वेनेजुएला संकट: मादुरो की गिरफ्तारी पर भारत की चुप्पी के क्या हैं मायने?
x

वेनेजुएला संकट: मादुरो की गिरफ्तारी पर भारत की चुप्पी के क्या हैं मायने?

जैसे-जैसे ट्रंप के काम ग्लोबल नियमों को हिला रहे हैं, भारत संयम बनाए हुए है। क्या यह रणनीतिक स्वायत्तता है या ताकत से चलने वाली दुनिया में एक खतरनाक चुप्पी?


Click the Play button to hear this message in audio format

अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की हालिया गिरफ्तारी ने वैश्विक राजनीति में एक बार फिर शक्ति और अंतरराष्ट्रीय मानदंडों पर सवाल खड़ा कर दिया है। इस घटनाक्रम पर भारत ने संयमित रुख अपनाया है। यह भारत की विदेश नीति के संतुलन और विकल्पों के बारे में संकेत देता है।

भारत की संयमित प्रतिक्रिया और विदेश नीति

भारत की विदेश नीति हमेशा से संतुलन और विवेक पर आधारित रही है। अमेरिका के इस तरह के सीधे हस्तक्षेप और धमकियों की स्थिति में भी भारत ने सार्वजनिक आलोचना से परहेज किया। रूस और चीन समेत कई देश अमेरिका की कार्रवाई की निंदा कर चुके हैं, जबकि भारत की चुप्पी इस संतुलन की राजनीति को दर्शाती है।


भारत का वेनेजुएला में निवेश (ONGC के माध्यम से) और तेल की खरीदारी इसे प्रभावित करती है। वहीं अमेरिका के साथ इसके महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक संबंध भी हैं। इस संतुलन की स्थिति भारत की कमजोरियों से भी जुड़ी है। उदाहरण के लिए, रूस से तेल आयात बढ़ाने पर अमेरिका ने भारत पर दंडात्मक टैरिफ लगाए, जबकि चीन को ऐसा सामना नहीं करना पड़ा। इस तरह भारत की विदेश नीति शक्ति से नहीं, बल्कि सीमाओं और विवेक से संचालित होती है। मोदी सरकार के लिए बड़े वैश्विक झगड़ों में स्पष्ट रुख अपनाना हमेशा चुनौती रहा है। पाकिस्तान की आलोचना करना आसान है, लेकिन बड़े शक्तिशाली देशों के सामने सीधे टकराव से बचा जाता है। यह नीति दशकों से लागू है और आने वाले समय में भी संभवतः जारी रहेगी।

वर्तमान घटनाक्रम किसी नए विश्व क्रम की शुरुआत नहीं, बल्कि पुराने वैश्विक ढांचे की कसौटी है। अमेरिका ने पिछले लगभग 100 सालों से लैटिन अमेरिका में हस्तक्षेप किया है, लेकिन इस बार यह अत्यंत प्रत्यक्ष और खुला कदम था – सीधे एक देश में जाकर एक कार्यकारी राष्ट्रपति को गिरफ्तार करना।

यह कदम राष्ट्रीय संप्रभुता की सीमा को पार करता है। इससे यह संकेत मिलता है कि बड़े देशों द्वारा अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को चुनौती देना अब सामान्य होता जा रहा है। रूस के यूक्रेन पर आक्रमण से तुलना की जा रही है, क्योंकि इस तरह की कार्रवाइयां वैश्विक स्तर पर समान व्यवहार को वैध ठहरा सकती हैं। ग्रिनलैंड पर ट्रंप के बयान ने भी इसे और स्पष्ट किया। यह क्षेत्र डेनमार्क से जुड़ा है, जो NATO का सदस्य है। ट्रंप का अधिग्रहण का बयान न केवल क्षेत्रीय संप्रभुता को चुनौती देता है, बल्कि अमेरिकी सहयोगियों को भी असुरक्षित महसूस कराता है।

मादुरो की गिरफ्तारी का चीन और ताइवान पर असर

चीन के लिए यह घटनाक्रम एक प्रसंग और मिसाल पेश करता है। अगर बीजिंग ताइवान के खिलाफ आक्रामक कदम उठाता है तो वेनेजुएला का उदाहरण उसे वैध ठहराने में मदद कर सकता है। साथ ही, अमेरिका के लिए यह रणनीतिक चिंता का विषय भी है। चीन के वेनेजुएला के साथ तेल और संभवतः दुर्लभ खनिजों के सहयोग ने अमेरिकी चिंताओं को बढ़ाया। इस दृष्टि से, मादुरो की गिरफ्तारी चीन की वैश्विक रणनीतिक गणनाओं को प्रभावित कर सकती है।

ट्रंप की विदेश नीति

डोनाल्ड ट्रंप वैश्विक राजनीति को व्यवसायिक दृष्टिकोण से देखते हैं। उनका नजरिया सौदेबाजी और लेन-देन पर आधारित है। भारत के साथ व्यापारिक मतभेद, खासकर कृषि उत्पादों में ट्रंप की नाराजगी का कारण रहे। चीन के खिलाफ सख्त टैरिफ की धमकी के बावजूद अमेरिका ने उसे अपवाद दिया, क्योंकि दुर्लभ संसाधनों में चीन का प्रभुत्व है। रूस और यूक्रेन के मामले में भी ट्रंप चाहते हैं कि युद्ध जल्दी समाप्त हो, क्योंकि लंबी लड़ाई अमेरिका के लिए महंगी और हानिकारक है। ग्रिनलैंड पर नजर भी व्यावसायिक दृष्टिकोण से है, न कि राजनीतिक अधिग्रहण के लिए। ट्रंप की विदेश नीति सौदे, संसाधन और लागत पर आधारित है, न कि केवल कूटनीति पर। यह नीति वैश्विक शक्ति संतुलन को बदल रही है और पुराने अंतरराष्ट्रीय नियमों पर दबाव डाल रही है।

Read More
Next Story