यूपी में एनकाउंटर पर आर-पार: अखिलेश के 'पीडीए' डेटा से भाजपा में हलचल!

27 May 2026 10:05 PM IST

खिलेश यादव का योगी सरकार पर बड़ा हमला, कहा- 'पीडीए' को बनाया जा रहा निशाना। सपा और भाजपा के बीच शुरू हुई जातीय गोलबंदी, 2027 चुनाव तक यूपी की राजनीति का हाल।

UP Akhileshe Vs Yogi: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है। समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव ने योगी सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि राज्य में पुलिस द्वारा किए जा रहे 'फर्जी एनकाउंटर' में सबसे ज्यादा शिकार 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समुदाय के लोग हो रहे हैं। अखिलेश के इस दावे ने यूपी की सियासत में भूचाल ला दिया है।


"पीडीए का हो रहा सफाया"
'द फेडरल देश' के साथ एक विशेष चर्चा में समाजवादी पार्टी की प्रवक्ता शौर्या सिंह ने अखिलेश यादव के आरोपों को ज़मीनी हकीकत बताया। उन्होंने कहा, "यह केवल एनकाउंटर का सवाल नहीं है, एनसीआरबी (NCRB) की रिपोर्ट से लेकर पुलिस के व्यवहार तक सब कुछ एक जाति विशेष को बचाने और दूसरी जाति को दबाने के काम में लगा है। मैंने खुद देखा है कि जब दो पक्ष पुलिस के पास पहुँचते हैं, तो मुख्यमंत्री की स्वजाति बिरादरी को वेटेज दिया जाता है और पीडीए समुदाय की शिकायतों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।"

शौर्या सिंह ने गाजीपुर के 'कटरिया कांड' का ज़िक्र करते हुए आरोप लगाया कि कैसे प्रशासन ने ठाकुर-ब्राह्मण गठबंधन के आगे झुककर एक विश्वकर्मा समाज की बेटी के न्याय को दबाने की कोशिश की।

राजनीति बनाम अपराध: क्या अपराधी की भी जाति होती है?
वरिष्ठ पत्रकार नवल कांत सिन्हा ने इस आरोप-प्रत्यारोप पर संतुलित नज़रिया पेश किया। उन्होंने कहा कि विपक्ष का काम सवाल उठाना है, लेकिन एनकाउंटर जैसे गंभीर मुद्दों पर केवल जातिगत आंकड़े पेश करना पर्याप्त नहीं है।
"लोकतंत्र में जनता तय करेगी कि किसकी बातों में दम है। यह सच है कि जितनी भी कार्रवाई हो रही है, उनमें पीडीए समाज के लोग संख्या में ज़्यादा हो सकते हैं, लेकिन अपराधी को जाति के चश्मे से देखना भी उतना ही गलत है। अखिलेश यादव को अगर ये दावे करने हैं, तो उन्हें उन एनकाउंटर्स के नाम भी सार्वजनिक करने चाहिए जो वास्तव में 'फेक' थे और जिनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं था।"

बुलडोजर राजनीति: क्या यह संप्रदाय विशेष को टार्गेट कर रही है?
जब चर्चा बुलडोजर कार्रवाई पर पहुंची, तो पत्रकार नवल कांत सिन्हा ने माना कि यह कार्रवाई एक संप्रदाय विशेष (मुस्लिम समुदाय) को टारगेट करती हुई प्रतीत होती है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि अपराध के खिलाफ कानून का राज होना चाहिए, न कि धर्म या जाति के आधार पर कार्रवाई रुकनी चाहिए या शुरू होनी चाहिए।

राजभर कार्ड और ओपी राजभर की घेराबंदी
इस चर्चा में समाजवादी पार्टी के पोस्टर कैंपेन का भी मुद्दा उठा, जिसमें ओपी राजभर की भूमिका पर सवाल उठाए गए। शौर्या सिंह ने कहा, "ओपी राजभर जिस समुदाय के हित की बात करके मंत्री बने, आज उसी समुदाय के लोग प्रताड़ित हो रहे हैं। समाजवादी पार्टी ने इसी के खिलाफ सीमा राजभर को खड़ा किया है, जो राजभर समाज के न्याय की लड़ाई लड़ रही हैं।"

विधानसभा चुनाव तक क्या होगा समीकरण?
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में उत्तर प्रदेश में जातीय गोलबंदी और तेज़ होगी। नवल कांत सिन्हा के अनुसार:

सपा की रणनीति: अखिलेश यादव 'पीडीए' (PDA) के साथ दलितों को जोड़कर एक नया सोशल इंजीनियरिंग प्रयोग कर रहे हैं, जो लोकसभा चुनाव में सफल रहा है।

भाजपा की चुनौती: भाजपा हर जाति के खांचे में फिट बैठने की कोशिश कर रही है। हालांकि, ब्राह्मण समाज इस वक्त कशमकश में है, लेकिन बिहार के चुनाव की तरह हो सकता है कि अंत में वे भाजपा के साथ ही बने रहें।

चुनाव से एक साल पहले, योगी बनाम अखिलेश की यह लड़ाई केवल एनकाउंटर या विकास तक सीमित नहीं रहने वाली है। यह लड़ाई अब पूरी तरह से जातियों के समीकरण और नैरेटिव सेट करने पर टिक गई है। अब देखना यह होगा कि जनता 'कानून-व्यवस्था' के दावों पर यकीन करती है या 'पीडीए' के 'बदलाव' के वादों पर।