ईरान की ढाल बना बीजिंग, किया पलटवार हमारे मामले से दूर रहे वाशिंगटन
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चीन की अमेरिका को ललकार, हमारे मामलों से दूर रहो। फाइल फोटो

ईरान की ढाल बना बीजिंग, किया पलटवार 'हमारे मामले से दूर रहे वाशिंगटन'

अमेरिका ने ईरान के साथ तनाव के बीच होर्मुज पर नाकाबंदी का ऐलान किया है तो ट्रंप के इस कदम के खिलाफ चीन खुलकर ईरान के समर्थन में आ गया और बड़ी चेतावनी दे डाली


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बीजिंग/वाशिंगटन: मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) में गहराते संकट के बीच दुनिया की दो महाशक्तियां अमेरिका और चीन एक बार फिर आमने-सामने आ गई हैं। अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर नाकाबंदी के ऐलान के बाद चीन पूरी तरह से ईरान के समर्थन में खड़ा हो गया है। चीन ने न केवल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस कदम का विरोध किया है बल्कि वाशिंगटन को चेतावनी देते हुए कहा है कि वह बीजिंग के व्यापारिक मामलों में हस्तक्षेप करने से बाज आए।

वार्ता की विफलता और बढ़ता तनाव

अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध की आहट (US-Iran War Tension) एक बार फिर तेज हो गई है। हाल ही में पाकिस्तान में आयोजित की गई शांति वार्ता के बेनतीजा खत्म होने के बाद दोनों देशों के बीच कड़वाहट चरम पर है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जहां रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज मार्ग पर नाकाबंदी (Hormuz Blockade) का आदेश देकर ईरान की आर्थिक घेराबंदी शुरू कर दी है। वहीं, ईरान ने भी पलटवार करते हुए तेल आपूर्ति (Iran Oil Warning) को लेकर दुनिया को आगाह किया है। इस बीच, ट्रंप ने चीन पर जो टैरिफ की धमकी दी थी, उस पर अब ड्रैगन ने जवाबी हमला किया है।

ट्रंप की 50% टैरिफ की धमकी और चीन का रुख

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के खिलाफ लगातार आक्रामक फैसले ले रहे हैं, जिसका सीधा असर चीन पर पड़ रहा है। हाल ही में ऐसी खुफिया जानकारी (Intel) सामने आई थी कि चीन, ईरान को सैन्य हथियारों की मदद कर रहा है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए ट्रंप ने कहा था कि इसके परिणाम बहुत गंभीर होंगे। ट्रंप ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी थी...

"मुझे शक है कि वे (चीन) ऐसा करेंगे। लेकिन अगर हमने उन्हें ईरान की सैन्य मदद करते हुए पकड़ लिया तो उन पर 50 प्रतिशत का टैरिफ (50% Tariff on China) लगाया जाएगा। यह वास्तव में एक बहुत बड़ी रकम होगी।"

चीन का जवाब: 'हमारे जहाज होर्मुज से गुजरते रहेंगे'

ट्रंप की इस खुली धमकी के बावजूद चीन पीछे हटने को तैयार नहीं है। चीनी रक्षा मंत्री डोंग जून ने बीजिंग का पक्ष रखते हुए कहा कि उनका देश दुनिया में शांति और स्थिरता के लिए प्रतिबद्ध है और मध्य पूर्व की स्थिति पर करीब से नजर रख रहा है। उन्होंने बेहद सख्त लहजे में अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा...

व्यापारिक अधिकार: "हमारे जहाज होर्मुज स्ट्रेट में लगातार आ-जा रहे हैं। ईरान के साथ हमारे महत्वपूर्ण व्यापारिक और ऊर्जा समझौते हैं। हम इन समझौतों का पूरा सम्मान करेंगे।"

हस्तक्षेप पर रोक: "हम उम्मीद करते हैं कि कोई भी दूसरा देश (अमेरिका) हमारे निजी और व्यापारिक मामलों में दखल नहीं देगा। होर्मुज पर ईरान का नियंत्रण है और यह मार्ग हमारे व्यापार के लिए पूरी तरह खुला है।"

होर्मुज नाकाबंदी: चीन की अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रहार

दुनिया की तेल जरूरतों को पूरा करने के लिए होर्मुज मार्ग सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। पाकिस्तान में हुई 'US-Iran Talks' के फेल होने के बाद अमेरिका ने यहां नाकाबंदी का कदम उठाया है। इस नाकाबंदी से चीन की ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। क्योंकि चीन, ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है। होर्मुज में शिपमेंट रुकने से ईरान का राजस्व तो गिरेगा ही, साथ ही चीन की तेल सप्लाई भी बाधित होगी, जो उसकी अर्थव्यवस्था के लिए घातक हो सकता है। यही वजह है कि ट्रंप की घोषणा के बाद चीन में भारी बौखलाहट देखी जा रही है।

CENTCOM का आदेश और नाकाबंदी का दायरा

यूएस सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति ट्रंप के आदेशानुसार सोमवार (13 अप्रैल) से ईरानी बंदरगाहों की ओर जाने वाले और वहां से आने वाले सभी समुद्री यातायात की नाकाबंदी प्रभावी होगी। यह आदेश अरब की खाड़ी और ओमान की खाड़ी पर स्थित सभी ईरानी पोर्ट्स और तटीय क्षेत्रों पर लागू होगा। हालांकि अमेरिकी सेना ने यह भी कहा है कि वे उन जहाजों को नहीं रोकेंगे जो गैर-ईरानी बंदरगाहों की ओर जा रहे हैं।

ट्रंप का 'एक तीर से दो निशाने' वाला गेमप्लान

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप चाहे वेनेजुएला में स्ट्राइक करें या ईरान से उलझें, उनके निशाने पर हमेशा चीन ही रहता है। पहले वेनेजुएला के तेल पर नियंत्रण पाकर ट्रंप ने चीन को चोट पहुंचाई थी। क्योंकि चीन वहां के तेल का प्रमुख खरीदार था। अब ईरानी तेल के सबसे बड़े ग्राहक चीन को रोकने के लिए उन्होंने ईरान पर हमला बोला है। ट्रंप की यह रणनीति 'एक तीर से दो निशाने' साधने जैसी है, जहां वे ईरान को आर्थिक रूप से कमजोर कर रहे हैं और साथ ही चीन की ऊर्जा सुरक्षा को संकट में डाल रहे हैं।

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