हार, परिवार में दरार और सत्ता की कुर्सी, क्या TejashwiYadav बनेंगे RJD के असली बॉस?
लालू यादव के परिवार में अनबन ने सियासी हलचल बढ़ा दी है। 25 जनवरी को होने वाली आरजेडी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में तेजस्वी यादव को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जा सकता है।

Tejashwi Yadav News: बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय जनता दल के कद्दावर नेता तेजस्वी यादव पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा करते थे इस बार नीतीश कुमार सत्ता से बाहर होंगे। रैलियों में जोश था, मंच से भरोसा था, और समर्थकों में यह विश्वास कि 2020 ना सही 2025 में सत्ता का रास्ता साफ है। लेकिन राजनीति में भरोसे से ज्यादा अहम होता है नतीजा। और जब नतीजे आए तो बिहार की राजनीति ने एक बार फिर करवट बदल ली। नीतीश कुमार जिन्हें सत्ता से बाहर बताया जा रहा था
ना सिर्फ 85 सीटों पर कब्जा जमाने में कामयाब हुए बल्कि एक बार फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठ गए। और दूसरी तरफ राष्ट्रीय जनता दल। जिस पार्टी को सत्ता का दावेदार माना जा रहा था वो सिर्फ 25 सीटों पर सिमट गई । यह हार सिर्फ एक चुनावी हार नहीं थी। यह हार थी नेतृत्व की, रणनीति की, और भरोसे की।
अब यहां से कहानी और दिलचस्प हो जाती है। चुनावी नतीजों के बाद आरजेडी के भीतर जो शुरू हुआ वो बिहार की राजनीति में शायद पहली बार इतनी खुलकर सामने आया। लालू प्रसाद यादव का परिवार जिसे हमेशा एकजुट माना जाता था वहीं से दरारें साफ दिखाई देने लगीं। लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य खुलकर सामने आईं। और अपने ही भाई तेजस्वी यादव पर तीखे, सीधे और सार्वजनिक आरोप लगाए। यह सिर्फ पारिवारिक कलह नहीं थी। यह सत्ता संघर्ष का संकेत था। और इसी बीच एक खबर ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी। बताया जा रहा है कि 25 जनवरी को होने वाली आरजेडी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में तेजस्वी यादव को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जा सकता है। यहीं से असली सवाल खड़ा होता है क्या तेजस्वी यादव को अब औपचारिक तौर पर आरजेडी की कमान सौंपी जा रही है? और अगर हां… तो इसका मतलब क्या है? अब आगे बढ़ने से पहले एक बहुत जरूरी सवाल। राष्ट्रीय अध्यक्ष या कार्यकारी अध्यक्ष होता कौन है? और उसकी ताकत कितनी होती है?
राजनीतिक दलों में राष्ट्रीय अध्यक्ष सिर्फ एक पद नहीं होता। वह पार्टी का सर्वेसर्वा होता है। पार्टी का नाम, पार्टी का झंडा, पार्टी का चुनाव चिन्ह इन सब पर अंतिम अधिकार अध्यक्ष का होता है। सांसद हो या विधायक टिकट किसे मिलेगा,
किसका टिकट कटेगा अंतिम फैसला अध्यक्ष का। चुनाव आयोग में पार्टी सिंबल पर हस्ताक्षर। राष्ट्रीय और प्रदेश कार्यकारिणी का गठन। 11 सदस्यीय कोर ग्रुप का चयन। यानी साफ शब्दों में अध्यक्ष का मतलब है पूरी पार्टी की चाबी।
अब आइए तेजस्वी यादव के नेतृत्व में लड़े गए चुनावों पर नजर डालते हैं। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 आरजेडी ने 143 सीटों पर चुनाव लड़ा। लेकिन जीत मिली… सिर्फ 25 सीट। बिहार विधानसभा चुनाव 2020 114 सीटों पर चुनाव,
75 सीटों पर जीत। लोकसभा चुनाव 2024 में 40 में से 23 सीटों पर उम्मीदवार लेकिन जीत सिर्फ 4 सीट। ये आंकड़े झूठ नहीं बोलते। तेजस्वी यादव के नेतृत्व में आरजेडी का ग्राफ ऊपर नहीं गया बल्कि नीचे आया है। तो फिर सवाल उठता है इतनी खराब परफॉर्मेंस के बाद भी तेजस्वी यादव को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष की कुर्सी क्यों दी जा सकती है। यहीं से शुरू होता है तीन वजहों वाला राजनीतिक गणित।
पहली वजह, नेतृत्व बदलाव
5 जुलाई 1997। इसी दिन आरजेडी बनी थी और उसी दिन से लालू प्रसाद यादव पार्टी की आत्मा रहे। आज भले ही स्वास्थ्य कारणों से लालू यादव सक्रिय राजनीति में पहले जैसे न हों, लेकिन सच ये भी है कि उनके कद का नेता
बिहार में नीतीश कुमार को छोड़कर कोई नहीं। लेकिन समय की सच्चाई यह भी है कि पार्टी को डेली ऑपरेशन चलाने वाला चेहरा चाहिए। यही वजह है कि आरजेडी में अब एक नया मॉडल उभर रहा है। लालू यादव,मार्गदर्शक, तेजस्वी यादव, निर्णायक चेहरा। लालू पूरी तरह हटें यह पार्टी को सूट नहीं करता। लेकिन तेजस्वी को पूरी ताकत दिए बिना पार्टी आगे भी नहीं बढ़ सकती।
दूसरी वजह,तेज प्रताप फैक्टर
बिहार चुनाव से पहले लालू यादव ने अपने बड़े बेटे तेज प्रताप यादव को परिवार और पार्टी से बाहर कर दिया। तेज प्रताप ने अपनी पार्टी बना ली जनशक्ति जनता दल। लेकिन राजनीति में रिश्ते कभी स्थायी नहीं होते। हाल ही में दही-चूड़ा भोज में लालू यादव और राबड़ी देवी। तेज प्रताप के साथ दिखाई दिए। रबड़ी देवी के तीनों यादव भाई भी मौजूद थे। इसके बाद कयास तेज हो गए क्या परिवार फिर एक हो रहा है? तेज प्रताप का बयान आया जनशक्ति जनता दल ही असली आरजेडी है। लेकिन तेजस्वी यादव यह बिल्कुल नहीं चाहते कि तेज प्रताप की पार्टी में वापसी हो। राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनकर तेजस्वी हर संभावित एंट्री पर कानूनी और संगठनात्मक ब्रेक लगा सकते हैं।
तीसरी और सबसे बड़ी वजह, राष्ट्रीय कद
तेजस्वी यादव अब सिर्फ बिहार के नेता नहीं रहना चाहते। INDIA गठबंधन की बैठकों में उनकी भूमिका बढ़े। बिहार के बाहर किस पार्टी से गठबंधन हो, कितनी सीटों पर समझौता हो यह सब तेजस्वी तय करें। अभी तक स्थिति यह है कि
तेजस्वी अघोषित तौर पर पार्टी चला रहे हैं। लेकिन कार्यकारी अध्यक्ष बनते ही उनकी सत्ता संवैधानिक हो जाएगी। कोई नेता उनके फैसले पर उंगली नहीं उठा सकेगा। और यहीं आता है एक बेहद अहम ऐतिहासिक संदर्भ। जब लालू यादव जेल जा रहे थे तो रंजन यादव को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया। शुरुआत में सब ठीक था। लेकिन फिर रंजन यादव ने स्वतंत्र फैसले लेने शुरू कर दिए। लालू यादव को यह पसंद नहीं आया।
लालू ने अपने खास लोगों से पूछा क्या कार्यकारी अध्यक्ष फैसले ले सकता है? जब जवाब मिला हां तो रंजन यादव को हटा दिया गया। इस किस्से का मतलब साफ है कार्यकारी अध्यक्ष सिर्फ नाम का पद नहीं होता। वह असली ताकत होता है। अगर तेजस्वी यादव कार्यकारी अध्यक्ष बनते हैं तो उनके फैसलों को हर नेता को मानना होगा। जो मानेगा वो बचेगा। जो नहीं मानेगा उसका भविष्य तेजस्वी तय करेंगे। यही वजह है कि आरजेडी में कार्यकारी अध्यक्ष की भूमिका नियमित अध्यक्ष के बाद सबसे अहम मानी जाती है। तो सवाल यही है क्या तेजस्वी यादव इस ताकत का इस्तेमाल पार्टी को मजबूत करने में करेंगे? या फिर यह ताकत आरजेडी में नई दरारें पैदा करेगी? 25 जनवरी को आरजेडी की बैठक सिर्फ एक संगठनात्मक बैठक नहीं होगी। वह बैठक तय करेगी क्या आरजेडी में सत्ता का केंद्र औपचारिक रूप से लालू से तेजस्वी के हाथ जाने वाला है। और अगर ऐसा हुआ तो बिहार की राजनीति एक बार फिर नए दौर में प्रवेश करेगी।

