
बेबी बंदर पंच-कुन और 'ओरा-मां': खिलौने में ममता तलाशती एक अधूरी जिंदगी
स्पर्श की भूख और अकेलेपन का दर्द: जापान के बेबी बंदर पंच-कुन की कहानी हमें बताती है कि क्यों भोजन से कहीं ज्यादा जरूरी 'अपनत्व' का अहसास है।
Viral Story Of Punch Kun: सोशल मीडिया पर एक वीडियो इन दिनों काफी वायरल हो रहा है। इसमें मकाक प्रजाति का एक बेबी बंदर कुछ खाता दिख रहा है। तभी एक बड़ा बंदर उसे पकड़कर जमीन पर लथेड़ देता है। वह उसे बेरहमी से गोल-गोल घुमा देता है। बड़े बंदर की पकड़ से छूटते ही वह बच्चा दौड़ लगाता है। वह कुछ दूरी पर पड़े एक ऑरेंज 'ओरांगुटान' खिलौने से चिपक जाता है। जापान के इस वायरल बेबी बंदर का नाम 'पंच-कुन' है। इसे देखने के लिए इचिकावा सिटी के चिड़ियाघर में भारी भीड़ उमड़ रही है। आखिर यह बंदर एक बेजान खिलौने को अपनी मां क्यों समझ रहा है? क्या बंदरों में ऐसा व्यवहार सामान्य है? यह कहानी हमें संवेदनाओं के एक गहरे सफर पर ले जाती है।
सवाल-1: बेबी ‘पंच-कुन’ की क्या है पूरी कहानी?
26 जुलाई 2025 को जापान के इचिकावा सिटी जू में एक मादा मकाक ने बच्चे को जन्म दिया। इस बच्चे का नाम ‘पंच-कुन’ रखा गया। जन्म के समय पंच-कुन का वजन केवल 500 ग्राम था। उसकी मां भीषण गर्मी और प्रसव की थकान से बहुत कमजोर हो गई थी। इस कमजोरी के चलते उसने अपने ही बच्चे पर ध्यान नहीं दिया। जापानी मकाक बंदर हमेशा बड़े समूहों में रहते हैं। लेकिन समूह की किसी दूसरी मादा ने भी पंच-कुन को नहीं अपनाया। अगले दिन से चिड़ियाघर के कर्मचारियों ने उसे बोतल से दूध पिलाना शुरू किया। एक्सपर्ट्स के अनुसार मकाक मांएं अक्सर बच्चों को शुरुआत में ही छोड़ देती हैं। इसके पीछे कई जैविक और मानसिक कारण हो सकते हैं।
मकाक मादाएं बच्चों को छोड़ने के कई कारण रखती हैं। आमतौर पर कम उम्र की मादाएं बच्चों को ज्यादा छोड़ती हैं। वे अनुभव की कमी और थकान के कारण ऐसा करती हैं। दूध पिलाने वाली मादाओं में 'कॉर्टिसोल' नाम का हॉर्मोन बढ़ जाता है। इससे वे आक्रामक हो जाती हैं और बच्चों को छोड़ देती हैं। जिस मादा का खुद का बचपन अकेलेपन में गुजरा हो वह भी ऐसी ही बनती है। वह आक्रामक मां बनती है और अपने बच्चों का ध्यान नहीं रखती। जू के कर्मचारियों ने पंच-कुन के सामने कई कंबल और खिलौने रखे। पंच-कुन ने इनमें से स्टफ्ड खिलौने ‘ओरांगुटान’ को चुना। अब लोग इस खिलौने को ‘ओरा-मां’ कहकर पुकार रहे हैं।
सवाल-2: बंदर एक बेजान खिलौने को मां क्यों समझने लगा?
वैज्ञानिक मानते हैं कि बंदरों को मां से केवल भोजन के लिए लगाव नहीं होता। असली लगाव 'टच कम्फर्ट' यानी छूने और गले लगने से बनता है। 1958 में अमेरिकी वैज्ञानिक हैरी हार्लो ने यह बात साबित की थी। उन्होंने अपने मशहूर 'मंकी एक्सपेरिमेंट' से दुनिया को चौंका दिया था। हार्लों के मुताबिक स्पर्श ही मां और बच्चे के बीच संवाद का पहला तरीका है। यह प्रक्रिया गर्भ से ही शुरू हो जाती है। हैरी हार्लो ने प्रयोग में छोटे बंदरों को उनकी असली मां से अलग कर दिया। इन बच्चों को दो तरह की नकली मांएं दी गईं। पहली तार की बनी मां थी जिसमें दूध की बोतल लगी थी। दूसरी मुलायम कपड़े की बनी मां थी जिसके पास खाना नहीं था।
छोटे बंदरों ने अपना 70% समय मुलायम कपड़े वाली मां के साथ बिताया। वे तार वाली मां के पास केवल दूध पीने जाते थे। दूध पीते ही वे तुरंत कपड़े वाली मां के पास वापस भाग आते थे। जब बंदरों के पास डरावने खिलौने रखे गए तो वे बहुत डर गए। वे खाना देने वाली तार की मां के पास नहीं गए। वे दौड़कर मुलायम कपड़े वाली मां से चिपक गए। हार्लो ने पाया कि जिन बंदरों को मां का प्यार नहीं मिला उन पर बुरा असर पड़ा। जो बंदर एक साल तक अकेले रहे वे कभी नॉर्मल नहीं हो पाए। हार्लो ने साबित किया कि दूध से ज्यादा 'टच कम्फर्ट' महत्वपूर्ण है। यह सुकून बच्चे के मानसिक विकास के लिए बहुत जरूरी है।
सवाल-3: क्या बंदर इंसानों की तरह भावनाओं को महसूस करते हैं?
लाखों साल पहले बंदर और इंसानों के पूर्वज एक ही थे। प्राइमेटोलॉजिस्ट फ्रांस डी वाल कहते हैं कि हमारी भावनाएं बंदरों से अलग नहीं हैं। हमारी फीलिंग्स बस थोड़ी ज्यादा विस्तृत और परिष्कृत हो चुकी हैं। दिमाग की स्टडी में पाया गया कि बंदरों और इंसानों के दिमाग के हिस्से समान हैं। प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स हिस्सा भावनाओं पर कंट्रोल के लिए जिम्मेदार है। एंटीरियर सिंगुलेट कॉर्टेक्स हमारे भीतर सहानुभूति पैदा करता है। एमिग्डाला हिस्सा डर जैसी नकारात्मक भावनाओं को संभालता है। बंदरों में भी दिमाग के यही हिस्से उनकी भावनाओं को कंट्रोल करते हैं। इसलिए बंदर भी हमारी तरह ही भावनाओं को प्रोसेस करते हैं।
तनाव की स्थिति में बंदरों में भी कोर्टिसोल का स्तर बढ़ जाता है। यह बिल्कुल इंसानों जैसा ही एक जैविक रिस्पॉन्स है। दुःख के कारण बंदरों के शरीर में कई बदलाव देखे गए हैं। दिमाग में खून का फ्लो कम होना या वजन गिरना इसके लक्षण हैं। बंदर और चिंपाजी दुःख, चिंता, डर और खुशी महसूस करते हैं। वे प्यार, संतोष और सहानुभूति की भावनाएं भी दिखाते हैं। बंदर इंसानों की तरह ही समूह में रहना पसंद करते हैं। वे एक-दूसरे को नई चीजें सिखाते हैं। वे रात को एक ही साथ सोते हैं। चार्ल्स डार्विन ने 1871 में लिखा था कि मादा बंदर शोक मनाती हैं। वे अपने मृत बच्चे को लंबे समय तक साथ लेकर चलती हैं।
बंदरों पर किए गए प्रयोगों में सहानुभूति के प्रमाण मिले हैं। एक प्रयोग में बंदरों को खाना पाने के लिए चेन खींचनी थी। लेकिन उस चेन से दूसरे बंदर को बिजली का झटका लगता था। बंदरों ने अपने साथियों को बचाने के लिए चेन खींचना बंद कर दिया। वे खुद भूखे रहे लेकिन दूसरों को दर्द नहीं दिया। एक प्रयोग में बंदरों ने खीरा खाना तब बंद किया जब पड़ोसी को अंगूर मिले। फ्रांस डी वाल के मुताबिक बंदर 'निष्पक्षता' की भावना भी दिखाते हैं। अगर किसी को कम खाना मिले तो दूसरा बंदर आपत्ति दर्ज कराता है। हालांकि बंदरों में शर्म या गहराई से सोचने की क्षमता कम होती है। उनकी भाषा के जरिए भावनाएं जाहिर करने की क्षमता भी सीमित है।
सवाल-4: साथी बंदरों ने पंच-कुन को आखिर क्यों घायल किया?
19 जनवरी 2026 को पंच-कुन को 60 बंदरों के झुंड में शामिल किया गया। वहां देखा गया कि दूसरे बंदर उसे लगातार परेशान कर रहे थे। 20 फरवरी 2026 को एक मादा बंदर ने उसे कई मीटर तक घसीटा। दरअसल पंच-कुन दूसरे बेबी मकाक के पास जाने की कोशिश कर रहा था। मादा मकाक ने अपने बच्चे को बचाने के लिए पंच-कुन को घसीटा। रिसर्च के अनुसार ऐसा व्यवहार 'अलग-थलग' मानने की सोच से आता है। मकाक बंदरों में सामाजिक तनाव के कारण अक्सर झगड़े होते हैं। खिलौने को मां समझने के कारण पंच-कुन बाकी बंदरों से अलग दिखता था। उसका खिलौने से अत्यधिक लगाव बाकी बंदरों को असहज करता था। छोटा होने के कारण वह बंदरों के इशारे भी नहीं समझ पाया। इस कारण वह दूसरे बंदरों का आसान निशाना बन गया।
सवाल-5: अभी पंच-कुन किस हाल में है और उसका भविष्य क्या है?
जू के कर्मचारियों ने अपनी दिनचर्या में पंच-कुन को शामिल किया है। जब भी कोई कर्मचारी खाना लेकर आता है तो पंच-कुन उनके पैर से चिपक जाता है। दूसरे मकाक बंदर कर्मचारियों से हमेशा एक सुरक्षित दूरी बनाकर रखते हैं। जू के अधिकारी कहते हैं कि पंच धीरे-धीरे बातचीत बढ़ा रहा है। उसे समूह में रहने के लिए तैयार करने की कोशिश जारी है। अब वह दूसरे बंदरों के साथ सामाजिक व्यवहार करने लगा है। इसमें कभी-कभी हल्की नोकझोंक भी शामिल होती है। उसे हर दिन नए और अलग अनुभव मिल रहे हैं। उम्मीद है कि वह जल्द ही सामान्य बंदर की तरह रहेगा। वह जल्द ही अपने झुंड का एक सक्रिय हिस्सा बन जाएगा।
सवाल-6: मकाक बंदरों के बारे में और क्या विशेष बातें हैं?
मकाक दुनिया के सबसे बुद्धिमान और अनुकूलनशील बंदरों में से एक हैं। ये किसी भी नए माहौल में बहुत जल्दी ढल जाते हैं। ये हमेशा बड़े सोशल ग्रुप्स में रहना पसंद करते हैं। इनके समूह में एक बहुत सख्त 'हायरार्की' यानी पदक्रम होता है। एक शक्तिशाली बंदर हमेशा पूरे ग्रुप का लीडर होता है। उसके बाद मादाएं और फिर छोटे बच्चे आते हैं। बच्चे हमेशा अपने से बड़े बंदरों से नई चीजें सीखते हैं। वे बड़ों के निर्देशों का पालन करना जल्दी सीख जाते हैं। मकाक इंसानों के साथ रहने में भी बहुत माहिर होते हैं। ये बंदर एक-दूसरे के बाल साफ कर सामाजिक रिश्ते मजबूत करते हैं। भारत में दिखने वाली रीसस प्रजाति भी मकाक बंदर का ही हिस्सा है।
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