क्या है डिस्टर्ब्ड एरिया बिल, जानें- क्यों मचा राजस्थान में सियासी बवाल?
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क्या है डिस्टर्ब्ड एरिया बिल, जानें- क्यों मचा राजस्थान में सियासी बवाल?

राजस्थान का डिस्टर्ब्ड एरिया यानी अशांत क्षेत्र बिल विवादों में है। विपक्ष इसे विभाजनकारी जबकि सरकार इसे सामाजिक संतुलन के लिए जरूरी बता रही है।


राजस्थान में प्रस्तावित कानून जो सरकार को “अशांत” (डिस्टर्ब्ड) क्षेत्रों में संपत्ति के लेन-देन को नियंत्रित करने का अधिकार देता है विवादों में घिरता जा रहा है। इस कानून ने सियासी और कानूनी बहस को तेज कर दिया है। आलोचकों का कहना है कि यह कानून साम्प्रदायिक विभाजन को गहरा कर सकता है और शहरी इलाकों में राज्य के मनमाने नियंत्रण को बढ़ावा दे सकता है। साथ ही, इससे अल्पसंख्यक समुदायों को सीमित भूभाग में और सीमित करना है। ।

विपक्ष ने इसे गुजरात मॉडल की अंधी नकल बताया है, जहां इस तरह का कानून पहले से लागू है। वहीं, कानूनी विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने भी इसका विरोध किया है, हालांकि राज्य की भाजपा सरकार इसे सामान्य और जरूरी कदम बताने की कोशिश कर रही है।

बिल में क्या है प्रावधान

इस बिल का आधिकारिक नाम है — राजस्थान अशांत क्षेत्रों में अचल संपत्ति के हस्तांतरण पर रोक और किरायेदारों को बेदखली से संरक्षण विधेयक, 2026। इसे संक्षेप में “डिस्टर्ब्ड एरिया बिल” कहा जा रहा है। यह बिल राज्य सरकार को अधिकार देता है कि वह किसी भी क्षेत्र को अधिकतम तीन साल के लिए “अशांत” घोषित कर सकती है, यदि वहां साम्प्रदायिक तनाव, हिंसा, दंगों या सार्वजनिक अव्यवस्था की आशंका हो।

एक बार क्षेत्र को “डिस्टर्ब्ड” घोषित कर दिया गया, तो वहां जमीन, मकान या व्यावसायिक संपत्ति के किसी भी लेन-देन के लिए जिला मजिस्ट्रेट (DM) या कलेक्टर की पूर्व अनुमति अनिवार्य होगी। इसमें बिक्री, उपहार, विनिमय और लीज जैसे सभी सौदे शामिल हैं।

बिना अनुमति किए गए लेन-देन को अवैध माना जाएगा। साथ ही, अधिकारी यह भी जांच करेंगे कि सौदा स्वेच्छा से हुआ है या दबाव में किया गया है। कानून में उल्लंघन करने पर 3 से 5 साल की जेल और जुर्माने का प्रावधान है। ये अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती होंगे। साथ ही, किरायेदारों को जबरन बेदखली से बचाने के प्रावधान भी शामिल हैं।

विवाद क्यों बढ़ा?

इस बिल को अभी राज्यपाल की मंजूरी नहीं मिली है, लेकिन इसे लेकर राजनीतिक विवाद शुरू हो चुका है। विधानसभा में पारित होने के दिन कांग्रेस ने वॉकआउट किया और इसे विभाजनकारी करार दिया। विपक्ष का कहना है कि सरकार को “अशांत क्षेत्र” घोषित करने के व्यापक अधिकार मिल जाएंगे, जिससे समुदायों का अलगाव (घेट्टोकरण) बढ़ सकता है। उनका दावा है कि यह कानून जबरन विस्थापन रोकने के बजाय आवासीय विभाजन और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को संस्थागत रूप दे सकता है।

“गुजरात मॉडल की कॉपी”

राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने इसे भाजपा के गुजरात मॉडल की “कॉपी-पेस्ट” बताया। उनका आरोप है कि यह कानून राज्य में साम्प्रदायिक विभाजन पैदा करने के लिए बनाया गया है।उन्होंने कहा कि किसी इलाके को “अशांत” घोषित करने से उसकी छवि खराब होगी, सामाजिक संबंध बिगड़ेंगे और राजस्थान की गंगा-जमुनी तहजीब को नुकसान पहुंचेगा।

राजस्थान इस तरह का कानून लाने वाला गुजरात के बाद दूसरा राज्य बन गया है। गुजरात में इसी तरह का कानून 1991 में लागू हुआ था, जिसका उद्देश्य दंगों के बाद होने वाली मजबूरन संपत्ति बिक्री को रोकना था। हालांकि, समय के साथ इसका इस्तेमाल संवेदनशील इलाकों में समुदायों के बीच संपत्ति खरीद-फरोख्त को नियंत्रित करने के लिए भी किया गया।

नागरिक संगठनों का विरोध

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) जैसे संगठनों ने इस बिल को तुरंत वापस लेने की मांग की है। उनका कहना है कि इससे शहरी इलाकों में अल्पसंख्यकों का घेट्टोकरण बढ़ेगा। PUCL की राष्ट्रीय अध्यक्ष कविता श्रीवास्तव ने कहा कि यह कानून “कानूनी तरीके से आवासीय अलगाव” को बढ़ावा देगा, जो बेहद चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 19(1)(e) देश के किसी भी हिस्से में रहने और बसने की स्वतंत्रता के खिलाफ है।

दलित अधिकार कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी ने भी चेतावनी दी कि इसका सबसे ज्यादा असर सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि पहले से ही दलित-बहुजन समुदाय को आवास के क्षेत्र में भेदभाव का सामना करना पड़ता है, ऐसे में प्रशासनिक अनुमति की शर्त इस समस्या को और बढ़ा सकती है।

कानूनी और संवैधानिक सवाल

कानूनी विशेषज्ञों ने भी इस बिल पर गंभीर सवाल उठाए हैं। राजस्थान हाईकोर्ट के वकील अखिल चौधरी के अनुसार, “अशांत क्षेत्र”, “असंतुलित जनसंख्या” जैसे शब्द अस्पष्ट हैं और इनकी स्पष्ट कानूनी परिभाषा नहीं है। इससे यह कानून मनमाने फैसलों का शिकार हो सकता है।उन्होंने कहा कि संपत्ति के लेन-देन के लिए सरकारी अनुमति की शर्त संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत संपत्ति के अधिकार पर बड़ा प्रतिबंध है। साथ ही, यह अनुच्छेद 19(1)(e) के तहत रहने की स्वतंत्रता को भी प्रभावित करता है।

सरकार का पक्ष

राजस्थान की भाजपा सरकार ने इस कानून का बचाव किया है। उसका कहना है कि यह “एक ही समुदाय के लोगों के अनुचित समूह बनने” को रोकने और सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी है। राज्य के कानून मंत्री जोगाराम पटेल ने कहा कि कई बार साम्प्रदायिक तनाव के कारण लोग मजबूरी में अपनी संपत्ति बेच देते हैं या किराए के घर छोड़ देते हैं। यह कानून ऐसी मजबूरन पलायन की स्थिति को रोकने में मदद करेगा।

वहीं, गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेडम ने कहा कि इस कानून में किसी धर्म या समुदाय का नाम नहीं है, इसलिए यह किसी खास वर्ग को निशाना नहीं बनाता। हालांकि, उन्होंने यह भी दावा किया कि राज्य में कुछ इलाके ऐसे बन रहे हैं जहां दूसरे लोग आसानी से प्रवेश नहीं कर पाते।

क्या राजस्थान की छवि बदल रही है?

इस पूरे विवाद ने यह बहस छेड़ दी है कि क्या राजस्थान अब भी एक शांतिपूर्ण राज्य है। परंपरागत रूप से यह गुजरात और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की तरह बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक हिंसा के लिए नहीं जाना जाता, लेकिन हाल के वर्षों में यहां छिटपुट तनाव की घटनाएं बढ़ी हैं।मुंबई के सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेक्युलरिज्म की एक रिपोर्ट के अनुसार, जहां देशभर में 2024 से 2025 के बीच दंगे 50% तक कम हुए हैं, वहीं राजस्थान में स्थानीय स्तर पर तनाव की घटनाओं में वृद्धि देखी गई है, जिसके चलते कई बार बड़े पैमाने पर हिरासत और इंटरनेट बंदी जैसे कदम उठाने पड़े।

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