
ईरान बनाम अमेरिका-इजरायल जंग, चीन उतना आक्रामक क्यों नहीं?
ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमलों के बीच चीन ने सीमित प्रतिक्रिया दी है। ऊर्जा हित, भू-राजनीतिक संतुलन और उसकी चुप्पी की बड़ी वजह है।
ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों तथा ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत की खबरों ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है। क्षेत्रीय राजनीति उबाल पर है, लेकिन इस उथल-पुथल के बीच एक सवाल लगातार उठ रहा है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन आखिर चुप क्यों है?
बीजिंग ने औपचारिक रूप से हत्या की निंदा की, लेकिन इसके आगे कोई आक्रामक कूटनीतिक या आर्थिक कदम नहीं उठाया। न तो उसने अमेरिका पर प्रतिबंधों की बात की और न ही इजरायल के खिलाफ सख्ती का संकेत दिया। ऐसे में यह चुप्पी क्या महज सतर्कता है, या फिर एक गहरी रणनीतिक सोच का हिस्सा?
ऊर्जा सुरक्षा
पिछले एक दशक में चीन-ईरान संबंधों में उल्लेखनीय मजबूती आई थी। 25 वर्षीय रणनीतिक साझेदारी समझौते से लेकर इंफ्रास्ट्रक्चर, ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर और ऊर्जा सहयोग तक, दोनों देशों के रिश्ते व्यापक हुए। 2025 में चीन प्रतिदिन लगभग 1.38 मिलियन बैरल ईरानी तेल खरीद रहा था, जो उसके कुल आयात का लगभग 14 प्रतिशत था। वहीं ईरान के कुल तेल निर्यात का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा चीन को जाता था।
पहली नजर में यह निर्भरता गंभीर लग सकती है। लेकिन चीन की ऊर्जा नीति हमेशा बहुविकल्पीय (multi-sourcing) रही है। उसके पास रूस और सऊदी अरब जैसे बड़े आपूर्तिकर्ता मौजूद हैं। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस से रियायती दरों पर तेल उपलब्ध हुआ, जिसका चीन ने भरपूर लाभ उठाया। सऊदी अरब के साथ उसके ऊर्जा और निवेश संबंध भी स्थिर और संस्थागत हैं।
युद्ध से ठीक पहले चीन द्वारा ईरान से तेल खरीद में कमी और रूस से आयात में वृद्धि यह दर्शाती है कि बीजिंग संभावित संकट को भांप रहा था। इसलिए ईरानी आपूर्ति में बाधा उसके लिए ‘अस्तित्वगत संकट’ नहीं, बल्कि ‘प्रबंधनीय जोखिम’ है। यही कारण है कि उसने भावनात्मक प्रतिक्रिया देने के बजाय अपने दीर्घकालिक ऊर्जा हितों को प्राथमिकता दी।
भू-राजनीतिक संतुलन
चीन की विदेश नीति का मूल सिद्धांत है प्रत्यक्ष टकराव से बचते हुए दीर्घकालिक लाभ सुरक्षित करना। यदि वह खुलकर अमेरिका या इजरायल के खिलाफ खड़ा होता, तो पश्चिम के साथ उसके पहले से जटिल संबंध और तनावपूर्ण हो सकते थे। इसके अलावा, ईरान ने संघर्ष के दौरान जिन मुस्लिम देशों पर हमले किए, वे वही देश हैं जिनसे चीन के महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक रिश्ते हैं। सऊदी अरब उसके ऊर्जा हितों का स्तंभ है, जबकि तुर्की, यूएई और कतर जैसे देश उसके व्यापारिक नेटवर्क और निवेश रणनीति का हिस्सा हैं।
ऐसी स्थिति में ईरान का खुला समर्थन चीन को क्षेत्रीय संतुलन के खिलाफ खड़ा कर सकता था। इसलिए ‘रणनीतिक तटस्थता’ उसके लिए अधिक सुरक्षित और व्यावहारिक विकल्प है।
नुकसान बनाम लाभ
विदेश नीति केवल वैचारिक समर्थन का प्रश्न नहीं है यह जोखिम और लाभ के संतुलन पर आधारित होती है। ईरान इस समय सैन्य रूप से अमेरिका और इजरायल जैसी शक्तियों का सामना कर रहा है। ऐसे में खुला समर्थन चीन को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संघर्ष में खींच सकता है।
चीन की प्राथमिकताएं फिलहाल घरेलू आर्थिक स्थिरता, तकनीकी आत्मनिर्भरता और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन पर केंद्रित हैं। ताइवान, दक्षिण चीन सागर और अमेरिका के साथ तकनीकी प्रतिस्पर्धा जैसे मुद्दे पहले से उसके रणनीतिक एजेंडे पर हैं। ऐसे में पश्चिम एशिया के युद्ध में सक्रिय भूमिका लेना उसके दीर्घकालिक लक्ष्यों से मेल नहीं खाता।
यदि चीन अमेरिका या इजरायल के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंधों की घोषणा भी करता, तो उसका व्यावहारिक असर सीमित होता। इसके विपरीत, पश्चिमी प्रतिक्रिया अधिक कठोर हो सकती थी। इसलिए बीजिंग ने ‘कम जोखिम, सीमित बयान’ की नीति अपनाई।
मध्यस्थ की छवि
पिछले कुछ वर्षों में चीन ने स्वयं को पश्चिम एशिया में एक संभावित मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है। सऊदी अरब और ईरान के बीच संबंधों की बहाली में उसकी भूमिका ने उसे संतुलित शक्ति की छवि दी थी। यदि वह इस युद्ध में किसी एक पक्ष के साथ खुलकर खड़ा होता, तो यह छवि कमजोर पड़ सकती थी। बीजिंग जानता है कि युद्ध लंबा खिंच सकता है। भविष्य में यदि संघर्षविराम या वार्ता की स्थिति बनती है, तो तटस्थ छवि वाला चीन अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकता है। इस दृष्टि से उसकी चुप्पी दरअसल ‘कूटनीतिक पूंजी’ को सुरक्षित रखने की रणनीति भी हो सकती है।
इस्लामिक दुनिया की राजनीति
ईरान द्वारा उन देशों पर हमले, जिन्होंने सीधे उस पर आक्रमण नहीं किया था, ने क्षेत्रीय समीकरणों को जटिल बना दिया है। जो देश पहले तटस्थ थे, वे अब असहज हैं। यदि चीन खुलकर ईरान का समर्थन करता, तो उसे इस्लामिक दुनिया के भीतर विभाजन का पक्षधर माना जा सकता था। जबकि उसकी रणनीति लंबे समय से सबके साथ, किसी के खिलाफ नहीं की रही है। अफ्रीका से लेकर मध्य एशिया और पश्चिम एशिया तक, उसने आर्थिक साझेदारी को प्राथमिकता दी है, न कि सैन्य गठबंधन को। इसलिए वह किसी एक ध्रुव से बंधने के बजाय बहुध्रुवीय संतुलन को बनाए रखना चाहता है।
घरेलू चुनौतियां
चीन इस समय आर्थिक सुस्ती, रियल एस्टेट संकट और वैश्विक व्यापार में अनिश्चितताओं से जूझ रहा है। ऐसे में किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय संघर्ष में सक्रिय हस्तक्षेप उसकी आर्थिक स्थिरता के लिए अतिरिक्त जोखिम पैदा कर सकता है। ऊर्जा आपूर्ति महत्वपूर्ण है, लेकिन चीन के पास रणनीतिक भंडार और वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध हैं। इसलिए वह इस संकट को नियंत्रित जोखिम के रूप में देख रहा है, न कि अस्तित्वगत चुनौती के रूप में।
चुप्पी में छिपी सक्रिय रणनीति
चीन की चुप्पी को निष्क्रियता समझना भ्रामक होगा। यह दरअसल एक सोची-समझी रणनीतिक गणना का परिणाम है। बीजिंग जानता है कि ईरान उसके लिए महत्वपूर्ण साझेदार है, लेकिन वह उसके व्यापक वैश्विक हितों का केवल एक हिस्सा है। ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत, इस्लामिक दुनिया में विविध संबंध, पश्चिम के साथ जटिल शक्ति-संतुलन और घरेलू प्राथमिकताएं इन सभी वजहों को ध्यान में रखते हुए चीन ने फिलहाल संयम और सीमित बयानबाजी का रास्ता चुना है।
भविष्य में यदि क्षेत्रीय समीकरण बदलते हैं, तो चीन अपनी भूमिका समायोजित कर सकता है। लेकिन फिलहाल उसकी प्राथमिकता स्पष्ट है जोखिम कम करना, विकल्प खुले रखना और प्रत्यक्ष टकराव से बचते हुए अपने दीर्घकालिक रणनीतिक हितों की रक्षा करना। इसलिए चीन की चुप्पी दरअसल निष्क्रियता नहीं, बल्कि एक परिपक्व और बहुस्तरीय कूटनीतिक रणनीति का संकेत है।

