श्रीनि से संवाद: 5 राज्यों के चुनाव और क्षेत्रीय दलों की साख
विधानसभा चुनाव 2026: पश्चिम बंगाल में ममता बनाम बीजेपी की जंग और दक्षिण में डीएमके का दबदबा; द फेडरल के एडिटर इन चीफ एस श्रीनिवासन के साथ खास चुनावी चर्चा।

देश में चुनावी बिगुल बज चुका है और अप्रैल की तपिश के साथ ही पांच राज्यों (पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी) में सियासी पारा चढ़ने लगा है। 'द फेडरल' के विशेष पॉडकास्ट 'श्रीनि से संवाद' में एडिटर इन चीफ एस श्रीनिवासन ने इन चुनावों के गहरे मायने समझाए हैं। उनके अनुसार, यह चुनाव केवल सत्ता का संघर्ष नहीं है बल्कि क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के अखिल भारतीय विस्तार की एक बड़ी परीक्षा है। बीजेपी जहां उत्तर भारत की पार्टी होने का ठप्पा मिटाकर दक्षिण और पूर्व में अपनी पैठ मजबूत करना चाहती है, वहीं कांग्रेस अपनी खोई हुई जमीन तलाश रही है।
एस श्रीनिवासन बताते हैं कि यह चुनाव उन राज्यों में हो रहा है जहां क्षेत्रीय दलों की जड़ें बेहद गहरी हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में एमके स्टालिन जैसे कद्दावर नेता अपनी सत्ता बचाने की चुनौती का सामना कर रहे हैं। दूसरी ओर, केरल में कम्युनिस्ट पार्टी के अस्तित्व की लड़ाई है, क्योंकि यदि केरल हाथ से निकलता है तो देश के राजनीतिक मानचित्र से वामपंथ का शासन पूरी तरह साफ हो जाएगा।
पश्चिम बंगाल: ममता की 'अस्मिता' बनाम बीजेपी का 'राष्ट्रवाद'
पश्चिम बंगाल का चुनाव इस समय देश का सबसे हाई-प्रोफाइल मुकाबला बना हुआ है। एस श्रीनिवासन के विश्लेषण के अनुसार, यहां मुख्य लड़ाई तृणमूल कांग्रेस (TMC) और बीजेपी के बीच है।
मुद्दों का टकराव: बीजेपी जहां घुसपैठ और 'लॉ एंड ऑर्डर' को मुद्दा बना रही है, वहीं ममता बनर्जी ने इसे 'बंगाल की अस्मिता' (Sub-Nationalism) से जोड़ दिया है।
SR (वोटर लिस्ट) का विवाद: बंगाल में वोटर लिस्ट के सार्वजनिक न होने और एसआर (SR) प्रक्रिया को लेकर ममता बनर्जी ने मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने इसे सुप्रीम कोर्ट तक ले जाकर जनता के बीच यह संदेश दिया है कि वह बंगाल के लोगों के अधिकारों की रक्षक हैं।
संस्थागत टकराव: चुनाव आयोग द्वारा अधिकारियों के बड़े पैमाने पर तबादले को ममता ने 'अघोषित आपातकाल' करार दिया है। श्रीनिवासन का मानना है कि ममता बनर्जी एक जुझारू नेता हैं और वह इन चुनौतियों का उपयोग 'प्रो-इनकंबेंसी' (Pro-incumbency) लहर बनाने में कर रही हैं।
दक्षिण का रण: तमिलनाडु और केरल की चुनौतियां
दक्षिण भारत के राज्यों में भी मुकाबला काफी दिलचस्प है। तमिलनाडु में एमके स्टालिन अपने पिता एम. करुणानिधि का रिकॉर्ड दोहराने की कोशिश में हैं।
तमिलनाडु: स्टालिन ने एक मजबूत 'अम्ब्रेला कोलिशन' बनाया है जिसमें कांग्रेस, लेफ्ट और दलित दल शामिल हैं। दूसरी ओर, एक्टर विजय की पार्टी (TVK) की एंट्री ने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। सवाल यह है कि विजय किसके वोट काटेंगे? फिलहाल पलड़ा स्टालिन का भारी नजर आ रहा है।
केरल: यहां मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के सामने लगातार तीसरी बार सत्ता में आने की चुनौती है। कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ (UDF) के पास अच्छा मौका है, लेकिन उनके बीच की आंतरिक गुटबाजी और मुख्यमंत्री पद के कई दावेदार पार्टी की संभावनाओं को कमजोर कर रहे हैं।
असम और पुदुचेरी: बीजेपी और कांग्रेस की स्थिति
असम में हेमंत बिस्वा शर्मा एक बहुत ही मजबूत और लोकप्रिय नेता के रूप में उभरे हैं। उन्होंने कांग्रेस को संगठनात्मक रूप से काफी कमजोर कर दिया है। श्रीनिवासन के अनुसार, असम में बीजेपी की जीत की संभावनाएं प्रबल हैं क्योंकि वहां कांग्रेस नेतृत्व संकट और आंतरिक फूट से जूझ रही है। वहीं, पुदुचेरी जैसे छोटे केंद्र शासित प्रदेश में भी गठबंधन की रार (विशेषकर कांग्रेस और डीएमके के बीच) एनडीए को फायदा पहुंचा सकती है।
राष्ट्रीय राजनीति पर प्रभाव
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के लिए यह चुनाव 'संजीवनी' की तरह हैं। यदि वह केरल या असम में वापसी नहीं कर पाती है, तो उसके पुनरुत्थान के दावों पर सवाल उठेंगे। वहीं, बीजेपी के लिए बंगाल में जीत उसका 'स्वर्णिम काल' शुरू कर सकती है। कुल मिलाकर, अप्रैल के ये चुनाव देश की भावी राजनीति की दिशा तय करेंगे।

