
सूरत में LPG का संकट बढ़ा ! 500 रुपये किलो तक गैस, मजदूरों का पलायन शुरू
सूरत में घरेलू गैस का बड़ा संकट; ब्लैक मार्केट में 500 रुपये किलो तक पहुंचे दाम। उधना स्टेशन पर घर लौटने वाले मजदूरों का उमड़ा हुजूम।
Migrants' In Problem : गुजरात के औद्योगिक शहर सूरत में शनिवार को हालात उस समय बेकाबू नजर आए, जब हजारों प्रवासी मजदूरों ने घरेलू गैस (LPG) की भारी किल्लत के विरोध में शहर छोड़ने का फैसला कर लिया। सूरत के उधना रेलवे स्टेशन पर शनिवार सुबह से ही बिहार और उत्तर प्रदेश जाने वाले श्रमिकों का भारी रेला देखा जा रहा है। सरकारी दावों के विपरीत, जमीनी स्तर पर रसोई गैस की ब्लैक मार्केटिंग ने मजदूरों का बजट पूरी तरह बिगाड़ दिया है। पिछले 48 घंटों में गैस के दाम 500 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं। बिना ईंधन के चूल्हे ठंडे पड़ चुके हैं और पेट की आग बुझाने में नाकाम मजदूर अब भारी मन से अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर पलायन को मजबूर हैं।
उधना स्टेशन पर बेबसी का सैलाब
सूरत का उधना रेलवे स्टेशन आज पलायन की एक भयावह तस्वीर पेश कर रहा है। स्टेशन के हर प्लेटफॉर्म और वेटिंग एरिया में मजदूरों की लंबी कतारें लगी हैं। ताजी जानकारी के अनुसार, ये श्रमिक केवल त्योहार की छुट्टी के लिए नहीं, बल्कि ईंधन के संकट के कारण काम छोड़कर भाग रहे हैं। बिहार के रहने वाले योगेश कुमार मंडल ने बताया कि परसों रात उन्हें भूखा सोना पड़ा क्योंकि गैस खत्म हो चुकी थी। उन्होंने कहा कि जब गैस ही नहीं मिलेगी तो हम यहां रहकर काम कैसे करेंगे?
500 रुपये में मिल रही एक किलो गैस
ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, सूरत के स्लम इलाकों और श्रमिक बस्तियों में गैस की जबरदस्त कालाबाजारी हो रही है। मजदूरों ने आरोप लगाया है कि जो सिलेंडर रिफिलिंग 130 रुपये में होती थी, उसके लिए अब 500 रुपये तक वसूले जा रहे हैं। भागलपुर जाने वाले मुकेश कुमार राय ने बताया कि पिछले 15 दिनों से आधिकारिक केंद्रों पर गैस उपलब्ध नहीं है। ऐसे में प्राइवेट डीलरों ने मनमाना पैसा वसूलना शुरू कर दिया है। एक दिहाड़ी मजदूर के लिए 500 रुपये किलो गैस खरीदना उसकी पूरी दिन की कमाई लुटाने जैसा है।
ठप हो रहा है काम, पलायन से बढ़ी चिंता
गैस संकट का असर अब सूरत की कपड़ा और साड़ी पेंटिंग इकाइयों पर भी दिखने लगा है। फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों का कहना है कि एक तरफ काम की कमी है और दूसरी तरफ महंगाई का दोहरा वार। रजनीश नामक श्रमिक ने बताया कि ठेकेदारों द्वारा भुगतान में देरी और गैस की किल्लत ने उन्हें घर से पैसे मंगाकर टिकट बुक करने पर मजबूर कर दिया है। स्टेशन पर खड़ी भीड़ का एक ही तर्क है कि 'जब खाना ही नहीं बनेगा, तो हम कमाएंगे क्या?'
सरकारी दावों पर सवालिया निशान
प्रशासन भले ही आपूर्ति सामान्य होने का दावा कर रहा हो, लेकिन उधना स्टेशन पर खाली चूल्हे और बाल्टियां लेकर बैठे मजदूर कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। बिना गैस कनेक्शन वाले इन प्रवासी मजदूरों के पास अपनी बात रखने का कोई मंच नहीं है। ये मजदूर अब तभी वापस आने की शर्त रख रहे हैं जब सरकार गैस की उपलब्धता और कीमतों पर लगाम लगाएगी। इस पलायन से आने वाले दिनों में सूरत के कपड़ा उद्योग में लेबर की बड़ी कमी होने की आशंका गहरा गई है।
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