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क्या सेना राजनीति में घुसपैठ करने की कोशिश कर रही है? पार्टी गठन की तैयारी
जैसे-जैसे ढाका का राजनीतिक परिदृश्य बदल रहा है, पूर्व सैन्य अधिकारी शासन को नया आकार देने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे बांग्लादेश के लोकतंत्र के भविष्य को लेकर सवाल उठ रहे हैं
बांग्लादेश में कुछ पूर्व सेना अधिकारियों द्वारा अपनी राजनीतिक पार्टी शुरू करने की इच्छा ने राजनीतिक हलकों में चर्चाओं को जन्म दे दिया है। यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि कहीं सेना राजनीति में पिछले दरवाजे से प्रवेश करने की कोशिश तो नहीं कर रही। हालांकि, सेना प्रमुख ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वे राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करेंगे और अपनी भूमिका केवल मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार का समर्थन करने तक सीमित रखेंगे।
इतिहास और संदेह
बांग्लादेश के इतिहास में सेना कई बार सत्ता हथियाने के लिए हस्तक्षेप कर चुकी है। इसलिए, सेना प्रमुख के आश्वासन को पूरी तरह से विश्वास की नज़र से नहीं देखा जा रहा है। इस समय मीडिया का ध्यान उन छात्रों पर केंद्रित है, जिन्होंने पिछले वर्ष शेख हसीना को सत्ता से हटाने के लिए आंदोलन किया था और अब एक राजनीतिक दल बनाने की तैयारी में हैं। लेकिन सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों की प्रस्तावित पार्टी ने भी देश में हलचल पैदा कर दी है।
"देश संकट में, इसलिए साथ आ रहे हैं"
सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर जनरल और मुख्य समन्वयक शमीम कमाल ने कहा, "हमने एकजुट होने का फैसला किया है, क्योंकि देश एक गंभीर संकट से गुजर रहा है।"
'दबाव समूह' की भूमिका
कमाल ने आगे कहा, "हमें पता है कि हम स्थापित राजनीतिक दलों को हटा नहीं सकते, लेकिन 30-40 सीटें जीतकर एक प्रभावशाली दबाव समूह की भूमिका निभा सकते हैं, ताकि देश सही दिशा में आगे बढ़े।"
अस्थिरता और सेना की भूमिका
यूनुस सरकार इस समय आर्थिक संकट और देश में स्थिरता लाने के लिए संघर्ष कर रही है। कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ रही है, जिससे लोगों में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। सेना प्रमुख वाकर-उज़-ज़मां ने भी स्वीकार किया कि अपराधी इस अराजकता का लाभ उठा रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सेना और सुरक्षा एजेंसियों को कमजोर किया गया, तो बांग्लादेश संकट में पड़ सकता है।
राजनीतिक दल के गठन की तैयारी
कमाल और उनके सहयोगियों का मानना है कि सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी इस समय देश के लिए एक रचनात्मक भूमिका निभा सकते हैं। इस पहल को कई पूर्व जनरलों, मेजरों और अन्य अधिकारियों का समर्थन प्राप्त है। इसके अलावा, पूर्व सांसद, स्वतंत्र विधायक, छात्र, उद्यमी, तकनीकी विशेषज्ञ, व्यापारी और पूर्व नौकरशाह भी इस विचार के समर्थन में हैं।
एक समन्वय समिति का गठन किया गया है, जिसमें सेवानिवृत्त मेजर-जनरल इब्ने फज़ल शेखुज्जमां, मेजर दिलावर हुसैन खान, पूर्व जातीय पार्टी नेता नुरुल कादिर खान और अन्य शामिल हैं। इस राजनीतिक दल को मार्च में औपचारिक रूप से लॉन्च किया जाएगा।
बांग्लादेश में सेना और राजनीति का जटिल संबंध
5 अगस्त को शेख हसीना की सत्ता से बेदखली के बाद सेना ने यूनुस सरकार को समर्थन देने का निर्णय लिया था। जनरल वाकर ने सेना की राजनीति में किसी भी भूमिका से इनकार किया है और कहा है कि "एक राजनीतिक दल का प्रतिस्थापन केवल एक राजनीतिक दल से ही होना चाहिए, न कि सेना से।"
लेकिन उनके इस आश्वासन के बावजूद, कई सेवारत अधिकारी अपने पूर्व सैन्य सहयोगियों के राजनीतिक प्रयासों को समर्थन दे सकते हैं।
सेना का राजनीतिक इतिहास
बांग्लादेश में सेना का इतिहास उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। दो राष्ट्रपतियों—शेख मुजीबुर रहमान और जियाउर रहमान—की हत्या में सेना की भूमिका रही थी। सेना समय-समय पर गुटों में बंटकर संघर्षों में भी उलझी रही है।
जियाउर रहमान और हुसैन मुहम्मद इर्शाद, दोनों सेना से राजनीति में आए थे और उन्होंने क्रमशः बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और जातीय पार्टी की स्थापना की थी। इसके अलावा, सेना ने अंतरिम सरकारों का गठन भी किया है या उन्हें बाहरी समर्थन दिया है।
"सेना ही एकमात्र सम्मानित संस्था"
सेवानिवृत्त मेजर दिल हुसैन खान ने कहा, "बांग्लादेश में सेना ही एकमात्र संस्था है, जिसे पूरे देश में सम्मान प्राप्त है।"
जनरल वाकर को एक रूढ़िवादी व्यक्ति माना जाता है, जो मानते हैं कि हर बार जब सेना राजनीति में हस्तक्षेप करती है, तो उसकी छवि खराब होती है। हालांकि, कुछ लोग यह भी कहते हैं कि वह सेना के भीतर प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच संतुलन बनाने में व्यस्त हैं और खुद राजनीति में उतरने को लेकर अनिश्चित हैं।
राजनीतिक शून्य को भरने की कोशिश
कमाल के पिता सात बार सांसद रह चुके हैं—पहले बीएनपी के टिकट पर और बाद में जातीय पार्टी के उम्मीदवार के रूप में। कमाल अपने पिता की लोकप्रियता का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं।
कमाल ने कहा, "भविष्य की सरकार को बांग्लादेश के हित में काम करना चाहिए, न कि विदेशी ताकतों या विशेष समूहों के लिए।"
क्या यह 'राजा की पार्टी' है?
यह प्रस्तावित पार्टी जब पहली बार ढाका में बैठक कर रही थी, तब इसमें कई पूर्व वरिष्ठ सैन्य अधिकारी, थिंक-टैंक के सदस्य, पूर्व नौकरशाह और व्यापारी मौजूद थे।
मेजर खान ने कहा, "शेख हसीना के जाने के बाद देश की राजनीति में एक बड़ा खालीपन आ गया है, जिसे कई राजनीतिक दल भरने की कोशिश कर रहे हैं।" हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि छात्रों का प्रभाव सिर्फ ढाका तक सीमित है और वे देश के अन्य हिस्सों में पकड़ नहीं बना पाए हैं।
हसीना विरोधी भावना और नई पार्टी की रणनीति
प्रस्तावित राजनीतिक दल के कई सदस्य शेख हसीना के खिलाफ कड़ा रुख अपनाए हुए हैं। मेजर खान ने कहा, "हम ऐसे लोगों को चाहते हैं जो देश के लिए योगदान दे सकें, लेकिन ऐसे किसी को नहीं जो अवामी लीग से जुड़ा हो।"
हसीना के कार्यकाल में लगभग 460 सैन्य अधिकारियों को भ्रष्टाचार और 'अनैतिक आचरण' के आरोप में बर्खास्त कर दिया गया था। हालांकि, सेवानिवृत्त अधिकारियों का कहना है कि इनमें से कई लोग राजनीतिक शिकार बने थे।
अंतरराष्ट्रीय संदर्भ और भारत की चिंता
कुछ पर्यवेक्षकों का कहना है कि कई सेवानिवृत्त अधिकारी अभी भी किसी निश्चित निर्णय पर नहीं पहुंचे हैं, लेकिन वे स्थिति पर नज़र रखे हुए हैं। जब कमाल से पूछा गया कि क्या यह 'राजा की पार्टी' (King’s Party) बनने जा रही है, तो उन्होंने कहा, "अगर हम ऐसा करेंगे, तो हमारी विश्वसनीयता खत्म हो जाएगी। लेकिन आपको इंतजार करना होगा और देखना होगा।"
आलोचकों का कहना है कि बांग्लादेश में चुनावों से पहले सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों द्वारा राजनीतिक दलों का गठन कोई नई बात नहीं है। इनमें से कुछ पार्टियां सरकार में शामिल हो जाती हैं, जबकि अन्य गुमनामी में चली जाती हैं।
लेकिन हाल ही में बांग्लादेशी सेना के वरिष्ठ अधिकारियों की रावलपिंडी यात्रा और यूनुस की प्रस्तावित चीन यात्रा के संदर्भ में, भारतीय नीति-निर्माताओं की दिलचस्पी इस घटनाक्रम पर बनी रहेगी।