अमेरिका - ईरान में छोटे संघर्ष से चीन को क्यों हो सकता है फ़ायदा ?
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अमेरिका - ईरान में छोटे संघर्ष से चीन को क्यों हो सकता है फ़ायदा ?

पश्चिम एशिया को अस्थिरता में धकेलने वाला एक लंबा युद्ध बीजिंग के हित में नहीं है, क्योंकि इस क्षेत्र में उसके मजबूत आर्थिक हित हैं, लेकिन एक छोटा संघर्ष हो सकता है


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China On USA-Iran War : संयुक्त राज्य अमेरिका और इजरायल के संयुक्त सैन्य अभियान में ईरानी सर्वोच्च नेता आयतollah अली खामेनेई की मौत ने वैश्विक राजनीति में भूचाल ला दिया है। इस घटनाक्रम पर चीन ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए इसकी कड़ी निंदा की है। बीजिंग ने आधिकारिक तौर पर इसे ईरान की संप्रभुता और सुरक्षा का एक "गंभीर उल्लंघन" करार दिया है। चीन ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि वे इस शत्रुता को तुरंत समाप्त करने के लिए कदम उठाएं। चीन का मुख्य जोर इस बात पर है कि यह युद्ध किसी भी सूरत में व्यापक क्षेत्र में नहीं फैलना चाहिए। एक लंबे समय तक चलने वाली हिंसा चीन की ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को तहस-नहस कर सकती है। चीन की अर्थव्यवस्था पहले से ही कोविड-19 महामारी के असर और अमेरिका के साथ लंबे समय से चल रहे व्यापारिक युद्ध के कारण दबाव में है। ऐसे में चीन के लिए इस क्षेत्र की स्थिरता अत्यंत महत्वपूर्ण है। हालांकि, कूटनीतिक गलियारों में विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग इसे चीन के लिए एक छिपा हुआ रणनीतिक अवसर भी मान रहा है।

आर्थिक हितों पर मंडराता खतरा

चीन स्पष्ट रूप से इस संघर्ष के विस्तार को लेकर चिंतित है। पश्चिम एशिया के क्षेत्र में चीन के बहुत गहरे और मजबूत आर्थिक हित जुड़े हुए हैं। यदि हिंसा और अस्थिरता का यह दौर लंबा खिंचता है, तो इसका सबसे बुरा असर चीन की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ेगा। चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस क्षेत्र पर बहुत अधिक निर्भर है। इसके अलावा, वैश्विक व्यापारिक मार्ग बाधित होने से चीन की आर्थिक रिकवरी की गति और धीमी हो सकती है। बीजिंग अच्छी तरह जानता है कि एक लंबा युद्ध उसके 'आर्थिक पुनरुद्धार' के रास्ते में बड़ा रोड़ा बनेगा।

क्या छोटा युद्ध है चीन का रणनीतिक हथियार?

दिलचस्प बात यह है कि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान में एक "छोटा युद्ध" चीन के रणनीतिक हितों को साध सकता है। इस युद्ध का जो भी परिणाम निकले, वह ईरान के मन में अमेरिका के प्रति गहरे संदेह को और ज्यादा पुख्ता करेगा। इससे भविष्य में तेहरान और वाशिंगटन के बीच किसी भी तरह के मजबूत संबंधों की संभावना लगभग खत्म हो जाएगी। ऐसी स्थिति में तेहरान के पास बीजिंग पर अपनी निर्भरता बढ़ाने के अलावा कोई और चारा नहीं बचेगा।


कमजोर ईरान और बीजिंग का दबदबा

चीन कभी नहीं चाहता कि ईरान में 'सत्ता परिवर्तन' (Regime Change) हो। उसे डर है कि ऐसा होने पर वहां अमेरिका की कठपुतली सरकार आ सकती है। लेकिन, एक कमजोर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ा ईरान चीन के लिए आदर्श स्थिति है। कमजोर ईरान पूरी तरह से आर्थिक और कूटनीतिक रूप से चीन का मोहताज हो जाएगा। इससे चीन को मध्य पूर्व में अपनी रणनीतिक बढ़त बनाए रखने में बहुत मदद मिलेगी।


अमेरिका के साथ सौदेबाजी का मौका

अगले महीने बीजिंग में डोनाल्ड ट्रम्प और शी जिनपिंग के बीच एक महत्वपूर्ण मुलाकात होने वाली है। इस बैठक में चीन ईरान के मुद्दे को एक 'बार्गेनिंग चिप' की तरह इस्तेमाल कर सकता है। वह ईरान पर संयम बरतने का दिखावा करके अमेरिका से व्यापार और टैरिफ के मुद्दों पर बड़ी रियायतें मांग सकता है। ताइवान जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भी चीन अमेरिका को झुकने पर मजबूर कर सकता है। दोनों नेताओं से उम्मीद है कि वे द्विपक्षीय संबंधों को फिर से पटरी पर लाने के लिए व्यापारिक बाधाओं को दूर करेंगे।


अमेरिका को खाड़ी में उलझाने की रणनीति

यदि ईरान इस अमेरिकी हमले के बाद भी अपनी व्यवस्था को बचाए रखने में सफल रहता है, तो यह वाशिंगटन के लिए बड़ी मुश्किल होगी। एक शत्रुतापूर्ण तेहरान हमेशा अमेरिका के लिए एक रणनीतिक सिरदर्द बना रहेगा। इससे अमेरिकी राष्ट्रपति को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की तुलना में अपना ज्यादा समय और संसाधन खाड़ी क्षेत्र में लगाने पड़ेंगे। यह स्थिति सीधे तौर पर चीन को दक्षिण चीन सागर और एशिया में अपना वर्चस्व बढ़ाने का मौका देगी।


चीन और ईरान की 25 वर्षीय साझेदारी की हकीकत

साल 2021 में चीन और ईरान ने 25 साल लंबे एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत चीन ने ईरान के बुनियादी ढांचे, ऊर्जा और बैंकिंग क्षेत्रों में 400 अरब डॉलर के भारी-भरकम निवेश का वादा किया था। इसने तेहरान को चीन की 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया। हालांकि, चीन अभी भी इस निवेश को जमीन पर उतारने में काफी सावधानी बरत रहा है। चीन का मुख्य ध्यान अभी भी ईरान के ऊर्जा संसाधनों का दोहन करने पर ही टिका है।


सस्ता तेल और आर्थिक जीवन रेखा

चीन लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना कर रहे ईरान से बहुत ही कम कीमतों पर तेल और गैस खरीद रहा है। यह व्यापार ईरानी अर्थव्यवस्था के लिए एक ऑक्सीजन की तरह है। आंकड़ों के अनुसार, साल 2025 में चीन ने ईरान के कुल तेल निर्यात का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा खरीदा था। यह चीन द्वारा समुद्र के रास्ते आयात किए जाने वाले कुल तेल का 13.5 प्रतिशत हिस्सा था। चीन ने ईरान को ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन का हिस्सा बनाकर उसे अंतरराष्ट्रीय अलगाव से भी बचाया है।


परमाणु हथियार: चीन की लक्ष्मण रेखा

चीन ईरान के शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा के अधिकार का तो समर्थन करता है, लेकिन वह नहीं चाहता कि तेहरान के पास परमाणु हथियार हों। जून 2025 में हुए हालिया हमले के बाद विशेषज्ञों को डर है कि ईरान अब अपनी सुरक्षा के लिए परमाणु बम बनाने की ओर कदम बढ़ा सकता है। चीन को डर है कि यदि ईरान परमाणु शक्ति बनता है, तो वह पूरे क्षेत्र में एक 'हेगामन' या वर्चस्ववादी शक्ति के रूप में उभरेगा। यह उन देशों के लिए खतरा होगा जहां चीन के बड़े निवेश हैं।


हथियारों की होड़ और इंडो-पैसिफिक पर असर

पश्चिम एशिया में परमाणु हथियारों की होड़ चीन के अपने पड़ोसियों को भी उकसा सकती है। जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भी अपनी सुरक्षा के लिए परमाणु हथियार बनाने की मांग कर सकते हैं। यह स्थिति इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की सैन्य सर्वोच्चता को सीधी चुनौती देगी। चाथम हाउस के विशेषज्ञ अहमद अबौदौह के अनुसार, चीन ने अब तक इस क्षेत्र में केवल आलोचनात्मक रुख अपनाया है और खुद को सक्रिय सैन्य भागीदारी से दूर रखा है।


चीन और रूस की दोहरी चाल

वॉल स्ट्रीट जर्नल के विश्लेषण के अनुसार, चीन और रूस दोनों ही ईरान के मामले में संभलकर चल रहे हैं। दोनों देशों ने राजनयिक संबंध तो मजबूत किए हैं, लेकिन सीधे तौर पर कोई सैन्य सहायता नहीं दी है। वे वाशिंगटन के साथ सीधा सैन्य टकराव मोल लेकर जोखिम नहीं उठाना चाहते। उनके संबंध प्रतिबद्धता के बजाय शुद्ध रूप से 'लेन-देन' और व्यावहारिक हितों पर टिके हैं।


युद्ध का भविष्य और चीन का अंतिम लक्ष्य

युद्ध कब तक चलेगा, यह कहना मुश्किल है। यदि ईरान अमेरिका के सैन्य संपत्तियों को निशाना बनाने में सफल रहा और अमेरिकी सैनिकों की मौतें बढ़ीं, तो ट्रम्प पर युद्ध खत्म करने का दबाव बढ़ेगा। दूसरी ओर, यदि ईरान का मिसाइल भंडार जल्दी खत्म हो गया, तो उसे झुकना पड़ेगा। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि न चीन और न ही रूस ईरान को बचाने के लिए अपनी सेना भेजेंगे। चीन का अंतिम लक्ष्य केवल अमेरिका को पश्चिम एशिया के दलदल में फंसाए रखना है ताकि वह खुद को वैश्विक मंच पर और मजबूत कर सके।

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