिनिधि बताती रही हैं। तो क्या राहुल गांधी ने एक ऐसा मुद्दा उठा दिया है जिससे बसपा, सपा और बीजेपी तीनों असहज हो सकते हैं? या फिर यह सिर्फ एक प्रतीकात्मक मांग है जो कुछ दिनों की बहस के बाद खत्म हो जाएगी?